पुलिया पर बैठा आदमी: यही एक जगह उसे बैठने लायक लगती है | Read Sarat Chandra Chattopadhyay's story Puliya Par Baitha Aadmi

पुलिया पर बैठा आदमी: यही एक जगह उसे बैठने लायक लगती है

‘‘मैं तुमसे सवाल करूँगा, जो मेरे पास नहीं है और जो मैं नहीं करना चाहता. फिर तुम मुझे जवाब दोगे जिसे मैं नहीं सुनना चाहता और जिसे सुनना ज़रूरी भी नहीं है. क्या तुम पागल हो?’’

By: | Updated: 16 Dec 2017 04:00 PM
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पुलिया पर बैठा आदमी


शरतचंद्र


puliya par baitha aadmi


वह एक पुलिया पर बैठा हुआ था. इस पूरे क्षेत्र में यही एक जगह उसे बैठने लायक लगती है और वह अक्सर ही यहां आकर बैठ जाता था. शुरू-शुरू में वह पुलिया से गुज़रती कारों, साइकिलों या लड़कियों को गौर से देखता था पर अब वह ऐसा नहीं करता था. यहां बैठे-बैठे वह इस शहर की सब कारों, साइकिलों और लड़कियों को देख चुका था और अब उसके लिए देखने को कुछ नहीं रह गया था. फिर भी वह इस पुलिया पर बैठा रहता था. वह कोई नौकरी नहीं करता था. वह सारी उन नौकरियों को, जो नहीं मिलतीं, खोज चुका था. वह अब भी उन नौकरियों को खोज सकता था, जो नहीं मिलतीं, पर ऐसा न कर वह पुलिया पर बैठा रहता था.


 एक सुबह एक नेता किस्म का व्यक्ति उसके पास आया और बोला, ‘‘क्या तुम मुझसे सवाल पूछ सकते हो?’’


‘‘मुझे कोई सवाल नहीं पूछना.’’ उसने कहा.  ‘‘मैं तुम्हें सवाल बताऊँगा जो तुम मुझसे पूछोगे.’’


‘‘उससे क्या होगा?’’


‘‘मैं जवाब दूँगा.’’


‘‘तुम खुद अपने से सवाल क्यों नहीं पूछते?’’


‘‘ऐसा नहीं होता. सवाल किसी और को करना पड़ता है. मैं जवाब दूँगा.’’


‘‘मगर मैं जवाब नहीं सुनना चाहता.’’


‘‘तुम चाहे मत सुनना. तुम सिर्फ सवाल करना.’’


‘‘मगर इस सबका मतलब क्या है?’’


‘‘तुम्हें इससे मतलब!’’


‘‘मैं तुमसे सवाल करूँगा, जो मेरे पास नहीं है और जो मैं नहीं करना चाहता. फिर तुम मुझे जवाब दोगे जिसे मैं नहीं सुनना चाहता और जिसे सुनना ज़रूरी भी नहीं है. क्या तुम पागल हो?’’


‘‘नहीं, मैं नेता हूँ.’’


पुलिया पर बैठा शख्स नेता की ओर ताज्जुब से देखने लगा.


‘‘तुम मेरे साथ आओ. तुम्हें सिर्फ सवाल पूछना है. इसके बदले में मैं तुम्हें रुपए दूँगा.’’ नेता ने उससे कहा.


‘‘यह हुई बात!’’ पुलिया पर बैठा आदमी मुस्कराया, ‘‘तुम मुझे सवाल भी दोगे और वे ही सवाल करने के बदले रुपया दोगे. ऐसी हालत में हो सकता है मैं जवाब सुनना पसन्द भी करूँ. लाओ, एक रुपया दो, मैं सिगरेट की डिब्बी खरीदूँगा.’’


नेता ने उसे रुपया निकालकर दिया. वह पुलिया से उठा और एक डिबिया सिगरेट और माचिस खरीद कश खींचता नेता के पीछे चल पड़ा. कुछ कदम चलने के बाद उसने नेता को रोका और कहा, ‘‘देखिए, चूँकि रुपया आप दे रहे हैं सो चाहें तो आप सवाल कर सकते हैं, जवाब मैं दे दूँगा. मैंने सुना है कि नौकरी में यही होता है कि जो रुपया देता है उसे सवाल करने का हक होता है और जिसे रुपया मिलता है उसे जवाब देना होता है.’


