सत्याग्रही और कवयित्री: हर मृत्यु के बाद वो खुद को दोबारा जीवित कर लेती थी

नुसरत किताब उठाती है और उसमें लिखा हुआ, सत्याग्रही बनने का पहला उसूल पढ़ती है, ‘हर हाल में सत्य बोलना, समाज से, दूसरों से और खासकर ख़ुद से, हर हाल में सत्य बोलना.’ इसे पढ़ नुसरत को महसूस होता है कि वह उसके साथी आंदोलनकारियों को आज तक धोखा देती आई है.

By: | Last Updated: Thursday, 12 October 2017 6:06 PM
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हर मृत्यु के बाद वो खुद को दोबारा जीवित कर लेती थी. क्या इस बार भी वो ऐसा कर पाएगी?

सत्याग्रही और कवयित्री

उत्कर्ष अरोड़ा

Satyagrahi

नुसरत शाह एक सत्याग्रही थी. नुसरत ने दो समलैंगिक पुरुषों की मौत पर की गई ढीली सरकारी जांच पर जब महीनों तक अभियान चलाया तो एक दिन कुछ उपद्रवियों ने उसके घर आकर, पीट-पीट कर, उसे जान से मार डाला. शाह ने एक सच्चे सत्याग्रही के आदर्शानुसार अपने हमलावरों की उसके अभियान को रोकने की इच्छा को अहिंसक तौर-तरीकों से नकारा इसलिए ही शायद उन्होंने ऐसी अनपेक्षित हिंसा दर्शाई.

हालांकि, मुझे आपको यह भी तुरंत साफ कर देना चाहिए कि नुसरत शाह अभी ज़िंदा है.

दरअसल, नुसरत अपने शरीर की मरी हुई कोशिकाओं का, अपने ज़ख्म के आस-पास स्थित ज़िंदा कोशिकाओं को मूल कोशिकाओं में परिवर्तित करके, अधिकतम अट्ठासी घंटों में, पुनर्जनन कर लेती है और इसी प्रक्रिया से अपने मृत शरीर में, आसान भाषा में कह लीजिए, जान पुनः डाल देती है.

वैसे मुझे जब उपरोक्त जानकारी हुई तो मैंने सोचा कि नुसरत के शरीर की सभी कोशिकाओं को अगर किसी तरीके से एक क्षण के भीतर एक साथ मार दिया जाए तो वह शायद ऐसा मरे कि फिर कभी जिंदा न हो पाए. मैं इस कहानी के सभी पाठकों से विनती करता हूं कि आप यह राज़ किसी को भी न बताएं क्योंकि नुसरत मुझे पसंद है. मैं नुसरत से शादी बनाना चाहता हूं, उसके साथ एक बच्चा गोद लेकर, बच्चे को अठारह वर्ष तक पालना चाहता हूं. नुसरत के साथ ही बूढ़ा होना चाहता हूं और उसके मरने से पहले ही मरना चाहता हूं.

अपनी इस मौत के पूर्व, नुसरत ने ख़ुद को संपूर्णतः सत्याग्रह को समर्पित किया हुआ था और वह अनेकों आंदोलनों के लिए सत्याग्रह के माध्यम से लड़ना चाहती थी. पर क्योंकि दुर्भाग्यवश, उसकी मौत हो गई और वह कोशिकाओं को पुनः पैदा करके फिर से ज़िंदा भी हो गई, उसे दुनिया से बचने के लिए, अपने दो वैज्ञानिक साथियों, ल्क्ग्फ़ ढिल्लों और म्ब्व्क ढिल्लों (जुड़वा भाई-बहन) की मदद की ज़रूरत पड़ी. और इस बार भी, आशानुसार, ल्क्ग्फ़ और म्ब्व्क, नुसरत की लाश को मुर्दाघर से उसके पोस्टमार्टम से पहले ही चुरा ले आए. उन्होंने नुसरत का पूर्ण पुनर्जनन होने के उपरांत, उसकी थोड़े दिन देख-भाल करी और उसे एक नई पहचान भी दी. नुसरत ने भी पहले की तरह उन्हें अपना एक बोतल ख़ून, कुछ स्किन टिश्यू और एक प्यारी-सी मुस्कान देकर अनुग्रहित किया.

कुछ महीने बाद, बदले हुलिए में नुसरत शाह पुरानी दिल्ली रल्वे स्टेशन के 5 न. प्लेटफार्म से अपनी ट्रेन पर चढ़ने को होती है कि उसकी नज़र एक मैगज़ीन की दुकान पर पड़ती है. वहां उसे सत्याग्रह पर लिखी हुई एक पुरानी किताब चमकती है.

नुसरत किताब उठाती है और उसमें लिखा हुआ, सत्याग्रही बनने का पहला असूल पढ़ती है, ‘हर हाल में सत्य बोलना, समाज से, दूसरों से और खासकर ख़ुद से, हर हाल में सत्य बोलना.’ इसे पढ़ नुसरत को महसूस होता है कि वह उसके साथी आंदोलनकारियों को आज तक धोखा देती आई है.

नुसरत, अपनी ट्रेन छोड़, अपने ज़िंदा होने का सच दुनिया को बताने सरकारी न्यूज़ चैनल पहुंचती है और उसके इस खुलासे से देश-भर में सनसनी मच जाती है.

अगले दिन, नुसरत अपने पिछले आंदोलन के धरने पर फिर से जाकर बैठती है. नुसरत के साथी उसका गर्मजोशी से स्वागत और वाहवाही करते हैं. दिन-भर आंदोलन में बैठने के बाद नुसरत जब रात को अपने घर जा रही होती है तो कुछ लोग उसे अगवा कर लेते हैं.

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(उत्कर्ष अरोड़ा की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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