लैक्मे फैशन वीक: बॉलीवुड और बनारसी बुनकरों की व्यथा

By: | Last Updated: Friday, 28 August 2015 5:00 PM
Ritu Kumar during the Lakme Fashion Week in Mumbai

मुम्बई : ‘सैंया दिल में आना रे, आके फिर ना जाना रे…’, 1951 में रिलीज हुई फिल्म ‘बहार’ में शमशाद बेगम का गाया ये गाना लैक्मे फैशन वीक के मंच पर चलते-फिरते मॉडल्स के पार्श्व में बजेगा, ये ख्याल भी थोड़ा मुश्किल जान पड़ता है. 

 

‘शाम ढले, खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो…’, इस गाने की धुन भी फैशन के रंगों में डूबी शाम को विटेंज बॉलीवुड (तब हिंदी सिनेमा इस पहचान से कोसों दूर था) की याद दिला रही थी. फैशन शोज में फिल्मी धुनों की गूंज अब आम बात हो चली है. मगर 50-60 के दशक के इन गानों का इस्तेमाल इस तरह होगा, शायद ही किसी ने सोचा होगा. ‘छाप तिलक सब छीनी मोसे नैना लगाइके’ और ‘रंग दे हिजाब’ की सूफी धुनें भी माहौल को और खुशनुमां बना रही थीं.

 

मगर पद्मश्री प्राप्त डिजाइनर ऋतु कुमार के इस शो में इस्तेमाल पुराने गानों की धुनों से ज्यादा ध्यान आकर्षित कर रही थी बनारसी बुनकरों की कारीगरी को ओढ़-पहनकर चल रहीं मॉडल्स. गुरुवार को ‘नैशनल टेक्सटाइल डे’ के मौके पर बनारसी बुनकरों की कारीगरी का कमाल रैम्प पर अपने पूरे चरम पर था.

 

फिल्मी, क्लासिकल, सूफी जैसे तमाम तरह के सुरों के बीच, रैम्प के पीछे 3 हिस्सों में बंटे बड़े से स्क्रीन्स पर बनारस की गलियां, घाट और अपनी जिंदगी बुनते कारीगरों की छवियां देखते लोग एक अलहदा एहसास से गुजर रहे थे. ऐसे में बॉलीवुड ऐक्ट्रेस अदिति राव हैदरी का शो-स्टॉपर होकर रैम्प पर चलना और दीया मिर्जा और शबाना आजमी जैसे सितारों के दर्शक दीर्घा में बैठने की अहमियत धुंधला-सी गई थी.

 

बनारसी बुनकरों की कलात्मक व्यथा इस फैशन में इस कदर रंगीन जामा पहनकर आई थी कि जैसे लग रहा था कि मानो उनके मुश्किल हालातों और जिंदगी का दायरा रैम्प की रंगीनियत तक सिमटकर रह गया हो. फैशन शो के आखिर में बनारस के रहनेवाले कुछ बुनकरों की भी परेड रैम्प पर कराई गई, जो चेहरों पर तो हल्की मुस्कान लिए चल रहे थे, मगर आर्थिक-सामाजिक तौर पर अपने हाशिए पर होने से जुड़े जज्बातों को शायद जज्ब किए हुए थे.

 

शो के खात्मे के बाद मीडिया से रू-ब-रू होते वक्त ऋतु कुमार, शबाना आजमी और अदिति राव हैदरी सबके पास बनारसी बुनकरों की समस्याओं का समाधान था. ऋतु ने जहां ओवर डिजाइन से बचते हुए पुरातन बनारसी कसीदेकारी को तवज्जो देने की बात कही तो वहीं शबाना ने बनारस के कपड़ों असली कला को अहमियत दिए जाने की बात पर जोर दिया. अदिति ने बनारस की पुरानी परंपरा को जिंदा रखने की हर मुमकिन कोशिश में अपनी छोटी सी हिस्सेदारी को रेखांकित किया. 

 

रैम्प पर बनारस के बाद बारी डिजाइनर अनीता डोंगरे के शो ‘ग्रास रूट्स’ के जरिए गुजरात की कपड़ा-कारीगरी पर रोशनी डालने की थी. अपनी जड़ों की तरफ लौटने की ग्लैमरस अपील वाले इस फैशन शो के अंत में गुजरात की कुछ अधेड़ और बूढ़ी महिलाओं ने रैम्प पर चलने का चरम सुख भी पाया. हिंदी और अंग्रेजी के लफ्जों से पूरी तरह से अनजान इन औरतों में से एक ने पुरजोर अंदाज में, गुजराती भाषा के सहारे पूरी दुनिया में एक दिन अपनी कसीदेकारी की पहुंच की ख्वाहिश भी जाहिर की.  

 

बहरहाल, जैकी श्रॉफ, टिस्का चोपड़ा, गौहर खान, आफताब शिवदासानी जैसे कई सितारे भी दिन भर चले फैशन शो में कपड़ों के रूप में भारतीय फैब्रिक्स और कसीदेकारी को प्रमोट करते नजर आए.

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Web Title: Ritu Kumar during the Lakme Fashion Week in Mumbai
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