मिर्च मोहब्बत: बंद गली में तन्हा प्यार | Read Sanjay Bisht's story Mircha Mohabbat

मिर्च मोहब्बत: बंद गली में तन्हा प्यार

मेडिकल का स्टूडेंट तो नहीं था वो लेकिन उसे ये पता था कि जब आदमी निराशाजनक बात सुनता है तो उसके शरीर में रिएक्शन होता है. शरीर के अंदर की परतों में छिपे हार्मोन बाहर निकलते हैं और शरीर में खून के साथ बहने लगते हैं.

By: | Updated: 19 Dec 2017 03:36 PM
Read Sanjay Bisht’s story Mircha Mohabbat

मिर्च मोहब्बत


संजय बिष्ट


Mircha Mohabbat


दूसरी तरफ से फोन पटकने की जोरदार आवाज़ आई और इसी के साथ आज के दिन की पहली और आखिरी उम्मीद का अंत हो गया. उसने अपना मोबाइल फोन दोनों हथेलियों के बीच में ले लिया और अंगुलियों को आपस में फंसा कर बनी मुट्ठी को माथे पर रख लिया. इस मुद्रा में भले ही वो दार्शनिक लग रहा हो लेकिन असल में वो 23 साल की अपनी ज़िंदगी के सबसे खौफनाक पलों को याद कर रहा था. पिछले करीब तीन महीनों से कशमकश में जी रहा था वो. एक तरफ करियर और दूसरी तरफ वो जिसके लिए वो करियर बना रहा था. ज़िंदगी जैसे मझधार में फंसी हो.


सीलन से भरे दड़बेनुमा कमरे में वो बिल्कुल अकेला था. नजरें घड़ी की तरफ गईं तो दिन के 1 बजने ही वाले थे. 3 मिनट 26 सेकंड की इस बातचीत से वो फिर व्यथित हो गया था. पिछले दो दिन से जानबूझकर उसने फोन नहीं किया था क्योंकि वो जितनी बार फोन करता, उतनी बार परेशान हो जाता और फिर उलजुलूल हरकतों का सिलसिला शुरू हो जाता. इस नई परेशानी को कम करने का वो टैंपरेरी तरीका ढूंढ़ चुका था. वो उससे ज्यादा से ज्यादा बात करना चाहता था लेकिन दिल भारी न हो जाए इसलिए वो अब कम फोन करने लगा था लेकिन एक या दो या फिर तीन दिन बाद उसका जी मचलने लगता. एक फीकी आशा उसके जेहन में जन्म लेने लगती. न जाने उसकी क्या मन:स्थिति बन जाती! उसे गलत आभास होने लगता कि शायद आज वो पिघल चुकी होगी. शायद आज वो अपनी जिद छोड़ चुकी होगी. बेहद कसैला मूड हो चुका था उसका. पहले भी ऐसा ही होता था, आज भी ऐसा ही हुआ है.


मेडिकल का स्टूडेंट तो नहीं था वो लेकिन उसे ये पता था कि जब आदमी निराशाजनक बात सुनता है तो उसके शरीर में रिएक्शन होता है. शरीर के अंदर की परतों में छिपे हार्मोन बाहर निकलते हैं और शरीर में खून के साथ बहने लगते हैं. इस प्रवाह के साथ आदमी निराश हो जाता है. उसका मूड उखड़ जाता है. उखड़े मूड को बनाने का तरीका भी उसे पता था. ये तरीका निकोटिन में छिपा हुआ था और उसके लिए निकोटिन का मतलब था चाय. चाय का भगोना बाहर की तरफ से काला पड़ चुका था और अंदर की तरफ चायपत्ती और मलाई की वजह से गहरा भूरा.


सुबह से फोन करने या न करने की जद्दोजहद में वो कई बार चाय बनाकर पी चुका था. अपने 70 साल के बुजुर्ग बूबू के हाथ की बनी चाय का स्वाद शायद ही वो कभी भूल पाए. बूबू के गुजरने के बाद उसे फिर वैसी चाय कभी नसीब नहीं हुई. जब शाम घिर जाती थी, पत्थर-पटाल को तरतीब से बिछाए आंगन में सगड़ जलने लगती. उसको ये लगता था कि पूरे गांव में शायद ही किसी घर में इतने बड़े लट्ठ सगड़ में जलाए जाते हों. चीड़ की लीसा लगी सूखी लकड़ियां जब जलतीं तो पूरा घर गर्म हो जाता. अड़ोसी-पड़ोसी गप्पों की आंच में अपना अहं सेंकने आ जाते. सगड़ के एक कोने में पानी का काला कनस्तर गर्म करने के लिए रखा जाता तो दूसरे कोने में रखी होती थी चाय की केतली. चाय बनाने का एकाधिकार सिर्फ बूबू के पास था क्योंकि सच ये भी था कि बूबू को किसी और के हाथ की बनी चाय पसंद नहीं आती. चीड़ की लकड़ियों की तेज आंच में जब पानी संग अदरक खौल जाता तो बारी होती चायपत्ती डालने की.


