क्या सिर्फ प्रचार पाने के लिए केजरीवाल करते हैं विवाद ?

By: | Last Updated: Wednesday, 5 March 2014 11:34 AM

गांव में कहावत है कि भेष से ही भीख भी मिलती है. प्रतीक की राजनीति के चलन को महात्मा से लेकर महात्मा गांधी तक ने बखूबी समझा. एक धोती से पूरा शरीर ढंकने, सब कुछ त्याग कर देने और बिना लड़े (अहिंसक) लड़ाई के प्रतीक महात्मा गांधी ऐसे बने कि देश के राष्ट्रपिता का दर्जा दे दिया गया. यहां तक कि गांधी जी के प्रयोगों को भी प्रतीकों के तौर पर मान लिया गया है. अनशन, अहिंसा, सत्य, धरना, आंदोलन….इन शब्दों को देखते ही अब हम सभी के मन में सबसे पहले गांधी का ख्याल आता है.

 

वर्तमान परिवेश में प्रतीकों की राजनीति के मामले में अरविंद केजरीवाल ने बाजी मार ली है. देश की सियासत में नायक केजरीवाल बनेंगे कि नहीं, यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन वर्तमान में वह भाजपा और कांग्रेस के लिए खलनायक जरूर बनते जा रहे हैं. केजरीवाल ने प्रतिकों की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस दोनों को मात दे दी है.

 

केजरीवाल बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के विकास के दावे का मुआयना करने गुजरात गये. दौरे के दौरान उन्हें पुलिस ने थाने में बैठा लिया. इसकी वजह पुलिस ने बताई कि केजरीवाल को आचार संहिता लगने की वजह से रोका गया है, क्योंकि उनके पास काफिला निकालने के लिए जरूरी अनुमति पत्र नहीं है.

 

केजरीवाल के काफिले को रोकने के बाद पुलिस और केजरीवाल के बीच जमकर बहस हुई और केजरीवाल ने एसपी से कहा कि वे उन्हें कानून नहीं बताएं. काफिले को रोककर पुलिस केजरीवाल को थाने ले गई, लेकिन करीब आधे घंटे के बाद वे थाने से बाहर आए. इस मामले पर चुनाव आयोग के पूर्व सलाहकार केजी राव का कहना है कि अगर चुनावों के एलान के बाद कोई रोड शो करता है तो उसे इसकी इजाजत लेनी पड़ती है, अगर ऐसा नहीं होता है तो ये आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है. अब यह तो रहा यथास्थिति. लेकिन यहीं पर आशंका यह उठती है कि अनुमति नहीं लेने के पीछे कहीं प्रचार पाना तो नहीं है. विवाद के बाद एक बार फिर आप के नेता इनको मोदी के विरूद्ध लड़ने वाला दमदार नायक बनाने की जुगत में है. शुरू से लेकर अभी तक के हर फैसले अरविंद ने खुद को नायक गढ़ने के लिए किये हैं.

 

 

बेईमानों की सूची जारी करते-करते वह ईमानदार और सादगी पसंद इंसान का सर्टिफिकेट खुद को लगातार दे रहे हैं. राजनीतिक दलों, नेताओं, उद्योगपतियों, अधिकारियों और मीडिया को बेइमान बताते हुए केजरीवाल जुझारू नायक का प्रतीक बनने की लगातार कोशिश में जुटे हैं. फिलहाल तो आलम यह है कि जो आम आदमी पार्टी के मन मुताबिक नहीं है वह बेइमान. प्रतीकों का महत्व केजरीवाल से बेहतर कौन जानता होगा. अच्छी खासी टीम के सहारे अन्ना हजारे को पहले बदलाव का प्रतीक बनाया फिर इस प्रतीक को कब अपने में समाहित कर लिये पता ही नहीं चला. शायद इसे ही सियासत में कहते हैं ‘दिनदहाड़े डकैती’. केजरीवाल मौके के मुताबिक हां और ना का निर्णय करते रहे लेकिन मफलर और सड़क पर सोने का महिमा मंडन करते हुए इसे ही सादगी और ईमानदारी का प्रतीक बना दिये. जब केजरीवाल हरियाणा में जाने के लिए अशोक खेमका और उत्तर प्रदेश में आप के विस्तार के लिए दुर्गा शक्ति नागपाल का आह्वान करते हैं. तब मुझे लगता है कि प्रतीकों को ध्वस्त करते-करते अरविंद केजरीवाल कहीं सिर्फ प्रतीकों की ही राजनीति तो नहीं करना चाहते. लोकतंत्र के आखिर चुनावी समर में केजरीवाल प्रतीकों के सहारे कितना सफल होंगे यह तो बाद में पता चलेगा लेकिन फिलहाल दोनों राष्ट्रीय दलों के नेताओं को फाल्गुन में ही पसीना छूट रहा है.

