आखिरी सैल्यूट: सिर्फ एक ही लगन थी, दुश्मन का सफाया कर देने की | Read Saadat Hasan Manto's story Aakhri Salute

आखिरी सैल्यूट: सिर्फ एक ही लगन थी, दुश्मन का सफाया कर देने की

वह उसी इलाके का रहनेवाला था जो अब पाकिस्तान का एक हिस्सा बन गया था. अब उसे अपने उसी हमवतन के खिलाफ लड़ना था जो कभी उसका हमसाया होता था, जिसके खनदान से उसके खनदान के पुश्तहा-पुश्त के देरीना मरासिम थे!

By: | Updated: 07 Dec 2017 03:45 PM
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आखिरी सैल्यूट


सआदत हसन मंटो


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यह कश्मीर की लड़ाई भी कुछ अजीबो-गरीब थी! सूबेदार रब नवाज़ का दिमाग ऐसी बन्दूक बन गया था जिसका घोड़ा खराब हो गया हो. पिछली बड़ी जंग में वह कई महाज़ों पर लड़ चुका था. मारना और मरना जानता था. छोटे-बड़े अफसरों की नज़रों में उसकी बड़ी तौकीर थी, इसलिए कि वह बड़ा बहादुर, निडर और समझदार सिपाही था. प्लाटून कमांडर मुश्किल काम हमेशा उसे ही सौंपते थे और वह उनसे ओहदाबरा होता था, मगर इस लड़ाई का ढंग ही निराला था! दिल में बड़ा वलवला, बड़ा जोश था. भूख-प्यास से बेपरवा सिर्फ एक ही लगन थी, दुश्मन का सफाया कर देने की. जब दुश्मन से सामना होता तो जानी-पहचानी सूरतें नज़र आतीं. बाज़ दोस्त दिखई देते, बड़ी बगली किस्म के जो पिछली लड़ाई में उसके दोश-बदोश इत्तिहादियों के दुश्मनों से लड़े थे, पर अब एक-दूसरे की जान के प्यासे बने हुए थे.


सूबेदार रब नवाज़ सोचता था कि यह सब ख़्वाब तो नहीं! पिछली बड़ी जंग का एलानय भर्ती, कद और छातियों की पैमाइशय पी-टी-, चांदमारी और फिर महाज़य इधर से उधर, उधर से इधर आखिर जंग का खत्माय फिर एकदम पाकिस्तान का कयाम और साथ ही कश्मीर की लड़ाई ऊपर-तले कितनी खबरें! रब नवाज़ सोचता था कि करने वाले ने यह सब कुछ सोच-समझकर किया है, ताकि दूसरे बौखला जाएं और समझ न सकें. वरना यह भी कोई बात है कि इतनी जल्दी इतने बड़े इन्किलाब बरपा हो जाएं.


इतनी बात तो सूबेदार रब नवाज़ की समझ में आती थी कि वह कश्मीर हासिल करने के लिए बड़े रहे हैं. कश्मीर क्यों हासिल करना है, यह भी वह अच्छी तरह समझता था, इसलिए कि पाकिस्तान लिए कश्मीर का इलहाक अशद ज़रूरी है. मगर निशाना बांधते हुए उसे जब कोई जानी-पहचानी शक्ल नज़र आ ज़ाती तो वह कुछ देर के लिए भूल ज़ाता कि वह किस गरज़ के लिए लड़ रहा है, किस मकसद के लिए उसने बन्दूक उठाई है! वह गालिबन इसलिए भूल ज़ाता था कि उसे बार-बार खुद को याद कराना पड़ता था कि अब वह सिर्फ तनख़्वाह, ज़मीन के मुरब्बों और तमगों के लिए नहीं बल्कि अपने वतन की खतिर लड़ रहा है. यह वतन पहले भी उसका वतन था.


वह उसी इलाके का रहनेवाला था जो अब पाकिस्तान का एक हिस्सा बन गया था. अब उसे अपने उसी हमवतन के खिलाफ लड़ना था जो कभी उसका हमसाया होता था, जिसके खनदान से उसके खनदान के पुश्तहा-पुश्त के देरीना मरासिम थे! अब उसके हमसाये का वतन वह था जिसका पानी तक उसने नहीं पिया था. उसी वतन की खतिर उसके हमसाये ने कांधे पर बन्दूक रख ली थी कि उसे हुक्म दिया गया था कि जाओ, यह जगह जहां तुमने अभी अपने घर के लिए दो र्इंटें भी नहीं चुनी हैं, जिसकी हवा और जिसके पानी का मज़ा अभी तुम्हारे मुंह में ठीक तौर पर बैठा नहीं है, तुम्हारा वतन है...जाओ इस वतन की खतिर पाकिस्तान से लड़ो, उस पाकिस्तान से जिसके ऐन दिल में तुमने अपनी उम्र के इतने बरस गुज़ारे हैं.


रब नवाज़ सोचता था कि यही हाल उन मुसलमान फौजियों का है जो वहां हिन्दुस्तान में अपना घरबार छोड़कर यहां पाकिस्तान में आ गये हैं. वहां उनसे सब कुछ छीन लिया गया था, यहां उन्हें और तो कुछ मिला नहीं, बन्दूकें मिल गयी हैं, उसी वज़न की, उसी शक्ल की, उसी मार्के और छाप की.


पहले वह सब मिलकर एक ऐसे दुश्मन से लड़ते थे जिसका उन्होंने पेट और इनामोइकराम की खतिर अपना दुश्मन यकीन कर लिया था! अब वह खुद दो हिस्सों में बंट गये थे. पहले सब हिन्दुस्तानी फौजी कहलाते थे, अब एक पाकिस्तानी फौजी है और दूसरा हिन्दुस्तानी फौजी! उधर हिन्दुस्तान में मुसलमान हिन्दुस्तानी फौजी भी थे! रब नवाज़ जब उनके मुताल्लिक सोचता तो उसके दिमाग में एक अजीब गड़बड़-सी पैदा हो ज़ाती! जब वह कश्मीर के मुताल्लिक सोचता तो उसका दिमाग बिल्कुल जवाब दे जाता!


पाकिस्तानी फौजी कश्मीर के लिए लड़ रहे हैं या कश्मीर के मुसलमानों के लिए. अगर वह कश्मीर के मुसलमानों के लिए लड़ रहे हैं तो हैदराबाद और जूनागढ़ के मुसलमानों के लिए क्यों उन्हें लड़ने के लिए नहीं कहा ज़ाता और अगर यह जंग ठेठ इस्लामी जंग है तो दुनिया के दूसरे इस्लामी मुल्क इस जंग में क्यों हिस्सा नहीं लेते! रब नवाज़ बहुत सोच-विचार के बाद इस नतीजे पर पहुंचा कि ऐसी बारीक-बारीक बातें फौजी को बिल्कुल नहीं सोचना चाहिए. फौजी की अक्ल मोटी होनी चाहिए कि मोटी अक्लवाला ही अच्छा सिपाही हो सकता है. मगर कभी-कभी वह चोर दिमाग से इन बातों पर गौर कर लेता था और बाद में अपनी इस हरकत पर खूब हंसता था.


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(सआदत हसन मंटो की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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