मटमैली गुड़िया : तुमने मुझे प्रेम का अद्भुत मतलब समझाया

“यह तो मेरी गुड़िया है, जिसे मां ने सिला था मेरे लिए. मीसा को दी थी, यहां कैसे आई?” साशा धीरे से रूबी के कानों में फुसफुसाई. रूबी ने साशा की अंगुलियों के दबाते हुए चुप रहने को कहा.

By: | Last Updated: Wednesday, 26 July 2017 3:50 PM
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मीसा ने एक मटमैली गुड़िया लेकर उसे एक अनमोल तोहफा देने का वादा किया था. लेकिन जब साशा को वह तोहफा मिला तो ऐसा क्या हुआ कि उसके दिल का सुकून चला गया…

मटमैली गुड़िया

रंजना त्रिपाठी

Matmaili Gudiya

कॉन्सर्ट शुरू होने में अभी थोड़ा समय था. साशा थिएटर में दाखिल हो चुकी थी. थिएटर के सन्नाटे के बीच सफेद कपड़ों में परी जैसी लड़की को देख कर तेज़ रोशनी उसकी ओर घुमा दी गई, जिसके चलते पीछे बैठे सभी दर्शकों की निगाहें उस पर टिक गई थीं. सर्द मौसम में साशा ऊपर से नीचे तक पसीने से भीगी हुई थी. ऐसा माहौल, ऐसी रौनक उसने कभी नहीं देखी थी, वह अच्छे से जानती थी कि जितनी खूबसूरत वह उस दिन लग रही थी, उतनी खूबसूरत वह कभी नहीं लगी थी.

सामने लगा स्टेज मीसा के उस कमरे की तरह सजाया गया था, जहां सिर्फ़ एक सोफा, एक पियानो, एक दरी, एक बंद पड़ा पंखा, भूरे रंग के परदे और दीवार पर बूढ़े बरगद के पेड़ की जगह साशा की मटमैली गुड़िया लटकी थी.

“यह तो मेरी गुड़िया है, जिसे मां ने सिला था मेरे लिए. मीसा को दी थी, यहां कैसे आई?” साशा धीरे से रूबी के कानों में फुसफुसाई. रूबी ने साशा की अंगुलियों के दबाते हुए चुप रहने को कहा.

तालियों की तेज़ गड़गड़ाहट के साथ कॉन्सर्ट शुरू हुआ और स्टेज पर से आवाज़ आई, “हमारी आज की शाम का आखिरी संगीत हमारे शहर के प्रसिद्ध संगीतकार मीसा की रचना है, जिसे उन्होंने अपनी आखिरी और सबसे खूबसूरत रचना का नाम दिया है. यह रचना उन्होंने वनरक्षक की उस नन्हीं बेटी के लिए लिखी थी, जो अब तक अपना तेईसवां जन्मदिन मना चुकी होगी. मीसा की यह रचना उस नन्हीं प्यारी लड़की के लिए है, जिसका नाम साशा था.”

साशा ने गहरी सांस ली, मानो उसका दिल धड़कना भूल गया हो और चारों ओर सन्नाटा छा गया हो. बहुत कोशिश करने के बाद भी वह अपने आंसुओं को रोक नहीं पा रही थी. वह आगे की ओर झुकी और अपने मुंह को ढंक लिया. दिल में उठने वाला तूफान उसे कुछ सुनने नहीं दे रहा था, लेकिन मीसा की रसोई में रहने वाले जुड़वां झिंगुर उसके कानों के पास शोर मचाने लगे थे. कानों के पास जानवरों के हांकने वाले चरवाहे की भी आवाज़ें थीं. कोई सुरीली बांसुरी और अनेक वाद्य यंत्रों की गूंजती ढम-ढम, तेज़ हवा की भांति, पेड़ों, पहाड़ों, नदियों, तलाबों, जंगलों को लांघ कर आती साशा की कोई सुरीली आवाज़, जो मीसा के पियानो से निकल रही थी. साशा ने महसूस किया यह तो वही संगीत था, जो वह उस सुबह गुनगुनाते हुए मीसा से टकराई थी. साशा के पहाड़ों का संगीत, उसके जंगलों का संगीत, दो पर्वतों के मिलन के बीच सिर पटकती नदियों का संगीत. हर ध्वनि को साशा भली तरह पहचानती थी.

साशा उठी और गाउन उठाए, हाथों में जूतियां लिए थिएटर के दरवाज़े की ओर दौड़ पड़ी. कई लोग यह पहचान चुके थे कि सफेद गाउन में बाहर निकल रही वह लड़की साशा ही है, जिसके लिए मीसा ने अपनी अंतिम रचना लिखकर खुली आंखों के साथ दुनिया को अलविदा कह दिया था.

“वह मर चुका है?” साशा बुदबुदाते हुए दौड़ती जा रही थी. “वह जा चुका है? ऐसा क्यों हुआ? काश मैं सिर्फ़ एक बार उससे मिल पाती? काश वह देख पाता, कि मैं कितनी खूबसूरत हो गई हूं? काश वह देख पाता, कि मैं जवान हो चुकी हूं? काश वह मेरी मटमैली गुड़िया मुझे अपने हाथों से लौटा पाता? मैं दौड़ती हुई उसके पास जाती और अपनी बांहों को उसके गले में डाल देती. अपने आंसू भरे गाल उसके खुरदरे गालों से चिपका देती, उसके चेहरे को जी भर कर चूमते हुए सिर्फ़ एक ही शब्द कहती “शुक्रिया!!!””

“तुम किसलिए मुझे शुक्रिया कह रही हो?” साशा की कल्पनाओं में मीसा ने पूछा.

“मुझे मालूम नहीं, शायद इसलिए कि तुमने मुझे याद रखा. शायद इसलिए कि तुमने मुझे अपने संगीत में जीवित किया. शायद इसलिए कि तुमने मुझे प्रेम का अद्भुत मतलब समझाया. शुक्रिया, उस मटमैली गुड़िया के लिए, जो मैं तुमसे कभी वापस नहीं ले सकी.” समुंदर के उस पार, खुली आंखों वाले लोगों की दुनिया की ओर मुंह करके साशा ने अपना आख़िरी उत्तर दिया.

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(रंजना त्रिपाठी की कहानी गुड्डू भईया का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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Web Title: Read Ranjana Tripathi Story Matmaili Gudia
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