मक्खन ढाबे की मक्खी: उसके घर में रहती थी दो मक्खियां– कानू और मानु | Read Vivek Bhan Singh Jhala's story Makkhan Dhaba

मक्खन ढाबे की मक्खी: उसके घर में रहती थी दो मक्खियां– कानू और मानु

ग्राहक की नज़र पड़ी मक्खन में गिरी दो मक्खियों पर, उसने बैरे को बदलने को कहा. बैरे ने कटोरी उठाई, चम्मच से उठाकर दोनों मक्खियों को मक्खन सहित खिड़की से बाहर फेंक दिया.

By: | Updated: 20 Dec 2017 03:53 PM
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मक्खियों ने रोज रोज के नीरस और रूखे खाने से ऊब कर चाहा कि ढाबे के तर भोजन पर हाथ फेरा जाए. लेकिन वहां ऐसा क्या हुआ जिसने जीवन के प्रति उनका नजरिया ही बदल दिया?


मक्खन ढाबे की मक्खी


विवेकभान सिंह झाला


makkhan


नीमच मंदसौर हाईवे पर एक प्रसिद्ध ढाबा है - मक्खन दा ढाबा. वहां की स्वादिष्ट पंजाबी सब्जियां, दाल मखणी, तंदूरी रोटी, लच्छे परांठे और दही छाछ के आनंद ही अलग है. हर सब्जी, हर दाल में ताजा बिलोया हुआ मक्खन भर-भर के डाला जाता है, और अलग से भी कटोरी भर के मक्खन देते हैं. साबुन से धोने पर भी 1-2 घंटे हाथों से मक्खन की खुशबू और चिकनाहट नहीं जाती है.


मक्खन ढाबे से कुछ दूर एक देह व्यापार करने वाली स्त्री रोज़ी का घर था. रात में जागना, और दिन में सोना, खुद का भोजन पकाना और घर के छोटे बड़े सदस्यों का ध्यान रखना, एक सी दिनचर्या. उसके घर में रहती थी दो मक्खियां – कानू और मानु. एक ढलती उम्र की वेश्या की गरीब कुटिया में गुड़ और घी तो इंसानों के खाने को भी मुश्किल ही आ पाता था, तो मक्खियों को भी कहां नसीब होता. लेकिन कानू मक्खी को कभी शिकायत नहीं रही, वो हमेशा प्रसन्न हो कर गुनगुनाती भिन्न-भिन्न करती उड़ती रहती, कभी रोज़ी के चमेली के तेल से महकते बालों में बैठ जाती और कभी बासी बर्तनों के जूठन पर.


लेकिन मानु मक्खी को जिंदगी से बड़ी शिकायत थी, कहती, “चार बर्तन हैं घर में, रोज़ वही दाल भात और लूखी रोटी की जूठन. कोई मीठा नहीं, कोई दूध घी मक्खन नहीं. ये भी कोई जीवन हुआ.” बस दिन भर उदास बैठी रहती रोज़ी के बिस्तर की मैली सी गुदड़ी पर, पर रात को वहां से भी उड़ना पड़ता, रात को तो गुदड़ी पर आदमी रूपी मक्खियां मंडराएगीं, जैसे आगरे के पेठे पर मंडराती हैं.


मानु के बार बार कहने पर घबराकर अब कानू ने भी मन बना लिया कि यहां से कहीं और चलते हैं, दोनों एक सुबह दरवाजा खुलते ही उड़ चलीं. कुछ देर उड़ने के बाद उन्हें दिखाई दिया मक्खन ढाबा, पीछे नाले से गिरती जूठन से उठती भीनी भीनी खुशबू से तुरंत समझ गईं कि ये तो वही जन्नत है, जिसकी उन्हें युगों से तलाश थी. दोनों टूट पड़ीं कचरा पात्र और नाले से गिरती लज़ीज दावत पर.


जिंदगी मजे से कट रही थी, लेकिन लालच की कहां कोई सीमा बांध पाया है. मानु फिर दुखी हो चली, वो कानू को बोली “यार कब तक ये झूठन खाते रहेंगे, अंदर ढाबे में ताज़ा मक्खन देखा? क्या लज़ीज होता होगा यार, चल अंदर चलें, सुना है सर्दियों में मक्खन खाने का मजा ही अलग है.” पहले तो कानू मना करती रही, अच्छा ख़ासा चल रहा था, इतनी भीड़ और शोर शराब में जाने का उसका मन भी ना था. लेकिन मानु की जिद के आगे उसकी एक न चली.


अगले दिन दोनों शौचालय के खुशबूदार नाले में मस्त नहा धोकर अंदर भिनभिनाते हुए पहुंच गई. क्या शानदार नज़ारा था, चारों और ताज़ा खाने और मक्खन की ख़ुश्बू फैली हुई थी. अचानक उनकी नज़र एक बैरे पर पड़ी जो एक ट्रे अपने कंधे पर रखे टेबल का ऑर्डर ले कर जा रहा था. ट्रे में पालक पनीर, सेव टमाटर और दाल मक्खनी और एक कटोरी में ताज़ा सफ़ेद मक्खन. दोनों की आंखें खिल गईं, सीधा जाकर कटोरी की किनारी पे बैठ गईं और मक्खन का रसपान करने लगीं, ऐसी स्वादिष्ट चीज़ उन्होंने कभी नहीं खाई थी. तभी बैरे ने ट्रे को टेबल पर जोर से रखा, झटका लगा और दोनों कटोरी के अंदर उलटी जा गिरी. चिकने मक्खन में पंख बुरी तरह लथ पथ हो गए, उड़ना तो दूर दोनों हिल भी नहीं पा रही थीं.


ग्राहक की नज़र पड़ी मक्खन में गिरी दो मक्खियों पर, उसने बैरे को बदलने को कहा. बैरे ने कटोरी उठाई, चम्मच से उठाकर दोनों मक्खियों को मक्खन सहित खिड़की से बाहर फेंक दिया. सर्दी की सुबह थी, बादल हो रहे थे और हवा में ठंडक थी, मक्खन पिघलने का सवाल ही नहीं था. दोनों का दम घुटने लगा और हिम्मत टूटने लगी थी, मौत करीब थी.


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(विवेकभान सिंह झाला की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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