खाकी रंग के कागज में हरी धारियों वाला चायपत्ती का वो पैकेट जादुई था. चायपत्ती का वो पैकेट अब नजर भी नहीं आता. बूबू चायपत्ती के एक एक दाने को नापतौल कर डालते. न कम, न ज्यादा. एक बार फिर से चाय उबलने को सगड़ में रख दी जाती. कुछ देर बाद केतली गुड़गुड़ाने लगती. तेज आंच में पकी चाय का कालिख रंग निखर आता. दुड़बुड़ काली चाय की खुश्बू से अंदाजा लग जाता था कि वो स्ट्रांग बनी होगी. बूबू इस चाय में जानबूझकर कम दूध डालते ताकि चाय काली रहे और पीने में जोरदार कड़वे की तासीर बरकरार रहे. दस गिलास पानी आग में तपकर जब नौ गिलास चाय बन जाए तब गुड़ या मिसरी के साथ उसे परोसा जाता. दिनभर पहाड़ी, ढलावदार, सीढ़ीनुमा खेतों में काम करने वाली महिलाओं के लिए ये चाय अमृत से कम नहीं होती. उनकी सारी थकान पलभर में दूर हो जाती.


पीतल के गिलास में सुड़की चाय के उस बेजोड़ स्वाद से ही उसे चाय का चस्का बचपन से लग गया था. वो दूध से ज्यादा चाय को प्राथमिकता देता था. चाय के लिए लगाव की वजह से ही वो एक बार असम में चाय के बागानों में टी टेस्टर बनने का सपना देखने लगा था. ऐसा हो तो नहीं सका लेकिन इतना जरूर होने लगा कि चाय पीकर वो खुद को हल्का महसूस करने लगा.


फ्राइंग पैन को धोकर उसने स्टोव पर चाय चढ़ा दी और कुछ देर बेसुध होकर चारपाई में लेट गया. फोन पर हुई बातचीत को वो याद करना चाहता था लेकिन उसे एक भी शब्द याद नहीं आ रहा था. बस इतना याद आ रहा था कि आज भी वो बेरुखी से बोली. मानव शरीर का ये साधारण नियम है कि कोई भी इंसान 3 महीने तक एक ही टेंपर में नहीं रह सकता है. किसी को 3 महीने तक लगातार गुस्सा आए ये हो नहीं सकता. अब इसके दो अर्थ निकलते हैं, या तो वो पागल होने की कगार पर पहुंच गई है या फिर वो सबकुछ खत्म करने का मन बना चुकी है.


चाय उबाल मारने लगी थी. वो तड़ से चारपाई से उठा और कप में गरमा-गरमा चाय उड़ेल ली. चाय के कप को वो खिड़की के पास ले आया. 3X5 की खिड़की ही उसे बाहर की दुनिया से जोड़ती थी. उसे अपना कमरा अंधेरी गुफा लगता तो इस कमरे की ये खिड़की ज्ञान का नूर बरसाने का चिराग.


उसका दिमाग बिल्कुल भारी था. यादों के थपेड़े दिमाग पर चोट कर रहे थे. छोटे बच्चों का स्कूल से घर लौटने का समय हो चुका था. मां की अंगुली पकड़कर बच्चे बचकानी हरकतें कर रहे थे और गली भी नाप रहे थे.


‘तुम्हें लड़का पसंद है या लड़की?’


‘लड़की.’


‘नहीं लड़कियां नहीं, लड़के होने चाहिए.’


‘मेरे तो दर्जनभर बच्चे होंगे.’


‘चल हट...मुझे क्या बच्चा पैदा करने की मशीन बना दोगे?’


एक रोज जब सर्दी दस्तक देने ही वाली थी, तब अयारफाटक के उन बड़े पत्थरों पर बैठकर दोनों भविष्य की उड़ान पर थे. हर प्रेमी जोड़े में वादों का एमओयू यानी मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टेंडिंग साइन होता है. एमओयू के सबसे ऊपर एक छोटा स्टार बना होता है. आखिरी पेज के सबसे निचले हिस्से में उसी स्टार के आगे लिखा होता है – वादे तोड़ने के लिए होते हैं. तो क्या प्रेमी जोड़े वादे न करें? ऐसा संभव है क्या? उसने भी वादे किए. सपने भी देखे लेकिन क्या हुआ? चाय सुड़कते हुए वो अपनी दुनिया में खोया था जैसे अंतर्ध्यान हो गया हो. फिलॉसफी में उसका विश्वास नहीं था लेकिन उसे लगने लगा था कि परमात्मा में विलीन होने की ट्रिक भी कुछ ऐसी ही होती होगी.


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(संजय बिष्ट के उपन्यास का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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