महिलाओं को मिलता है पुरुषों से 25 प्रतिशत कम वेतन: सर्वे

By: | Last Updated: Tuesday, 7 March 2017 7:37 AM
Women get 25 percent less salary than men: survey

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नई दिल्ली: आजादी के 70 सालों बाद भी देश में वेतन निर्धारण में लिंगभेद बरकरार है. ऑनलाइन आजीविका एवं नियुक्ति समाधान प्रदाता कंपनी मॉन्स्टर इंडिया नवीनतम ‘मॉन्स्टर सैलरी इंडेक्स’ से भी इसकी पुष्टि होती है. इसमें बताया गया कि साल 2016 में पुरुषों का औसत प्रतिघंटा वेतन 345.80 रुपये था, जबकि महिलाओं का प्रतिघंटा वेतन 259.80 रुपये रहा. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस करीब है और कामकाजी महिलाओं के लिए समान वेतन, लैंगिक खाई पाटने जैसे मुद्दे चर्चा का केंद्र बने हुए हैं. ऐसे में मॉन्स्टर इंडिया ने अपने ‘वुमन ऑफ इंडिया इंक नामक’ सर्वेक्षण के निष्कर्षो में बताया है कि देश के निगमित क्षेत्र में लगभग 68.5 फीसदी महिलाओं का मानना है कि लिंग अभी भी एक मुद्दा है और प्रबंधन को इस पर विचार करने की जरूरत है.

‘मॉन्स्टर सैलरी इंडेक्स (एमएसआई)- वेतन में लिंग आधारित अंतर’ रिपोर्ट के 2016 के आंकड़ों से पता चलता है कि अभी भारत में वेतन में लिंग आधारित अंतर 25 प्रतिशत का है. जहां पुरुषों की औसत प्रतिघंटा कुल कमाई 345.80 रुपये थी, वहीं महिलाओं की कमाई महज 259.80 रुपये थी. यह अंतर 2015 के 27.2 प्रतिशत से दो प्रतिशत कम लेकिन 2014 के 24.1 प्रतिशत के काफी करीब है.

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि वेतन में लिंग-आधारित औसत अंतर विनिर्माण उद्योग में सबसे ज्यादा 29.9 प्रतिशत है. हालांकि इसमें 2015 की अपेक्षा 5 प्रतिशत सुधार हुआ है जो भारत में अभी तक सबसे ज्यादा है. इसके बाद आइटी उद्योग का स्थान है जहां वेतन का अंतर 25.8 प्रतिशत है. बैंकिंग, वित्तीय सेवा एवं बीमा (बीएफएसआइ) उद्योग में वेतन का लैंगिक अंतर 21.5 प्रतिशत था जो भारत में सामान्य लिंग-आधारित वेतन अंतर (25 प्रतिशत) से थोड़ा नीचे है. शिक्षा एवं अनुसंधान उद्योग में औसत लिंग-आधारित वेतन अंतर 14.7 प्रतिशत था.

मॉन्स्टर इंडिया के प्रबंध निदेशक (एशिया प्रशांत एवं मध्य-पूर्व) संजय मोदी ने बताया, “भारत में लिंग-आधारित वेतन अंतर निगमित क्षेत्र में 25 प्रतिशत है. यह मुख्यत: संगठनों के समक्ष वर्तमान विविध चुनौतियों का परिलक्षण है. इस अंतर को पाटने के लिए कारगर पहलों की अत्यंत आवश्यकता है जिसके लिए महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण, नौकरियां एवं निर्णय निर्धारण के माध्यम से ढांचागत बाधाओं को दूर करना जरूरी है.

सर्वेक्षण में 2,000 से ज्यादा कामकाजी महिलाओं ने भाग लिया, जिसमें दिल्ली-एनसीआर से सबसे अधिक यानी 15 प्रतिशत महिलाओं ने भाग लिया. इसके बाद मुम्बई और बेंगलुरू से 12 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी रही. गैर-मेट्रों शहरों की भागीदारी 35 प्रतिशत थी. यह कहा जा सकता है कि रिपोर्ट में व्यक्त विचार मुख्यत: दिल्ली एनसीआर, मुम्बई और बेंगलुरू की परिस्थितियों को दर्शाते हैं.

