एक स्कूल जहां चलती है मस्ती की पाठशाला

By: | Last Updated: Tuesday, 11 February 2014 7:12 AM

भोपाल: स्कूल का जिक्र आते ही बच्चे अक्सर उदास हो जाते हैं, स्कूल न जाने के लिए रोते हैं, बहाने बनाते हैं. लेकिन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक ऐसा स्कूल भी है जहां जाने के लिए बच्चे रोते नहीं बल्कि जाने की जिद करते हैं क्योंकि उन्हें यहां अपनी मर्जी से पढ़ने और खेलने की आजादी है. न तो उन्हें किसी टीचर से डर लगता है और न ही किसी किताब से. न ही उन्हें कोई डांट-डपट लगाता है और न ही पढ़ने का दबाव डालता है. यानी बचपन यहां पूरी तरह आजाद है.

 

भोपाल के शाहपुरा में स्थित आनंद निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल सचमुच अनोखा है. नजारा ऐसा कि इस स्कूल में प्रवेश करते ही लगता है, जैसे किसी प्लेग्राउंड या पेंटिंग स्कूल में पहुंच गए हों.

 

यह स्कूल समाजसेवा से जुड़े कुछ लोग चला रहे हैं. यहां बच्चों को आजाद बचपन जीने का मौका और बिना किसी प्रेशर के पढ़ाया जाता है. सबसे मजेदार बात यह है कि इस स्कूल में किसी भी क्लास के लिए कोई सिलेबस नहीं है, फिर भी बच्चे वह सारी पढ़ाई कर लेते हैं जितनी उम्र के लिहाज से उनकी जरूरत है.

 

स्कूल के संचालक प्रमोद मैथिल कहते हैं कि पढ़ाई जरूरी है, मगर इसके लिए कोई प्रेशर नहीं होना चाहिए. पढ़ाई का प्रेशर बच्चे के बौद्धिक विकास में बाधक बनता है. हर बच्चे की रुचि और मानसिक स्तर अलग-अलग होती है. किसी भी बच्चे की तूलना दूसरे बच्चे से नहीं की जा सकती, लिहाजा बच्चों के इंटरेस्ट को ध्यान में रखकर उन्हें खेल-खेल में पढ़ाया जाता है.

 

यहां बच्चे को टीचर या सिलेबस के मुताबिक नहीं पढ़ाया जाता, बल्कि बच्चा खुद तय करता है कि उसे क्या पढ़ना है. इसके अलावा उसे इसकी भी आजादी है कि वह क्या करना चाहता है. यानी बच्चे को मर्जी के मुताबिक पढ़ने से लेकर खेलने तक की आजादी रहती है.

 

स्कूल के संस्थापक सदस्य अनिल सिंह बताते हैं कि यहां तीन वर्ष से 12 वर्ष तक की उम्र के बच्चे पढ़ने आते हैं. इन बच्चों को उम्र के हिसाब से तीन समूहों में बांटा गया है. पहले समूह में तीन से चार, दूसरे समूह में चार से छह और तीसरे समूह में छह से 12 वर्ष की उम्र तक के बच्चे हैं.

 

स्कूल के भीतरी हिस्से को कुछ इस तरह तैयार किया गया है कि बच्चों को स्कूल के बजाय अपना घर व मस्ती करने की जगह लगता है. बच्चे पूरे समय एक ही क्लास में नहीं रहते, बल्कि एक निर्धारित समय के बाद उन्हें दूसरे क्लास में भेज दिया जाता है.

 

बच्चे जिस किसी क्लास में जाते हैं, वहां का वातावरण कुछ इस तरह का होता है कि अनजाने में ही पढ़ाई करने लगते हैं. मसलन, मछली के चित्र देखकर वह मछली और उसके पानी में तैरने को लेकर सवाल करने लगता है या दीवार पर टंगे छल्लों को गिनने लगता है. बच्चों को अंक ज्ञान करने का भी वैज्ञानिक तरीका अपनाया जाता है.

 

यहां बच्चे संगीत भी अपनी मर्जी से सीखते हैं. संगीत शिक्षका वर्षा बताती हैं कि हर बच्चा कुछ न कुछ गुनगुनता है और गाना भी चाहता है, इसलिए उसकी मर्जी के मुताबिक उसे गीत सिखाया जाता है. ऐसा करने से जहां वह गाना सीख जाता है, वहीं उसे सरगम का ज्ञान भी होने लगता है. इस तरह वह खेल-खेल में संगीत की शिक्षा भी हासिल कर लेता है.

 

अनिल सिंह बताते हैं कि समूहों में बंटे बच्चों को अपनी मर्जी से पढ़ने की आजादी है. बच्चे तय करते हैं कि उन्हें किस शिक्षक से क्या पढ़ना है. पढ़ाई करते वक्त अगर उनका मन खेलने का करता है तो वे क्लास से निकलकर खेल भी सकते हैं. यानी यह बंधन नहीं है कि वे पूरे समय क्लास में ही मौजूद रहें.

 

आम स्कूलों की तरह हर कक्षा की पढ़ाई के आधार पर परीक्षा न होने के सवाल पर सिंह कहते हैं कि अब वैसे ही आठवीं तक की परीक्षाओं का ज्यादा अर्थ नहीं रह गया है. इसके लिए जरूरी है कि बच्चे को विषय और भाषा का ज्ञान हो, यानी अर्थपूर्ण शिक्षा के साथ ही उसका पूरा मानसिक विकास हो.

 

स्कूल में मौजूद हर बच्चे से बातचीत कर ऐसे लगा, जैसे वह समझता ही नहीं कि स्कूल आया है. पार्थ यादव, प्रकृति और भूमिका-इन तीन बच्चों ने बताया कि उन्हें स्कूल में न तो कई डांटता है और न ही कोई किसी तरह का दंड देता है. उन्हें अहसास ही नहीं होता कि वे स्कूल में हैं.

 

हां, फीस तो यहां लगती है, मगर बहुत ज्यादा नहीं. फीस सालाना 12 से 15 हजार रुपये तय की गई है, मगर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए फीस कम है या उनकी फीस माफ भी कर दी जाती है. वर्तमान में इस स्कूल में 25 बच्चे आते हैं.

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