लव और सियासत: अफवाहों के गिद्ध पूरे शहर पर मंडराने लगे

लव और सियासत: अफवाहों के गिद्ध पूरे शहर पर मंडराने लगे

यह ऐसा शहर था, जहां कभी दंगा नहीं होता था, जहां लोग मिलजुल कर रहते थे. हां, डकैतों का तांडव ज़रूर था, लेकिन वह एक दूसरी बात थी. ऐसे शहर में सुबह सवेरे पुलिस के सायरन के माने!

By: | Updated: 10 Sep 2017 12:57 PM

रोहित और किशोर बचपन के दोस्त थे, लेकिन आगे चल कर एक को शोहरत हासिल मिलती थी और दूसरे की किस्मत में बस एक बदनाम जिंदगी आनी थी. शालू उन्हें जोड़ने वाली पुल थी, जिसे दोनों ही प्यार करते थे. लेकिन उस दिन ऐसा क्या हो गया कि इस पुल की तरफ बढ़े दोनों के कदमों ने अलग अलग रास्तों पर चलती उनकी जिंदगियों को एक ऐसी मंजिल पर पहुंचा दिया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी.


लव और सियासत


सोनाली मिश्रा


Love Aur Siyasat


उस दिन रोज़ की तरह सुबह हुई थी. सूरज उतना ही लाल था! उस शहर के मंदिरों पर उसी तरह से धूप रोज़ की तरह ही छाती जा रही थी. सुबह गुलाबी होने लगी थी. मस्जिदों से अजान भी आने लगी थी. उस अजान का जवाब देने के लिए मातारानी की आरती भी रोज़ की तरह ही शहरों की गलियों में पसरने लगी थी. मगर इस मंदिर की घंटी में कुछ तो ऐसा था तो असहज था. वह शहर सुबह-सुबह पुलिस के सायरन से थर्रा उठा. सायरन की आवाज़ कुकर की सीटी की आवाज़ों के साथ घुल गई थी. आज वकील साहब के घर की तरफ पुलिस की गाड़ियां जा रही थीं.


यह ऐसा शहर था, जहां कभी दंगा नहीं होता था, जहां लोग मिलजुल कर रहते थे. हां, डकैतों का तांडव ज़रूर था, लेकिन वह एक दूसरी बात थी. ऐसे शहर में सुबह सवेरे पुलिस के सायरन के माने!


माने, बहुत कुछ गड़बड़!


अफवाहें फैलने लगी थीं. अफवाहों के गिद्ध पूरे शहर पर मंडराने लगे. क्या हुआ, क्या हुआ? से पूरा शहर एकदम चौकन्ना हो गया. उमस भर गई थी शहर में. वकील साहब की कोठी में शोर मच गया!


“खून, खून” हल्ला मच रहा था. कोठी के अंदर पहुंच चुकी पुलिस के सामने थीं खून से लथपथ दो लाशें और अस्तव्यस्त सी शालू, शालू माने वकील साहब की बहू और रोहित की बीवी.


लाशें थीं रोहित और डाकू राका की. उन्हें देख कर कांप रही थीं दो आंखें, जिन्होंने इसे पूरी रात देखा था. ये रूपा की आंखें थीं, जिनमें इन दोनों की दोस्ती के किस्से थे. कांप रहे थे होंठ. कांप रहा था अधनंगा शरीर, जिसे महिला पुलिसकर्मियों ने पकड़ा हुआ था...


और इस दृश्य को देखकर कांप गया था शहर. पर हुआ क्या था? क्या हुआ होगा? सबकी जुबान पर सवालों का सिलसिला था!


इसका जवाब केवल रूपा के पास था, मगर उसकी पथराई आंखों में कहानी दब चुकी थी. यहां तक कि पुलिस भी मजबूर थी.


उस दिन भी दूधिए रोज़ की तरह हैंडपंप जांचने लगे थे. इस कस्बे नुमा शहर में कुछ पार्क बन गए थे, अब नए बसे मुहल्लों में घरों में आंगन नहीं था, अहाता नहीं था, तो बस लोग योग करने के लिए पार्कों की तलाश में घर से निकलने लगे थे.


बीहड़ में बसा यह शहर आम तौर पर शांत रहता था. इसी शहर के बीचोबीच बसे एक पॉश मोहल्ले में वकील साहब की कोठी थी. उस कोठी के साथ अंग्रेज़ों के ज़माने से जुड़ा हुआ सम्मान था. वकील साहब की कोठी में बाहर से बदलाव हो चुका था, पहले नीम और गुलमोहर और आम के पेड़ थे और अब उनकी बहू शालू के एनजीओ का दफ्तर था. उस गुलमोहर ने रामानंद सागर के रामायण से लेकर आज तक का काफी लंबा सफर तय किया था. काफी कुछ बदला था, जिसका वह गवाह था.


