भूलभुलैया: जिन्दगी की हलचल के बीच, दरारों में भूत रहते हैं

भूलभुलैया: जिन्दगी की हलचल के बीच, दरारों में भूत रहते हैं

इस पुराने शहर में पुश्त दर पुश्त रहने वाले खानदान के शजर, बीते हुए जमाने के किसी इकलौते पल में नजरबंद. उनके बाद इस पुराने पेड़ पर बचा हुआ आखिरी समर, मैं. मेरे बाद कोई नहीं. क्योंकि इस दरख्त पर फिर कोई फल नहीं लगा.

By: | Updated: 08 Sep 2017 04:37 PM

घंटों सकीना और मैं बड़े कमरे में बंद रहते थे. उसका गाना और मेरा नाचना! कसम से कहती हूं, किसी तरह से खत्म ही नहीं होता था. कैसा जुनून था जो उन दिनों मुझ पर हावी रहता था. पता नहीं कहां से यह नाचने का शौक मेरे सीने में उमड़ा था. क्या यह उन्हीं मिरासनों की देन थी, जो हवेली में शाम को आया करती थीं, या इस शौक की जड़ें किसी दूसरी गहरी, पोशीदा जगह तक पहुंची हुई थीं?


भूलभुलैया


सारा राय 


Bhul Bhulaiya


यह बनारस शहर है, काशी नगरी. शिव जी भगवान के त्रिशूल पर टिकी हुई. दुनिया के पुराने शहरों में बेमिसाल. वक्त की शुरुआत से यहां जिन्दगी और मौत का कारोबार चल रहा है. बनारस नगरी जिन्दा है, मरे हुए और मरते हुओं को पनाह देती हुई. गलियों को भूलभुलैया में लोगों का हुजूम. बनारस शहर में मरने की तमन्ना लिए जीते हुए लोगों का यह समंदर है. जो यहां मरेगा वह स्वर्ग जाएगा, जन्नत पहुंचेगा. यह यकीन सच की तरह पुराना है. यहां रहते रहते मैं भी इसे मानने लगी हूं. यकीन ही तो आखिरी सच्चाई है.


भूतों की नगरी. सदियों पहले मरी हुई औरतें खामोशी से अपने घने बाल आसमान पर फैला देती हैं. सायों के सांस लेने से हवा भारी हो जाती है. शाम को ढलते सूरज की लाली में यह साए कलश और मीनार और बुर्ज पर झुक आते हैं. घिसे हुए पत्थर की सीढ़ी के नीचे हौज का पानी मटियाले से गाढ़ा हरा हो जाता है; उसमें से उठती काई और कीचड़ की बू सदियों से हवा पर ठहरी है. उधर गली में पतंग उड़ाते हुए बच्चे की उंगली मंझे से कट जाती है तो हजारों साल पुराना खून उसमें से बहता है.


ढहती हुई इमारतों के पैर इसी सदी में गड़े हैं मगर दरीचे किसी और आसमान के नीचे खुलते हैं. शहर का यह गुंजान फैलाव, तारीख की किताब के पन्ने की तरह. यहां के आवाम की जिन्दगी अपनी लय के साथ उस पर से गुजरती है. वक्त की तहरीर है, शहर का यह फैलाव. और एक सदी से दूसरी तक फैली जिन्दगी की हलचल के बीच, दरारों में भूत रहते हैं.


भूतों की भीड़ में, अपने खामोश कोने में मैं अभी जिन्दा सलामत हूं. शायद वक्त की शुरुआत से ही यहां कायम हूं. मैं, कुलसूम बानो, साकिन नूर मंजिल, 18/20 औसानगंज, कबीरचौरा अस्पताल के पीछे, पीपल के बुड्ढे पेड़ की सीध में. कुलसूम बानो, सय्यद नसीम हैदर की सबसे बड़ी बेटी, वह देखो, अब्बा हुजूर की तसवीर दीवार पर अब भी टंगी है, झुलसते हुए पीले कागज को हल्के से थामे. काशमीरी रोंयेदार टोपी और जामावार दोशाला. किले की दीवारों जैसे कंधे. शानदार मूंछें. उनके चालीस गांव और दर्जन कोठियां तसवीर में नहीं हैं मगर उनसे छलका हुआ रोब सय्यद नसीम हैदर के चेहरे पर नक्श है.


