तिलिस्मः वह एक कुर्सी पर बैठ जाता है, इस उम्मीद में कि फर्श का यह टुकड़ा खुल जाएगा...

वह एक कुर्सी पर बैठ जाता है, इस उम्मीद में कि फर्श का यह टुकड़ा खुल जाएगा और वह कहीं गहरे उतर जाएगा

Tilism by sharatchandra chattopadhyay

भगवान भास्कर अपनी किरणों को समेटकर अस्ताचलगामी हो चुके थे और खूबसूरत चिड़ियाँ गाती हुई दिल पर बेढब असर डाल रही थीं. इस समय शहर से दूर झरने की ओर जानेवाली सड़क पर एक जवान तेज़ी से चला जा रहा था. चलते-चलते वह चौंककर आसपास देख लेता था. उसके चेहरे पर फिक्र और तरद्दुद के निशान थे और उसकी गरदन झुकी हुई थी.

अभी हम पाठकों को इस शख्स का नाम नहीं बताते हैं और उसके पीछे चलकर देखते हैं कि आखिर वह कहाँ जाता है. कुछ ही दूर चलकर वह दाहिने को मुड़ता है. तीस-चालीस कदम बाद एक ऐसी चौमुहानी पर पहुँचता है, जिसके बीच में एक चबूतरा बना है. चबूतरे के बीच एक पेड़ लगा है और चबूतरे पर लगे एक पत्थर पर काले अक्षरों में एक इबारत लिखी हुई है. चबूतरे के चारों तरफ घूमकर देखनेवाला इस पत्थर को बखूबी देख सकता है और इबारत पढ़ सकता है. इबारत में पेड़ लगानेवाले का नाम और समय दिया हुआ है. इस चौमुहानी के आसपास बहुत सारे मकान हैं और उन तक पहुँचने के लिए रास्ते बने हुए हैं. सारे मकान एक जैसे हैं, जिन्हें देख अनजान आदमी ताज्जुब में पड़ जाता है. किसी ऐयार या होशियार शख्स के लिए, जो मकानों पर लिखी संख्याएँ पहचानता है, यहाँ कोई तकलीफ नहीं पड़ती.

वह नौजवान शायद यहीं का रहनेवाला है या इस बस्ती में कई बार आ-जा चुका है, इसलिए वह सीधा एक खास मकान की तरफ बढ़ता है. मकान क्या, इसे छोटा-मोटा तिलिस्म कहिए. आइए देखें, यह शख्स इसमें क्यों जा रहा है और कैसे जाता है. दस कदम कच्चा रास्ता चलने के बाद वह एक गलियारे में घुसता है. गलियारा पक्का है और यहाँ रोशनी भी काफी है. गलियारे के आखिर में चार दरवाज़े हैं जो सभी बन्द हैं. ये दरवाज़े अलग-अलग मकानों में जाने के लिए हैं, मगर अक्सर बन्द रहते हैं, क्योंकि मकान के रहनेवाले अपने लिए दूसरे दरवाज़ों का इस्तेमाल करते हैं. इस समय भी दरवाज़े बन्द हैं. दरवाज़े के सामने एक सीढ़ी है, जो ऊपर को चली गई है. कुछ ही सीढ़ियों के बाद फिर सीढ़ी विपरीत दिशा में मुड़ जाती है. यहाँ हवा और प्रकाश के लिए मोखे बने हैं, जहाँ से सामने का नज़ारा भली-भाँति देखा जा सकता है और इस तरह से कि जिसे देखा जाए उसे पता भी न लगे. यहीं पर एक ताक है जिस पर अलमारी की तरह पलड़ा लगा हुआ है. पलड़े पर जाली है जिसमें से देखने पर ताक के अन्दर लगे हुए कुछ कल-पुर्ज़े दिखाई देते हैं. यहीं पर एक खटका ऐसा है जिसे दबाने से कुल कमरों में अँधेरा हो सकता है. पाठकों की जानकारी के लिए हम बता दें कि यह बिजली का मीटर है.