आज उसी कोठी में पुलिस थी जो राका और रोहित की लाशों को पंचनामे के लिए ले जा रही थी. आज ख़बरों की सुर्खियां बन गई थी वह कोठी. अभी तक बीहड़ों की रेत बीहड़ तक हुआ करती थी, टीलों पर बसे इस ऊबड़ खाबड़ शहर का हिस्सा नहीं बन पाई थी. पर उस दिन गुलमोहर ने उस रेत को शहर का हिस्सा बनते हुए देखा.


अचानक ही दूधियों की आवाजाही वकील साहब की कोठी की तरफ हो गई. वे रिक्शेवाले जो अपनी अपनी सवारियों को लेने जा रहे थे, उसी कोठी की तरफ मुड़ गए. आखिर क्या हो रहा था, एकदम से रेतीला समंदर क्यों उस तरफ चला आया था.


“वकील साहब के यहां पुलिस आई है! रोहित का क़त्ल हो गया है!”


लगभग हर दूसरे पानवाले और दूधवाले के मुंह पर यही था.


“मगर राका भी मरा मिला है?” किसी ने कहा.


“राका?” सबके मुंह खुले के खुले रह गए.


“वह डाकू? और इतनी रात गए वकील साहब के यहां?” चाय वाले के हाथ से चाय गिर गई.


“और क्या?” पुलिस की बात सुनकर आए एक मुसाफिर ने कहा.


उस शहर में वकील साहब का परिवार आज का तो था नहीं, वो तो इस शहर के बनने से था. सुना करते थे कि जब चंबल के किनारे जंगल हुआ करता था और शहर के बारे में केवल सोचा ही जा रहा था, बड़े वकील साहब अपने घर के बाहर फिरते हुए तेंदुओं के बारे में बड़े ही गर्व से बताते थे.


ऐसा भी सुना जाता है कि शहर में होली और दीवाली की शुरुआत भी पहले उन्हीं की कोठी से होती थी. मगर आबादी तो आबादी को देखकर बढ़ती है. वह साथी हाथ बढ़ाना की तरह आगे बढ़ती है. फिर धीरे-धीरे तेंदुए और भेड़िए सिमटते चले गए और इंसानी जंगल बसते चले गए. अब तो यह शहर अजीब हो गया है, कस्बेनुमा शहर.


मंदिरों की घंटियों से पूरा शहर गुलज़ार रहता था. कुल जमा तीन चार मंदिर थे, सभी मंदिर या तो बीहड़ में थे या बीहड़ों की सीमा पर. पर न जाने कैसे शहर में घंटियों की आवाज़ आने लगती थी. और उन घंटियों में जाप करता हुआ उठ जाता था वह शहर. अजीब ही आबोहवा थी, ठसक थी, किस्से थे, कहानियां थीं. यहां तक कि वकील साहब के परिवार की भी कहानियां थीं. मगर फिर भी शहर प्यारा था.


जब एक घर में धूप उतरती थी तो पूरे मोहल्ले में पापड़ सुखाने की जुगत लगने लगती थी. बीहड़ की गोद में बसा हुआ यह शहर कुछ गुलाबी था, वह स्वागत करने वाला शहर था. उसमें सपने गुलाबी थे, उसमें बांहें गुलाबी थीं. सच यह शहर किन्हीं मामलों में एकदम गुलाब ही था.


मगर उस गुलाब में एक कांटा भी था. आखिर वह कांटा था क्या?


उस शहर में एक अजीब सी दहशत आखिर क्यों थी?


क्या उस दहशत का रिश्ता सुबह सुबह मिली इन लाशों से था? हां, हो सकता था और नहीं भी! वैसे इस शहर में ऐसी वीभत्स कांड होते रहते थे, जब किसी न किसी घर से पैसों भरा बैग बीहड़ों में जाता था और उसके बदले में मिल जाता था, सुरक्षित जीवन का आश्वासन! जैसे एक मैना और गौरैया को गिद्ध ने जीवन दे दिया हो. और गौरैया थोड़े दिनों के लिए मुक्त उड़ान भरने के लिए आज़ाद हो जाती थी, तब तक जब तक गिद्ध दोबारा से उस पर अपनी नज़र न गड़ा दे.


वे लोग अपना गाढ़ा धन बीहड़ों में दान देने के लिए ही इस्तेमाल कर रहे थे. बीहड़ों में खूब चढ़ावा चढ़ता था. मगर कुछ हिसाब भी था क्या?


शायद हां? हिसाब तो था ही!


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(सोनाली मिश्रा के उपन्यास का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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