Kota.edu

ये कहानी है रंक से राजा बनने की. लेकिन किसी एक शख्स की नहीं, बल्कि चम्बल नदी के तट पर बसे उस शहर की, जिसकी आंगन में सुनहरे सपने साकार किए जाते हैं. जिसकी गोद में पलकर लाखों छात्र-छात्राएं अपने सपनों को उड़ान देते हैं. और उसकी इसी खूबी पर उस शहर को आज कोचिंग सेंटर का मक्का कहा जाता है. जिसे दुनिया कोटा के नाम से जानती है, जो राजस्थान का एक अहम औद्योगिक शहर भी है.

 

यहां प्राइवेट ट्यूशन ने ऐसी छलांग लगाई कि धीरे-धीरे ये करोड़ों-अरबों के उद्योग में तब्दील हो गया. इस शहर की आबादी 10 लाख है, जिनमें करीब 10 फीसदी आबादी स्टूडेंट्स की है. और ये छात्र-छात्राएं डॉक्टर और इंजीनियर बनने के सपने के साथ देश के अलग-अलग हिस्सों से आए हैं. एक ताज़ा स्टडी बताती है कि ये कारोबार 600 करोड़ रुपये का है. लेकिन सपने साकार करने वाले इस शहर के इस उजाले में बहुत अंधेरा भी है. हाल के सालों में स्टूडेंट्स की खुदकुशी बेचैन करती हैं. फलते-फूलते कोचिंग सेंटर और छात्रों पर बढ़ते दबाव बड़े सवाल बनकर उभरे हैं. हमारी चरमराई स्कूल व्यवस्था की वजह से अब भी कोचिंग इंडस्ट्री फल फूल रही है. देखें कोचिंग सेंटर के मक्का कोटा के सभी पहलूओं की परतें उधेड़ती हमारी स्पेशल सीरीज़.

 

‘Kota.edu’ की दूसरी कड़ी में देखें घोर कम्पेटिटिव माहौल में आखिर क्यों स्टूडेंट्स कभी-कभी कोचिंग की पढ़ाई का दबाव और नाकाम होने का डर उन्हें अंतिम कदम उठाने पर मजबूर कर देता है.

 

‘Kota.edu’ के आखिरी सीरीज़ में देखें आखिर स्टूडेंट्स क्यों स्कूल की बजाए कोचिंग सेंटर के सहारे एंट्रेंस टेस्ट की तैयारी करते हैं.

 

 

सेगमेंट-1

आज आपके सामने पेश है ‘Kota.Edu’ से जुड़ी स्पेशल सीरीज़ की पहली कड़ी. देखें उत्तर भारत के राज्य राजस्थान का ये औद्योगिक शहर कैसे कोचिंग सेंटर का मक्का बन गया. और आज हाल ये है कि देश के इस कोचिंग कैपिटल में लाखों स्टूडेंट्स इंजीनियरिंग और मेडिकल के मुश्किल एंट्रेंस टेस्ट की तैयारी के लिए खीचें चले आते हैं.

सेगमेंट-2

एक नवंबर 2015 को मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी करने वाली एक 18 साल की छात्रा ने खुदकुशी कर ली. ये लड़की कोटा के एक बड़े कोचिंग सेंटर में पढ़ रही थी. वो होस्टेल के कमरे में लगे पंखे से गले में फांसी का फंदा बांधकर झूल गई. स्थानी पुलिस के मुताबिक सूसाइड नोट मिला, जिसमें खुदकुशी की वजह कुछ यूं बयान की गयी है, “पढ़ाई और माता-पिता के ख्वाब को पूरा करने के दबाव की वजह में मैं अपनी ज़िंदगी खत्म कर रही हूं. ” ये दुखभरी दास्तान है 12वीं क्लास में पढ़ने वाली एक छात्रा की.

सेगमेंट-3

देश में हर जगह स्कूल-कॉलेज हैं, बावजूद इसके हर साल लाखों स्टूडेंट्स प्राइवेट ट्यूशन और कोचिंग सेंटर के सहारे मेडिकल और इंजीनियरिंग एंट्रेंस टेस्ट की तैयारी करते हैं. एक ताज़ा स्टडी के मुताबिक देश में 82 फीसदी स्टूडेंट्स स्कूल के साथ ही प्राइवेट ट्यूशन लेते हैं. तो सवाल है क्या ऊंच शिक्षा में जाने वाले स्टूडेंट्स के लिए देश की स्कूल व्यवस्था नाकाम हो गई है? और इसी का नतीजा है कि कोटा का कोचिंग उद्योग दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है?

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