वह शख्स, जिसकी हम बात कर रहे हैं, अब तक सीढ़ियों तक पहुँच गया. यहाँ फिर चार दरवाज़े हैं और पता नहीं लगता कि कौन दरवाज़ा कहाँ गया है. वह शख्स बाएँ हाथ वाले दरवाज़े के पास जाकर खड़ा हो जाता है और खास तरह से दरवाज़ा खटखटाता है. दरवाज़ा अन्दर से बन्द है और यह ज़ाहिर है कि जब तक अन्दर से कोई मददगार न हो, वह उसे क्योंकर खोल सकता है. वह फिर दरवाज़ा खटखटाता है और इस बार अन्दर से एक आवाज़ सुनाई देती है. कुछ ही पल बाद दरवाज़ा खुल जाता है. अन्दर घुसकर वह शख्स फिर से दरवाज़ा लगा देता है और उस औरत के साथ एक ऐसी कुरसी पर बैठ जाता है जिसपर चार आदमी बैठ सकते हैं और जिसकी नरम गद्दी मानो थके हुए मुसाफिर को आराम देने के लिए ही बनी है. शख्स ने, जो बहुत थका हुआ लग रहा था, उस कुरसी पर बैठकर पैर फैला दिए और बदन को आराम देने लगा.

जिस कमरे में हम एक औरत के साथ इस शख्स को बैठे देख रहे हैं, वह कोई खास बड़ा नहीं है. वहाँ सामान भी, एक बार देखने से, मामूली दर्जे का लगता है. दीवार पर एक बुज़ुर्ग की तसवीर लगी है जिनके चेहरे पर सफेद दाढ़ी है व बाल कान के पीछे तक चले गए हैं. बदन पर एक दुशाला या चादर के जैसा वस्त्र है और आँखें झुकी हुई हैं. पाठक इसे देखते ही पहचान जाएँगे कि यह रवीन्द्रनाथ की तसवीर है. इसके अलावा कमरे में दो तसवीरें और हैं जिन्हें गौर से देखने पर पता लगता है कि ये औरतों की तसवीरें हैं. साधारण व्यक्ति तो इसे सिर्फ कुछ लकीरें और धब्बे ही समझेगा, पर जो फन के जानकर और ऐयार हैं, वे इसे देखते ही समझ जाएँगे कि यह मॉडर्न आर्ट है.

सुनिए, वह औरत और आदमी आपस में बातें करने लगे हैं. ज़रूर यह कोई गुप्त बात होगी.

औरत – आज बहुत थके हुए लग रहे हो?

आदमी – हाँ, आज दफ्तर में बहुत काम था और मैं काफी दूर से पैदल भी आ रहा हूँ.

औरत – क्या रास्ते में रुक गए थे?

आदमी – मुझे कुछ काम निबटाना था.

औरत – कौन-सा काम था? क्या कोई खास बात हुई?

आदमी – किराने वाले का बिल चुकाना है. अब मेरे पास ज़रा भी रम नहीं बची और सारा माह गुज़ारना है.

आदमी के इस आखिरी वाक्य को सुन वह औरत भी चौंक उठी और चिन्ता में पड़ गई. फिर वह धीरे से उठी और अन्दर चली गई. जिस जगह यह आदमी आराम कर रहा था, उसके सामने ही दूसरे कमरे का दरवाज़ा था जिसपर एक पर्दा पड़ा हुआ था. पर्दे के कारण वह अन्दर के हाल साफ तौर से देख तो नहीं सकता था, पर जब हवा से पर्दा हिलता था, तो उसे अन्दर की कार्यवाही की झलक ज़रूर मिल जाती थी. मगर उसकी आँखें थकान की वजह से बन्द थीं. इसी तरह पाव घड़ी बीत गई और वही औरत एक प्याले में चाय लेकर आई और उस आदमी को उठाने के बाद सामने रखकर चली गई. कुछ देर बाद वह उस कमरे में आई. इस बार उसके हाथों में हूबहू वैसा ही एक और प्याला था जिसमें चाय थी. कुछ देर बाद आदमी ने उस औरत से एक सवाल पूछा, ‘‘बच्चे कहाँ हैं?’’

