शाही शिकार: खिलखिलाकर हंस रही रुक्मी के चेहरे पर जैसे एकाएक मुर्दानगी छा गई

By: | Last Updated: Friday, 7 July 2017 11:03 PM
sahi shikar wreitten by Abhishek Singhal

रणधीर और विक्रमजीत को बिठा कर उनकी गाड़ी तुरंत महल के दरवाज़े से निकल कर कस्बे के बीच से होती हुई राजधानी की ओर जाने वाली सड़क पर बढ़ गई. राजमार्ग पर था उनका फार्म हाउस और उसके गेट से एक किलोमीटर अंदर बनी थी तीन मंज़िला विशाल कोठी. जैसे ही उनकी कार कोठी के पोर्च में जा कर रुकी तो उनकी नज़र लॉन में बैठी रुक्मी और उसकी ही हमउम्र महिला और एक जवान लड़की पर पड़ी. उन्हें देखते ही रुक्मी ने तुरंत घबराते हुए से अपना पल्लू सिर पर लेते हुए कहा, ‘हुकुम,…आप आज आने वाले थे, खबर तो कर देते…’ दरअसल विक्रमजीत कई बरसों से सप्ताह में दो ही दिन (शनिवार और रविवार) कोठी में आते थे. विक्रम की निगाह का पीछा करते हुए उसकी नज़र भी उनके साथ मौजूद उस जवान लड़की पर ठहर गई थी.

‘…यह स्वीटी है, गीतू की बेटी. गीतू मेरी सहेली. आपको बताया था ना कि मुंबई में रहती है. मुझे लगा आज तो मंगलवार है और आप शनिवार को आएंगे तो मैंने इन्हें तीन दिन के लिए यहां रहने के लिए बुला लिया था.’

‘हम्म…’ इतना कह कर विक्रमजीत कोठी के अंदर अपने कक्ष की ओर बढ़ गए. रणधीर हमेशा की तरह वापिस कार में बैठ गया और गाड़ी वापिस कस्बे की ओर लौट चली. विक्रमजीत रुक्मी के साथ अकेले ही रहना पसंद करते थे. यहां तक कि हैप्पी को भी वे वहां नहीं देखना चाहते थे सो वह भी कस्बे में रुक्मी को दिलवाए घर में ही रहता था. उसे लगता था कि किसी और की उपस्थिति मात्र ही रुक्मी पर उसके अधिकार में कटौती कर देती थी. वैसे यह एकांत ही उसकी मानसिक तुष्टी के लिए ज़रूरी था. विक्रम को वहां आया देख गीतू और उसकी बेटी एकाएक बहुत खुश हो गए थे. उन्हें लगा कि एक पूर्व मंत्री और रियासतदार से मुलाकात का उनका ख्वाब पूरा होने वाला था. पर गीतू की नज़रों से यह छुपा नहीं रह सका कि विक्रमजीत को देखते ही खूब खिलखिलाकर हंस रही रुक्मी के चेहरे पर जैसे एकाएक मुर्दानगी छा गई थी. रुक्मी ने गीतू से इतना ही कहा, ‘गीतू तुम और स्वीटी खाना खा कर अपने कमरे ही में रहना, चाहे कुछ भी हो जाए सुबह से पहले बाहर नहीं निकलना.’

रात अपना आंचल पीछे छोड़ने लगी थी…सुबह का सूरज पूरब में धीरे धीरे निकल कर ललाई फैलाने लगा था. भोर का उजाला अपना असर बढ़ाने लगा था. कोठी की गौशाला में गाएं रंभाने लगी थीं और पक्षियों की चहचहाहट से पूरा वातावरण गूंजने लगा था.

रुक्मी हमेशा की तरह अपने कमरे से निकली और रसोई में पहुंची जहां नौकरानी राधा ने चाय की ट्रॉली तैयार कर रखी थी. रुक्मी ट्रॉली ठेलते हुए विक्रमजीत के कमरे की ओर बढ़ने लगी. उसने कमरे का दरवाज़ा खटखटाने के लिए हाथ बढ़ाया और जैसे ही थोड़ा दबाव बढ़ाया तो कमरे का दरवाज़ा खुलता ही चला गया. उसे लगा विक्रमजीत रात में उसके निकलने के बाद कमरा बंद करना भूल गए. थोड़ा आगे बढ़ते ही जो नज़ारा उसके सामने था उसे देख उसके मुंह से ज़ोरदार चीख निकली. ‘खून…खून.. खून…महाराज…महाराज…महाराज.’

सामने आराम कुर्सी पर विक्रमजीत अधलेटे थे और उनके सीने में एक सुराख हो रखा था और पूरा सीना सूख गए खून से सना था. विक्रमजीत का दायां हाथ उनके सीने पर था जिसमें उनकी अपनी पसंदीदा हाथी दांत की रिवॉल्वर फंसी थी, जिस पर साइलेंसर भी चढ़ा था. रुक्मी ने उस रिवॉल्वर की कई गोलियां बहुत बार अपने आस-पास से सनसना कर गुज़रती अनुभव की थीं. शायद उसी रिवॉल्वर की गोली आज विक्रमजीत का सीना छलनी कर गई थी. विक्रमजीत के शरीर से बहे खून ने आरामकुर्सी के पास नीचे लाल गलीचे को हल्का भूरा कर दिया था.

साफ था विक्रमजीत के प्राण पखेरू काफी पहले ही उड़ चुके थे. बेसुध होती रुक्मी ज़ोर से हिचकियां ले कर रोने लगी. शोर सुन कर गीतू, स्वीटी, नौकरानी राधा और कोठी का एकमात्र गार्ड मनोहरसिंह भागे चले आए. मनोहरसिंह ने एक नज़र बेसुध बैठी रुक्मी पर डाली और दूसरे ही पल लपक कर सबसे पहले रणधीर सिंह को फोन कर सारा हाल बताया. रणधीर ने जैसे ही सुना, वह भागा-भागा कोठी आया और फिर उसी ने पहले सन्नी बना, चंद्रवती, मैनेजर अमर सिंह, हैप्पी बना और फिर पुलिस थाने फोन कर सारा घटनाक्रम बयां किया.

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(अभिषेक सिंघल की किताब शाही शिकार का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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Web Title: sahi shikar wreitten by Abhishek Singhal
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