सर्वेक्षण के नतीजों के अनुसार महिलाओं के काम करने के पीछे पारिवारिक आमदनी में योगदान करना सबसे बड़ा कारण (37.9 प्रतिशत) है. तथापि, 25.1 प्रतिशत का मानना है कि महिलाओं के नौकरी करने के कारण पूछने का कोई औचित्य नहीं है. 36.8 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि संगठनों को लैंगिक विविधता पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए. 31.9 प्रतिशत महिलाओं का मानना है कि कार्यस्थल पर अवधारणा में बदलाव नहीं हो पाया है. दुखद तथ्य यह है कि केवल 14.7 प्रतिशत महिलाओं ने अपने-अपने संगठन में सभी कर्मचारियों के लिए नियमित लैंगिक विविधता कार्यक्रम लागू होने की बात का समर्थन किया.

सर्वेक्षण में अधिकांश सहभागियों (97.2 प्रतिशत) के पास 1 से 10 वर्षो का कामकाजी अनुभव है और उनमें से एक बड़ी संख्या यानी 60.2 प्रतिशत 1 से 3 वर्षो से नौकरी में हैं तथा 10 वर्षो से अधिक समय से काम करने वाली महिलाओं का अनुपात केवल 2.7 प्रतिशत है. इसका एक कारण यह हो सकता है कि मातृत्व और शिशुपालन जैसी ‘जीवन की विभिन्न जरूरतों’ के कारण महिलाओं को नौकरी छोड़नी या छुट्टी लेने को बाध्य होना पड़ता है. लगभग 13.1 प्रतिशत महिलाओं का मानना है कि कामकाजी महिलाओं के लिए उचित शिशुपालन के लिए समय का अभाव सबसे बड़ी समस्या है. घर से काम करने की सुविधा या कार्यस्थल पर शिशुपालन की व्यवस्था से इसका समाधान निकाला जा सकता है.

काम में विकास के मानदंडों के ख्याल से 53.9 प्रतिशत महिलाएं संतुष्ट से लेकर आंशिक संतुष्ट मनोदशा में हैं और उनका मानना है कि उनके लिए और ज्यादा अवसर होने चाहिए. ज्यादा समावेशी वातावरण तैयार करने के लिए समान वेतन और नये प्रस्तावों पर चर्चाओं के बावजूद 62.4 प्रतिशत महिलाओं का सोचना है कि उनके समकक्ष पुरुषों को पदोन्नति के ज्यादा अवसर उपलब्ध हैं और पदोन्नति का निर्णय करने में अन्य मानदंडों के साथ-साथ लिंग की भूमिका भी बदस्तूर जारी है.

78.1 प्रतिशत महिलाएं नौकरी का चुनाव करते समय सुरक्षा को मुख्य मुद्दा मानती हैं. भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र की महिलाओं ने रात की पाली में काम करने के प्रति अनिच्छा व्यक्त की और 66.4 प्रतिशत से ज्यादा इसे असुरक्षित मानती हैं तथा रात की पाली से बचना चाहती हैं. हालांकि, 62.7 प्रतिशत का सुझाव है कि संगठनों द्वारा अल्पकालिक आत्मरक्षात्मक प्रशिक्षण दी जानी चाहिए.

वेज इंडिकेटर फाउंडेशन के निदेशक, पॉलीन ओस्से के मुताबिक, “यह रिपोर्ट भारत में आठ प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में व्यापक एवं विधिवत शोध के आधार पर तैयार की गई है, जिसका उद्देश्य नियोक्ताओं एवं नौकरी के अभ्यर्थियों को एक विश्वसनीय प्लेटफॉर्म के माध्यम से वेतनों के विश्लेषण ेका साधन मुहैया करना है.”

आईआईएम-अहमदाबाद के प्रोफेसर बीजू वार्के ने कहा, “यह विश्लेषण भारतीय रोजगार बाजार के आंकड़ों एवं व्यापक समझ पर आधारित एक विश्वसनीय संग्रह है. इस अध्ययन का उद्देश्य भारतीय नियोजन परि²श्य में वेतन एवं संबंधित प्रचलनों की समझ हासिल करने में सहयोग करना है.”

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