‘‘खेलने गए हैं.’’ औरत ने जवाब दिया.

इसके बाद फिर खामोशी हो गई. फिर वह शख्स सामनेवाली मेज़ पर उस प्याले को रख खड़ा हो गया और पर्दा हटाकर अन्दर चला गया. अब उस कमरे में वह औरत अकेली रह गई है.

इस मकान में तीन कमरे हैं, जिनमें तरह-तरह का ज़रूरी सामान रखा है. वह आदमी तीसरे कमरे में जाकर एक खटका दबाता है, तो कमरे में उजाला हो जाता है. अब कमरे में रखी सभी चीज़ें साफ दिखाई देने लगी हैं. वह आदमी सामने दीवार में रखी अलमारी खोलता है और कपड़े निकालता है. फिर अपने कपड़े उतारकर दीवारों में लगी खूँटियों पर टाँग देता है और दूसरे कपड़े पहन लेता है. तभी वह स्त्री, जिसे हम पहले कमरे में छोड़ आए हैं, उस आदमी के पास आकर खड़ी हो जाती है.

‘‘पोस्टमैन आज आया था,’’ वह कहती है.

‘‘क्या कोई चिट्ठी आई है?’’

‘‘हाँ, एक चिट्ठी आई है.’’ वह उत्तर देती है और साथ ही एक लिफाफा निकालकर भी देती है. लिफाफा खुला हुआ है, यानी इससे साफ ज़ाहिर है कि इस आदमी को देने के पहले वह औरत यह चिट्ठी पढ़ चुकी है. जब तक वह आदमी चिट्ठी पढ़ता है औरत उसके चेहरे के भाव देखती है. पूरी चिट्ठी पढ़ने के बाद वह शख्स लम्बी साँस लेता है.

‘‘क्या करें?’’ वह औरत से पूछता है.

‘‘क्या कर सकते हैं?’’ औरत जवाब देती है.

‘‘कुछ नहीं किया तो वे लोग क्या सोचेंगे?’’ आदमी कहता है.

औरत कुछ नहीं बोलती और सिर झुका लेती है.

‘‘देखो क्या होता है,’’ कहता हुआ आदमी चिट्ठी उसी अलमारी में डाल पहले कमरे में आ जाता है. चिट्ठी पढ़ने के बाद उसके चेहरे पर फिक्र के निशान बढ़ जाते हैं. वह मेज़ पर से एक किताब उठाता है और उसका निश्चित पृष्ठ खोल पढ़ने लगता है. एक घड़ी-भर तक वह पुस्तक को पढ़ता रहता है और तभी भय और घबराहट के कारण उसका बदन सुन्न हो जाता है. तिलस्मी शैतान ने बेहोश पड़े प्रभाकरसिंह और चीख मारकर बेसुध हुई मालती को अपने कन्धे पर लाद लिया है और सिंहासन वाले रास्ते से उस जगह पहुँच गया है जहाँ चारों तरफ मनुष्यों और पशुओं की हड्डियाँ बिखरी हैं. चारों ओर चार मनुष्यों के कंकाल ठीक उसी सूरत के खड़े थे, जैसे शैतान के थे. एकाएक चारों कोनो में खड़े वे हड्डी के ढाँचे कुछ अजीब तरह से हिलने लगे और उनके जबड़े हरकत करने लगे. कुछ देर बाद वे नरकंकाल हिलते-डुलते, लड़खड़ाते आगे बढ़े. उन्हें आगे बढ़ता देख तिलस्मी शैतान ज़ोर से हँसा और बोला, ‘‘लो, आज तुम्हारे लिए खुराक.’’

