केएनटी की कार: हालांकि उसके पीछे एक बात और भी थी | Read Sanjay Kundan's story KNT ki Car

केएनटी की कार: हालांकि उसके पीछे एक बात और भी थी

दो तीन लोगों का एक गुट निकलता और कैण्टीन में आ जमता, फिर दूसरा और तीसरा. चाय, समोसे और सिगरेट का दौर चलने लगता. पूरी कैण्टीन में सिगरेट के धुएं की तरह अटकलें भी उड़ रही थीं.

By: | Updated: 13 Nov 2017 03:47 PM
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केएनटी की कार


संजय कुंदन


KNT ki car


शाम छः बजे ऑडिटोरियम में सबको इकट्ठा होना था जनरल मीटिंग के लिए. जनरल मीटिंग के एजेंडे को लेकर कोई दुविधा किसी के भीतर न थी. इस अखबार में जनरल मीटिंग का एजेंडा एक तरह से तय ही होता है- किसी सम्पादक की विदाई, नये सम्पादक का स्वागत या वेतन वृद्धि की घोषणा.


यह बात पिछले कुछ दिनों से एक कान से दूसरे कान तक पहुंच गयी थी कि सम्पादक चिन्तामणि से मैनेजमेण्ट संतुष्ट नहीं है और उन्हें हटाना चाहता है. चिन्तामणि पर अकर्मण्यता का आरोप था. यह कहा जा रहा था कि अखबार की प्रसार संख्या लगातार गिर रही थी, विज्ञापन मिलने कम हो गये थे. अखबार में बदलते समय के अनुरूप कोई बदलाव नहीं आ पा रहा था. हालांकि उसके पीछे एक बात और भी थी जो शायद ज्यादा बड़ी थी. वह यह कि केन्द्र में अब एक दक्षिणपंथी सरकार आ गयी थी और चिन्तामणि वामपंथी रुझान के थे.


मैनेजमेण्ट अब कोई दक्षिणपंथी सम्पादक चाहता था. कहा तो यहां तक जा रहा था कि प्रधानमंत्री कार्यालय से सम्पादक का नाम तय किया गया था. सम्पादकीय विभाग में खुसुरपुसुर हो रही थी. आज किसी का काम में मन नहीं लग रहा था. लोग डेस्क पर खुलेआम चर्चा करने से कतरा रहे थे. दो तीन लोगों का एक गुट निकलता और कैण्टीन में आ जमता, फिर दूसरा और तीसरा. चाय, समोसे और सिगरेट का दौर चलने लगता. पूरी कैण्टीन में सिगरेट के धुएं की तरह अटकलें भी उड़ रही थीं.


सबसे ज्यादा तनाव में थे कमल नारायण तिवारी उर्फ केएनटी. वे आज सम्पादकीय के लोगों की नजरों का निशाना बने हुए थे. जब एक गुट उनके पास से गुजरता तो लोग उन्हें देख कर आपस में खुसुरपुसुर करते और मुस्कुराते. इस अखबार में यही होता था. जब भी किसी सम्पादक की छुट्टी की जाती उसके करीबी लोग अपने साथियों का निशाना बन जाते. लोग ये कयास लगाने लगते कि अब उनका क्या होगा. क्योंकि होता यही था कि नया सम्पादक पुराने सम्पादक के करीबी लोगों को ‘शंट’ कर देता था.


हालांकि केएनटी को इस बात पर सख्त आपत्ति थी कि वे चिन्तामणि के सबसे करीबी आदमी हैं. वे अकसर यह सफाई देते, ‘‘मैं चिन्तामणि जी के कवि रूप का प्रशंसक हूं. उनके सम्पादक के रूप से मुझे कुछ लेना देना नहीं.’’


यह सफाई किसी के गले नहीं उतरती थी. कुछ महीने पहले जब से उन्होंने सेकेण्ड हैण्ड कार खरीदी है तब से उन्हें सम्पादकीय विभाग में ‘चमचा नम्बर वन’ कहा जाने लगा है. लोगों का कहना है कि चिन्तामणि ने तिकड़म करके उनकी कार खरीदवायी है वरना हिन्दी का एक चिरकुट पत्रकार, वह भी डेस्क पर काम करने वाला, कार कैसे खरीद सकता है. चिन्तामणि की कृपा से ही केएनटी को डेस्क पर होने के बावजूद पेट्रोल का खर्च मिल रहा था.


छः बजने से दस मिनट पहले ही सम्पादकीय के लोग आडिटोरियम की ओर जाने लगे. केएनटी उठे और बाथरूम में घुस गये. वे सबसे अंत में जाना चाहते थे. उनकी योजना थी कि सबसे आखिरी पंक्ति में बैठेंगे और मीटिंग खत्म होते ही वहां से तुरंत कट लेंगे. असल में वे इस बात से डरे हुए थे कि कहीं चिन्तामणि सबके सामने उन्हें टोक न दें या बुला कर बात न करने लगें. हालांकि आज से पहले तक यही सब उन्हें बहुत अच्छा लगता था.


छः बजते बजते जब आडिटोरियम भर गया तब मंच पर महाप्रबंधक अग्रवाल साहब और उनके पीछे पीछे चिन्तामणि ने प्रवेश किया. चिन्तामणि कुछ इस तरह चल रहे थे जैसे वे कैदी हों और उन्हें जबरदस्ती खींच कर लाया जा रहा हो.


हाल में फुसफुसाहट हुई. आखिरी पंक्ति में बैठे केएनटी ने सुना, कोई कह रहा था, ‘‘बुड्ढा बहुत दुखी है. लगता है उसकी पिटाई हुई है.’’


किसी और ने कहा, ‘‘घर में या दफ्तर में?’’


‘‘घर में यार. उसकी बीवी ने उसकी पिटाई की होगी. उसे पता चल गया होगा कि बुड्ढे की नौकरी जाने वाली है.’’


चिन्तामणि की उम्र यूं तो पचपन साल थी पर देखने में वे सत्तर से कम नहीं लगते थे. इसलिए सब उन्हें बुड्ढा कहते थे. वे एक बुड्ढे की तरह चलते थे, बोलते थे और सोचते थे.


‘‘साथियो!’’ माइक पर अग्रवाल साहब की आवाज गूंजी, ‘‘आज हम सब एक खास मकसद से यहां इकट्ठा हुए हैं. हम सबके लिए यह एक दुखद खबर है कि हमारे अखबार के सम्पादक माननीय श्री चिन्तामणि जी ने सेवामुक्त होने का निर्णय किया है. अब वे स्वतंत्र रूप से साहित्य की सेवा करना चाहते हैं. पर प्रबंधन की इच्छा है कि सलाहाकार के रूप में जुड़े रह कर इस अखबार को अपना अमूल्य योगदान करते रहें.’’


अग्रवाल साहब एक एक शब्द को च्युंइगम की तरह चबा रहे थे. उनके हर शब्द से कांइयांपन टपकता था. जब चिन्तामणि बोलने के लिए खड़े हुए, केएनटी ने नजरें नीची कर लीं. एक अजीब थरथराहट उनके भीतर रेंग गयी. चिन्तामणि ने बोलना शुरू किया, ‘‘मित्रो, आप सबका जो स्नेह मुझे मिला है, वह मैं भूल नहीं सकता. जीवन में कई बार कई मोड़ पर आदमी ऐसे निर्णय करता है जो दूसरों को अप्रत्याशित लग सकता है....’’


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(संजय कुंदन की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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