‘‘नहीं. ऐसा नहीं होगा. तुम अपना कर्तव्य मत भूलो. सवाल तुम्हें ही करना है.’’ और वह आगे-आगे चलने लगा.


कुछ देर बाद शहर में एक भीड़ के सामने वही नेता भाषण दे रहा था और पुलिया से उठकर आया आदमी उसी भीड़ में खड़ा था. भाषण लम्बा था और वह व्यक्ति खड़े-खड़े ऊबने लगा था. फिर भी वह बार-बार सिगरेट जलाता हुआ चुप खड़ा था. नेता ने अपना भाषण खत्म कर पूछा, ‘‘आप लोगों में से कोई व्यक्ति मुझसे कोई सवाल पूछना चाहता है?’’


सवाल करने के लिए खड़े शख्स ने समझा कि नेता उसे भीड़ में देख नहीं पा रहा है. उसने हाथ उठाकर कहा, ‘‘मैं हूँ, मैं हूँ. मैं यहां खड़ा हूँ. सवाल मुझे पूछना है.’’


नेता अपनी खास नेतावाली अदा से मुस्कराया, ‘‘हां-हां, पूछिए, पूछिए क्या सवाल है?’’


सवाल करनेवाले शख्स ने पूछा, ‘‘पहला सवाल यह है श्रीमान कि आज़ादी के बाद हमारा देश प्रगति नहीं कर सका, हम ज्यों के त्यों बने रहे, इसका क्या कारण है?’’


नेता अपनी खास नेतावाली अदा से विचार करने लगा और फिर जैसे सोचकर बोला, ‘‘इसका कारण है कि इस देश को काबिल नेता नहीं मिले. जैसे मुझे ही लीजिए. आज़ादी के वक्त मैं एक फर्म में सेक्रेटरी था और काफी वर्ष रहा. हमारी फर्म के मालिक समझते थे कि इन नेताओं से काम चल जाएगा और देश आगे बढ़ेगा मगर इधर कुछ सालों से हमें अनुभव हुआ कि हम गलत सोच रहे थे. सेठ साहब ने मुझको बोला कि तुम नेता बनो तो उनकी आज्ञा से मैं पॉलिटिक्स में आया. और भी ऐसे नए-नए नेता आ रहे हैं. कुछ ठेकेदारी छोड़कर आ रहे हैं, कुछ कारखाना छोड़कर. इससे देश का उत्थान होगा और देश आगे बढ़ेगा. पुराने नेताओं की वजह से प्रगति नहीं हो सकी थी. अब ज़रूर होगी.’’


‘‘आप ठीक कह रहे हैं, बिलकुल ठीक कह रहे हैं, वाह वाह!’’ – भीड़ में से दो-तीन व्यक्ति चिल्लाए. फिर भीड़ भी नेता के इस उत्तर की प्रशंसा करने लगी. भीड़ में खड़ा सवाल करनेवाला एकाएक चैंका और बोला, ‘‘हां, दूसरा सवाल यह है कि आपकी नज़र में आज देश की सबसे बड़ी ज़रूरत क्या है?’’


‘‘छोटी कार, छोटी कार!’’ नेता ने एकदम कहा, ‘‘उस बारे में हमारे सेठ साहब अक्सर बोलते थे कि इस देश में छोटी कार का कारखाना होना चाहिए. सबसे बड़ी ज़रूरत है. टेलीविज़न का काम फैलना चाहिए, रेफ्रीजरेटर अभी घर-घर नहीं पहुँचा, बहुत कमी है इस देश में. पब्लिक प्रोग्रेस नहीं कर रही है.’’


‘‘सच है, सच है!’’ भीड़ में से दो-तीन व्यक्ति चिल्लाए, ‘‘आपके विचार बिलकुल ठीक हैं.’’


पुलिया से उठकर आए व्यक्ति की जेब में सिर्फ एक सिगरेट बची थी और उसने वह निकाल जला ली. तभी नेता ज़ोर-ज़ोर से पूछने लगा, ‘‘कोई और सवाल, कोई और सवाल?’’


उसने सिगरेट पीते हुए हिसाब लगाया कि वह अभी तक दो ही सवाल पूछ सका है जबकि उसने तीन सवाल दिए गए थे. वह भूल गया कि तीसरा सवाल क्या है? नेता इधर बार-बार चिल्ला रहा था.


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(शरतचंद्र की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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Web Title: Read Sarat Chandra Chattopadhyay’s story Puliya Par Baitha Aadmi
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