एक ढाँचे के मुँह से भयानक शब्द निकले, ‘‘क्या इन लोगों को हमारे भोजन के लिए ही लाए हैं?’’

तिलस्मी शैतान ने जवाब दिया, ‘‘हाँ.’’

तिलस्मी शैतान आग के कुएँ के पास आया और वह सिक्कड़ खोला, जिससे देग बँधा हुआ था. इसके बाद वह मालती और प्रभाकरसिंह के पास आया और बारी-बारी से एक-एक को उठाकर उसने उसी देग में डाल दिया. तिलस्मी शैतान ने अब सिक्कड़ पकड़ लिया और देग को धीरे-धीरे उसी अग्नि-कुण्ड में उतारने लगा तथा बाकी के ढाँचों ने हड्डियाँ उठा-उठाकर कुएँ में फेंकनी शुरू कीं, जिसके साथ लपटों ने देग को चारों तरफ से घेर लिया. चिरांयध मिली बदबू से वह कोठरी भर गई और वहाँ इतनी गरमी हो गई कि खड़ा रहना मुश्किल हो गया….

उस शख्स ने घबराकर किताब रख दी. उससे आगे पढ़ा नहीं गया. उसके चेहरे पर पसीना आ गया. उसे लगा यह सारा मकान किसी तिलस्मी शैतान की देग है और वे लोग प्रभाकरसिंह और मालती की तरह उसमें डाल दिए गए हैं. इस कल्पना से वह घबरा गया और सिकुड़कर बैठ गया. घर की हर चीज़ अब तिलस्मी हो गई थी. यह पर्दा क्यों हिल रहा है? इसके पीछे कोई नकाबपोश तो नहीं. अभी पर्दा हटेगा और कोई उसपर आक्रमण करेगा.

तभी कोई दरवाज़ा खटखटाता है. कोई खतरा है. जब दरवाज़ा खुलता है, एक नई मुसीबत अन्दर प्रवेश करती है. वह दरवाज़ा हिलने से घबराता है. वह दरवाज़ा खोलता है. इस बार उसके बच्चे हैं, खेलकर लौटे हैं. वे सीधे उसके पास से अन्दर चले जाते हैं. वह हँस देता है.

नकाबपोश खंजर उठाकर वार करना चाहता है कि उसने देखा कि हाय, यह तो कमलिनी है.

घर सड़क की तरफ खुलता है. वह गैलरी में आकर चुपचाप खड़ा हो जाता है, जैसे किसी की टोह ले रहा है. सामने सड़क के उस पार चैमुहानी के पास आग जल रही है और तीन आदमी घेरकर बैठे हैं. दो आदमियों की उसकी तरफ पीठ है इस कारण वह पहचान नहीं पाता. एक आदमी, जिसका चेहरा सामने है और आग के कारण चमक रहा है, उसे वह बखूबी पहचानता है. वह आदमी मूँगफली वाला है. यह आग मूँगफली भूनने के लिए लगाई गई है, यह स्पष्ट है. उसने सोचा, जाकर मूँगफलियाँ खरीदे, पर फिर वह गरदन घुमाकर दूसरी ओर देखने लगा. शाम में डूबी पहाड़ियाँ और कहीं भी पहुँचाने में असमर्थ रास्ते.

सहसा उसे लगा कि उसके पीछे कोई लगा है और पीठ पर आक्रमण करना चाहता है. वह वार बचाने की फुरती से घूमा. पत्नी थी और पीठ पर हाथ रखना चाहती थी. पाठक अब भली-भाँति समझ गए होंगे कि यह औरत इस शख्स की पत्नी है. जो हाथ पीठ छूना चाहते थे, अब कमीज़ पकड़े हुए थे.