 

 

अब जरा भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की राजनीति पर नजर दौड़ाएं. चाय की चुनावी चौपाल से असली चाय वाला नेपथ्य में चला गया और केतली लिए भाजपा के दिग्गज नेता फ्रंट पर दिखने लगे. मोदी को बैठे बिठाए सब्जेक्ट देकर कांग्रेस का जायका शायद बिगड़ गया है. कांग्रेसी लगातार कह रहे हैं कि कुछ लोग चाय की प्याली में उबाल लाने की कोशिश कर रहे हैं. विकास का प्रतीक बन बैठे मोदी आयडिया देकर चाय पिलाने में मस्त हैं और उनके समर्थक नमो टी स्टाल लगाकर चुनाव तक जमे रहेंगे. मोदी ने चाय पर चुस्कियां ली और चाय पर लिखा लेख पढ़ने लगे. चाय से चाह बढ़ती है. चाय से गरीबों का ब्यापार बढ़ता है चाय का ठेला फुटपाथ का संसद है. चाय बेचकर बहुत कुछ सीखा है. मोदी अपने अतीत का जिक्र कर भविष्य का रास्ता तय करने के लिए हर नुस्खा अपना रहे हैं.

 

चाय तो बहाना है मकसद तो सिंहासन पाना है. हिन्दुस्तान के चौराहों को चाय का परिचय कराने वाले अंग्रेजों को क्या पता था कि तकल्लुफ, तमीज़ और तीमारदारी की प्रतीक यही चाय एक दिन देश की राजनीति का चेहरा बन जाएगी. सियासत का चुल्हा गर्म है. अरमानों का पानी उबाल मार रहा है. मुद्दों की पत्ती रंग ला रही है. वायदों की शक्कर डाली जा रही है. वोट की भांप में मोदी को सिंहासन का ख्वाब दिखने लगा है. सत्ता के सपने परवान पर हैं. और आज मोदी का कुर्ता और चाय देश की सियासत में अहम हो गए हैं. मोदी लुधियाना में जाते हैं तो पगड़ी, आदिवासियों के बीच उनके कपड़े. सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी ब्रांड इमेज का ख्याल करने वाली उन पर गहन अध्यन के साथ बहुत काम किया है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि मोदी शहर से लेकर गांव तक के युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं. नरेंद्र मोदी युवाओं में ऐसे भारतीय नेता के प्रतीक बन गए हैं जो आया तो सब ठीक कर देगा. वह ऐसे प्रतीक बने हैं कि शेयर बाजार सिर्फ इस सर्वे भर से उछाल मारने लगता है कि नरेंद्र मोदी 2014 में सरकार के मुखिया हो सकते हैं.

 

ऐसे ही कांग्रेस भी प्रतीक बन गई. आजादी दिलाने वाली पार्टी की. उसके नेता युवाओं और गरीबों के नेता बनने की लगातार कोशिश करते हैं. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान से लेकर अभी तक राहुल गांधी हर भाषण के दौरान आस्तीन चढ़ाते दिखते हैं. एंग्री यंग मैन बनने की लगातार कोशिश. गरीबों का हितैषी दिखने के लिए मजदूरों के साथ फावड़ा चलाने से लेकर दलितों के घर भोजन तक सबकुछ टीवी पर चला. प्रतीक बनाने की हर मुमकिन कोशिश, लेकिन उत्तर प्रदेश से लेकर अभी तक सिर्फ असफलता मिली है. लोकतंत्र की आखिरी समर में अब इस प्रतीक की राजनीति किसको ताज पहनाएगी यह भविष्य के गर्भ में है?

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