इस पुराने शहर में पुश्त दर पुश्त रहने वाले खानदान के शजर, बीते हुए जमाने के किसी इकलौते पल में नजरबंद. उनके बाद इस पुराने पेड़ पर बचा हुआ आखिरी समर, मैं. मेरे बाद कोई नहीं. क्योंकि इस दरख्त पर फिर कोई फल नहीं लगा. कल वह लड़की मुझसे मिलने आयी थी, मर्दों का लिबास पहने दुबली पतली, कटे बाल, चश्मा लगाये, शक्ल हूबहू गौरेया की तरह! आते ही मेरे चेहरे को बड़े गौर से देखती है, मेरी कागज जैसी जर्द खाल पर पड़ी गहरी खाइयों और मेरी आंखों की बेरौनक वादियों को. जैसे कि मैं अभी अभी अपने बिल से निकले किसी गुमशुदा जानवर की नस्ल से हूं. फिर पूछती है, ‘‘आप कैसी हैं, आपा बेगम?’’


इस अंदाज में मानो वह मेरी बरसों की मुलाकाती हो.


बिल में बंद रहते हुए जानवर की ही बदमिजाजी के साथ मैं गुर्रायी – ‘‘मैं बहुत बुरी हूं; बद से बदतरीन, बददिमाग, बदतमीज, निहायत बदअख्लाक, एक बेइंतिहा तकलीफदेह बुढ़िया, बेशर्मी से जिये जा रही हूं, जीने वालों पर बोझ, खाक से भी कमतर, एकदम ही गयी गुजरी, नाकाबिले बर्दाश्त...’’ मैं इसी तर्ज में और बोलती चली जाती मगर उसका बौखलाया हुआ चेहरा देख कर चुप हो गयी. मेरी बात सुन कर वह एकदम सकपका गयी थी, मुंह खुला का खुला, उसमें से एक आवाज नहीं, जैसे कि उसे सांप सूंघ गया हो!


फिर उसने दोबारा कोशिश की, हिम्मत तो देखो, उसने मेरी तरफ एक हाथ बढ़ाया, उंगलियों को प्याले की शक्ल में बांध कर, और बोली, ‘‘इजाजत हो तो आपसे थोड़ी सी बातें करना चाहती हूं...’’ मैंने कहा, ‘‘थोड़ी सी से तुम्हारी क्या मुराद? पाव भर, आध सेर, सेर भर...?’’


बेचारी! वह फिर मेरा मुंह ताकने लगी, सिट्टी पिट्टी गुम. दो ही जुमलों में मैंने उसे शहीद कर दिया. इस ख्याल से मेरे चेहरे की झुर्रियां मुस्कुराहट में फट पड़ीं. तब लगा जैसे उसे इत्मीनान हुआ और वह भी जरा हंसी. बिल्कुल चहचहाती हुई सी गौरेया.


‘‘असल में, मैं पुराने घरों और उनमें रहने वालों पर मजमून लिख रही हूं, अखबार के लिए. कुछ सवाल पूछना चाहती थी...’’


‘‘आसानी से जान नहीं छूटने वाली. अच्छा भाई, तो लो पूछो. पूछ लो फिर अपना रास्ता लो तो मैं भी चैन की सांस लूं. उसके बाद न किसी का यहां आना, न मेरा कहीं जाना. किस्सा हुआ खत्म, अल्ला अल्ला खैर सल्ला!’’ मेरा इतना कहना था कि उसने कंधे पर टंगे अपने बैग से एक छोटी सी काली डिब्बानुमा चीज निकाली और बोलीµ ‘‘गुस्ताखी माफ करें तो आपकी बातें रिकार्ड कर लूं?’’


तो अब मेरी आवाज भी बंद करके ले जायेगी यह लड़की.


पूरी किताब फ्री में जगरनॉट ऐप पर पढ़ें. ऐप डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें.


(सारा राय की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

फटाफट ख़बरों के लिए हमे फॉलो करें फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस पर और डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App
Web Title:
Read all latest Juggernaut News headlines in Hindi. Also don’t miss today’s Hindi News.

First Published:
Next Story पुलिया पर बैठा आदमी: यही एक जगह उसे बैठने लायक लगती है