‘‘यहाँ क्यों चुपचाप खड़े हो? अन्दर चलो.’’ वह बोली.

आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया. सिर झुकाया और सीटी बजाने की तरह अपने होंठों को किए रहा, ‘‘मैं दिल्ली चला जाऊँ?’’

‘‘क्यों?’’

‘‘वहाँ कोई नौकरी खोज लूँगा छोटी-मोटी. मुझे लगता है कोशिश करने पर मिल जाएगी. फिर तुम्हें ले जाऊँगा.’’

‘‘कैसे जाओगे? रुपया भी तो चाहिए. जब तक नौकरी न मिले, दिल्ली में खर्च के लिए चाहिए. फिर इस घर के खर्च के लिए भी तो चाहिए.’’

आदमी ने औरत की तरफ देखा और खामोश रह गया.

कैदी ने दीवार को हर जगह से बजाकर देखा कि शायद कहीं से पोली हो, मगर वह निराश हो गया. तिलिस्म के सब दरवाज़े बन्द थे. हर जगह कोई पेच, जिसे वह खोल नहीं पाता. वह बारादरी से निकला और बाग में आ गया, बाग से निकला और झरने के पास पहुँचा. वहाँ से उठा तो फिर बारादरी में आ गया. अजब ज़िन्दगी है – हवा, सूरज, पानी और मेवे के दरख्त, अगर नहीं कुछ है तो एक दरवाज़ा नहीं. कोई पेच है, कोई कल, जिसकी ताली उसके पास नहीं है. वह ताली किसी उल्लू के पेट में बन्द है और भूतनाथ हर बार निराश होता है.

यह शख्स अजब तिलस्मी हरकत कर रहा है. रात हो गई है और चन्द्रदेव अपनी शीतल किरणों से सकल पृथ्वी को शीतल किया चाहते हैं. हाय, वह कहाँ जाए! वह एक कमरे से निकलता है और दूसरे में चला जाता है. एक पर्दा हटाता है, फिर भी कोई रहस्य जैसे पीछे नज़र आता. वह अलमारी खोलता है, बक्से टटोलता है, औरत से बातें करता है. बच्चे सो गए हैं, बेहोश-से हैं, उसकी तबियत करती है कि उन्हें लखलखा सुँघाकर पूछे कि तुम कौन हो! वह चाहता है कि इस औरत की एक पोटली बाँधे और कन्धों पर रख जंगल में जाकर किसी चट्टान पर बैठ जाए.

वह खाना खा चुका. उसमें कोई बेहोशी की दवा नहीं मिली. अगर होती तो ठीक था. वह होश खोना चाहता है. वह औरत का हाथ पकड़ता है. वह चाहता है कि वह तिलिस्म की रानी की तरह अपने आशिक के गले में हाथ डाले. पर वह ऐसा नहीं करती. वह चुप रहती है, उस पुतली की तरह जो जमनियाँ के तिलिस्म के चौथे दरजे में शायद आज भी चुप खड़ी हो.

वह एक खटका दबाता है और सारे तिलिस्म में अन्धकार हो जाता है. उसे लगता है कि यह औरत अभी ‘ही-ही’ करती हुई पागलों की तरह हँसेगी और खम्भों के उस बाज़ू जाकर छिप जाएगी. मगर ऐसा नहीं होता.

वह एक कुरसी पर बैठ जाता है – इस उम्मीद में कि फर्श का यह टुकड़ा खुल जाएगा और वह कहीं गहरे उतर जाएगा. तिलिस्म की पुतली उसकी तरफ देख मुस्करा देती है. वह आदमी उस कुरसी पर बैठकर पत्थर का हो जाता है, हिल-डुल नहीं पाता और देखता है कि बस्ती के सारे घर एक तिलिस्म के हिस्से में हैं, और हर जगह एक पत्थर की मूरत सिर झुकाए कुरसी पर बैठी है.

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 (शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की कहानी तिलिस्म का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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