रुद्राक्ष पल्लवी: वो कुछ गाने लगती थी

रुद्राक्ष पल्लवी: वो कुछ गाने लगती थी

अपनी खोली के बाहर जब वो आलू को बेसन के घोल से नहला रही होती थी, तब उसके दिल में एक हलक़ेपन का एहसास होता था. वो भूल जाती थी अपने मां-बाप को, अपनी बचपन की गुड़िया और अनाथालय की मार को.

By: | Updated: 17 Apr 2018 04:09 PM
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शिवा ने चाहा था कि कीमती रुद्राक्ष बेच कर वह जल्दी से पैसे वाला बन जाएगा और अपने प्यार पल्लवी को सुखी जिंदगी दे पाएगी. लेकिन ऐसा क्या हुआ कि उसके हाथ से रुद्राक्ष भी गया और पल्लवी का प्यार भी खतरे में पड़ गया?


रुद्राक्ष पल्लवी


सोनम गुप्ता



बंबई शहर नहीं है. बंबई वो समंदर है जिसके किनारे कोई नहीं है. या तो आप बंबई नाम के समंदर में डूब जाते हैं या उसकी सतह पर तैरते रहते हैं. तैरने वाले कम हैं, बहुत कम. डूब जाने वाले सैकड़ों हैं. डूब जाना आसान भी है और ज़रूरी भी. सतह से इसकी लहरों को देखना सबके बस की बात नहीं है. शिवा डूबा हुआ था, पल्लो के ज़ुल्फ़ों में और सोच रहा था कि काश वो उठ के एक प्याली चाय बना दे. पल्लो की ज़ुल्फ़ों से तले हुए बटाटा वड़ों की तेज़ ख़ुशबू आ रही थी. अपना और अपने भाई राजू का पेट पालने के लिए पल्लो बटाटा वड़े बनाया करती थी. अंधेरे-अंधेरे उठ कर, आलू उबालकर, गरम छिलकों से गरम गुदे को छुड़ाती हुई, बेसन के घोल को अपनी छोटी-छोटी ऊंगलियों के बीच नापती-लिपटाती हुई, पल्लो भूल ही चुकी थी कि उसका नाम पल्लवी मिश्रा था.


मां-बाप की क़िस्मत शायद पल्लो से बेहतर थी. ‘91 के दंगों में उन्हें मुक्ति मिल गई. घर जल गया था और पल्लो पांच साल की थी. अनाथाश्रम की बाईजी खाने को नहीं देतीं थीं. किसी अनजान के घर गोद दिए जाने के डर को बेचारी पल्लो कुछ ही महीनों में समझ गई थी. उसकी उम्र के बच्चे अपनी सुंदरता के हिसाब से चुन लिए जाते थे. लेकिन जैसे भाजीवाले की टोकरी से टेढ़े टमाटर नहीं बिक पाते, वैसे ही बदसूरत और विकलांग बच्चों के लिए किसी के घर में जगह नहीं थी. पल्लो अपाहिज नहीं थी, काली थी. हमारे देश में लड़कियों का रंग काला होना इतना ज़्यादा अवांछनीय है कि हम काले की बजाए “सांवले” शब्द का प्रयोग करते हैं. लेकिन पल्लो को किसी तरह की कोई ग़लतफ़हमी नहीं थी. उसका रंग काला था, उसकी आंखें भूरी थीं, उसके होंठ कुछ मोटे पर सुडौल थे और उसकी आवाज़ मीठी थी.


अपनी खोली के बाहर जब वो आलू को बेसन के घोल से नहला रही होती थी, तब उसके दिल में एक हलक़ेपन का एहसास होता था. वो भूल जाती थी अपने मां-बाप को, अपनी बचपन की गुड़िया और अनाथालय की मार को. उसके दिल पे रखे सभी पत्थर कहीं ग़ायब हो जाते थे और वो उड़ता हुआ उसके गले तक जा पहुंचता था. तब उसके गले से मीठे स्वर बजने लगते थे और वो कुछ गाने लगती थी. पल्लो के गाने के हलक़ेपन का ये आलम था कि उसे अल्फ़ाज़ों की भी ज़रूरत नहीं पड़ती थी. ह्म्म्म्मम और ओऽ की मधुर जुगलबंदी रोज़ सुबह उन आलुओं को कुछ कम समय में ही गला देती थी. फिर उन हाथों से मसले जाने का ग़म भी कम हो जाता था. अपने इस अतिसाधारण बिज़नेस को पल्लो इतना रस लेकर करती थी कि चाल भर के लोग या तो उससे जलते थे या उसकी ‘कला’ के दीवाने थे!


पल्लो सिर्फ़ बटाटा वड़े बनाती थी, उन्हें बेचने के लिए ठेला नहीं लगाती थी. शुरुआत में इतने पैसे नहीं थे और बाद में ज़रूरत नहीं थी क्यूंकि बाबा नाम का एक बटाटा वड़े का दलाल उसके वड़े ख़रीद कर आगे और दुकानों में बेचता था. बाबा की अपनी भी एक दुकान थी. कुछ वड़े वो अपनी दुकान में भी बेचता था. देखा जाए तो ये सौदा पल्लो के लिए घाटे का था. दो रुपए में जो वड़ा पल्लो से ख़रीदता था, वही पांच रुपए में अपनी दुकान पे बेचता था.


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(सोनम गुप्ता की कहानी का यह अंश जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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