नाटक बाल भगवान: धार्मिक पाखंड के खिलाफ एक आवाज

नाटक बाल भगवान: धार्मिक पाखंड के खिलाफ एक आवाज

धर्म के प्रकाश की लपलपाती तलवार देखते ही, इन काली और अँधेरी शक्तियों की सदा पराजय होती रही है.

By: | Updated: 23 Sep 2017 07:22 PM

नाटक बाल भगवान 


स्वदेश दीपक


natak baal bhagwan


पूर्व-कथन


मंच पर अँधेरा. धीमी आवाज़ में बलि के समय बजनेवाला संगीत. पुजारी के वस्त्रों में एक व्यक्ति का प्रवेश. लकड़ी के दो मोटे साँचों के आगे उसने शीश नवाया. साँचों के ऊपरी भाग पर हल्का प्रकाश. गहरे लाल रंग के बड़े और गोल निशान. क्योंकि इन साँचों के ऊपर बलि के समय पशु-सिर काटे जाते हैं.


बलि के संगीत के साथ-साथ अब हुआँ-हुआँ की उभरती आवाज़ें. पुजारी ने चौकन्नी दृष्टि मंच पर घुमाई. कुछ आकृतियों का काले वस्त्रों में मंच पर प्रवेश. यह आकृतियाँ पुजारी के आसपास घेरे में खड़ी हो गईं. अब हुआँ-हुआँ की आवाज़ें यह आकृतियाँ निकाल रही हैं. घेरा धीरे-धीरे छोटा होता है. बलि-संगीत इनकी गुर्राहटों में डूब जाता है. 


आक्रमण की मुद्रा में शरीर-कोण बदलती आकृतियाँ. अब पुजारी के चेहरे पर उछलकर पड़ता प्रकाश-वृत्त. चेहरा तेज से दीप्त और आँखों में आवेश. किसी पत्थर-युग के मानव की तरह बलिष्ठ शरीर. वह अहेरी की चौकस निगाहों से छोटा होता घेरा देख रहा है. शरीर धीरे-धीरे हिलना आरंभ, भय से नहीं, आक्रमण की तैयारी करते हुए.


काली आकृतियाँ समीप आईं, पुजारी ने मारने की मुद्रा में उनकी ओर देखा, आगे बढ़ा-भय से पीछे हटती आकृतियाँ. संगीत में जंगल की आवाज़ों का मिश्रण. हुआँ-हुआँ की आवाज़ें. आवाज़ें अब तेज़ और ऊँची. घेरा तंग हो गया. पुजारी पर आक्रमण हुआ कि हुआ. पुजारी झटके से नीचे झुका. खड्ग उठाया. हिलते खड्ग पर प्रकाश.


उसके मुँह से क्रोध भरी हिंसक हुंकार और चीख़ निकली. जंगल-संगीत बंद. आकृतियां मंच से भाग गईं. बलि-संगीत फिर से आरंभ. उसने लकड़ी के दोनों साँचों पर तलवार से वार किया. पशु-सिर काटने का अभिनय. अब मंच पर स्थिर प्रकाश. उसने गहरी और धीरे-धीरे ऊँची उठती आवाज़ में बोलना शुरू किया. वह मंच के आगेवाले भाग तक आया. रुक गया. प्रकाश अब केवल उसके शरीर पर.


पुजारी: आओ! धर्म के सूर्य के प्रकाश में खड़े हो जाओ! हम धर्म का सहारा क्यों लेते हैं? धर्म का संबल क्यों पकड़ते हैं? भय से अथवा भक्ति से. भय का जन्म सदैव अँधेरे से होता है, अंदर भी और बाहर भी. धर्म के प्रकाश की लपलपाती तलवार देखते ही, इन काली और अँधेरी शक्तियों की सदा पराजय होती रही है. 


कभी यह धर्म-सूर्य कृष्ण की मुट्ठी में बंद, और कभी क्राइस्ट की मुट्ठी में. कभी धर्म की लपलपाती तलवार राम के हाथ में, कभी रहीम के. प्रकाश और अँधेरे का चोली-दामन का साथ है, और सदा रहेगा. भाषा के गलत प्रयोग से सूर्य को कोई अंतर नहीं पड़ता, क्योंकि सूर्य न कभी उदय होता है, न अस्त.


धरती के काले हिस्से आदिकाल से उसके सामने आते हैं, प्रार्थना करते हैं. हे सूर्य! हमारी कालिमा और कालिख धो डालो. अँधेरा चाहे कितना भी घना और गहरा हो, प्रकाश का मुट्ठी-भर छींटा इसे धो डालता है. धर्म का सूर्य धरती का काला मुँह पोंछ देता है. यह भाषा की गलती है कि सूर्य अस्त हो गया. सूर्य न उदय होता है, न अस्त. क्योंकि वह सूर्य है. अंधकार का जन्मजात शत्रु और संहारक सूर्य. अँधेरा एक ईंट है और सूर्य इसे टुकड़े-टुकड़े कर देनेवाला हथौड़ा. हथौड़े और ईंट में न कभी मित्रता हुई है, न होगी.


पूजा-संगीत और तेज़. अब नगाड़े की आवाज़ प्रमुख. अँधेरे की ख़ामोश और काली आवाज़ों ने फिर से आत्मा का घेराव शुरू कर दिया!


क्या भय ने आत्मा में सूराख करना शुरू कर दिया? तो आओ! धर्म के सूर्य के प्रकाश में खड़े हो जाओ. भय के अंधकार को प्रकाश की तलवार काटकर रख देगी. प्रकाश और अंधकार में आदिकाल से रण ठना हुआ है. अंतिम विजय सदा प्रकाश की होती है.


भाषा के गलत प्रयोग से सूर्य को कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि वह सूर्य है. अविचल, अडिग और प्रकाश का जन्मदाता सूर्य. न वह उदय होता है न अस्त. 


आओ! धर्म के सूर्य के प्रकाश में खड़े हो जाओ. भक्ति-संगीत बंद. मंच पर अँधेरा.


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(स्वदेश दीपक के नाटक का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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