क्या इस बार ‘ब्रैंड ईमानदारी’ वोट दिला पाएगा

By: | Last Updated: Saturday, 1 February 2014 9:17 AM

ज्यादा दिन नहीं बीते हैं. अब से करीब डेढ़ साल पहले दिल्ली के जंतर मंतर पर अरविंद केजरीवाल अनशन पर बैठे थे. साल 2012 में जुलाई का महीना था. इन अनशन पर बैठते वक्त पन्द्रह मंत्रियों के खिलाफ मोर्चा खोला गया था. पन्द्रह मंत्रियों में से एक का भी बाल बांका नहीं हुआ लेकिन इसके बाद जब केजरीवाल ने अनशन तोड़ा तो नए राजनैतिक विकल्प का ऐलान कर दिया.

 

यही अनशन था जिसके बाद अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल की राहें अलग हो गईं. इस बार जब अन्ना हजारे अनशन के लिए बैठे तो उनके तीखे तेवर गायब थे. जबकि अरविंद केजरीवाल दिल्ली का मुख्यमंत्री बन चुके हैं लेकिन इसके बाद भी अब तक उनके वही तेवर हैं जो सत्ता में आने से पहले थे. इस बार फिर वो 29 लोगों की लिस्ट लेकर आए हैं. लिस्ट की शुरूआत में ही उन्होंने साफ कर दिया कि ये करप्ट लोगों की लिस्ट है. लिस्ट खत्म होने के बाद ये साफ कर दिया कि ये लिस्ट का अंत नहीं है. ऐसे में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने पुराना वाक्य दोहरा ही दिया ना खाता ना बही जो केजरीवाल कहे वो सही.

 

दिग्विजय जो कहते रहें पर ये अरविंद केजरीवाल की राजनीति का स्टाइल है. इसी स्टाइल की छाप जंतर-मंतर पर आंदोलन के शुरू होते वक्त दिखाई दी जहां सारे राजनैतिक दलों का विरोध नजर आया. अब ये केजरीवाल का असर था या केजरीवाल पर पूरे माहौल का असर है ये कहना मुश्किल है लेकिन हरियाणा के हिसार में जन्मे केजरीवाल तीखी बात करने से पीछे नहीं हटते. वो दावा करते हैं कि ईमानदारी की राजनीति करने आए हैं. वो नाम लेकर आरोप लगाते हैं और सीधे हमले करते हैं.

 

अक्टूबर 2012 में अरविंद केजरीवाल जब आम आदमी पार्टी की नींव बना रहे थे. तब भी उन्होंने इसी शस्त्र का सहारा लिया. राजनीति के इस स्टाइल का सबसे तगड़ा हमला हुआ था कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर. इसके बाद हर हफ्ते नया चेहरा और नया आरोप. उन आरोपों ने मौजूदा राजनैतिक सिस्टम को हिला भी दिया.

 

बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी से लेकर मुकेश अंबानी तक ये लिस्ट पहुंची. चुन-चुन कर किए हमलों के जरिए अरविंद केजरीवाल ने पूरे सिस्टम को खराब बताया. दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी इसी तकनीक ने काम किया. ऑटो के पीछे पोस्टर लगाए गए जिसमें शीला को भ्रष्ट और खुद को ईमानदार बताया गया. जनता ने भरोसा भी किया और केजरीवाल दिल्ली की गद्दी पर बैठे.

 

लोकतंत्र में जनमानस की राय बड़ी अहम होती है. न्याय का सिद्धांत भी कहता है कि सिर्फ न्याय होना नहीं चाहिए बल्कि न्याय होते दिखना भी चाहिए. लेकिन केजरीवाल सिद्धांत के एक हिस्से पर यकीन कर रहे हैं वो दूसरों पर आरोप लगा रहे हैं लेकिन अपने या अपने लोगों पर लगे आरोपों को खारिज कर रहे हैँ. सोमनाथ भारती का मामला इसका उदाहरण है.

 

दूसरा ये कि वो आरोप लगा कर उसे किसी अंजाम तक नहीं पहुंचा पा रहे. अब इस लिस्ट में राहुल गांधी का नाम है, अब ये केजरीवाल ही बताएंगे कि कैसे इसे वो साबित करेंगे? दिल्ली में उन्होंने शीला दीक्षित पर आरोप लगाए, कहा कि सबूत भी हैं पर अब तक इस मामले में कुछ होता नजर नहीं आ रहा. इसी तरह लोगों को उम्मीद है कि रॉबर्ट वार्ड्रा का नाम उन्होंने उछाला था और आरोप लगाया था कि दिल्ली सरकार ने मदद की.

 

अब वो दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं. अब वो उन आरोपों को साबित करें कम से कम सबूत दिल्ली की जनता के सामने लाएँ.

 

सही है लोकसभा चुनावों की तैयारी करें. इससे भी बड़ी लिस्ट बनाएं. लेकिन उन सवालों के जवाब भी केजरीवाल को देने होंगे जो अब उठ रहे हैं?  नहीं तो “ब्रैंड ईमानदारी’ से जनता का मोहभंग होने में देर नहीं लगेगी. ऐसे में नई लिस्ट जारी करने से पहले केजरीवाल को पुरानी लिस्ट पर पुख्ता काम करके दिखाना चाहिए.

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Web Title: क्या इस बार ‘ब्रैंड ईमानदारी’ वोट दिला पाएगा
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