ABP न्यूज स्पेशल व्यक्ति विशेष: तू डाल-डाल, मैं पात-पात! नीतीश की लंगड़ी! 

By: | Last Updated: Saturday, 13 June 2015 3:49 PM
ABP special : full information on nitish politics

राजनीति के मैदान में बदलते वक्त के बावजूद बस एक ही कुमार का नाम गूंजता चला आ रहा है और वो नाम है नीतीश कुमार. बिहार के छोटे से गांव बख्तियारपुर में जन्म लेने वाले नीतीश कुमार आज देश की राजनीति का एक अहम चेहरा बन गए हैं क्योंकि जनता परिवार ने बिहार में उन्हें अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है.

 

पिछले करीब एक साल से चल रही ड्रामेबाज़ी और हां ना के बाद आखिरकार बड़े भाई लालू प्रसाद यादव ने छोटे भाई नीतीश कुमार को अपना नेता मान लिया. बिहार में चुनाव से पहले लालू और नीतीश का ये गठबंधन अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीजेपी को टक्कर देने के लिए पूरी तरह तैयार है लेकिन बिहार की चुनावी बिसात पर शह और मात के खेल से पहले ही लालू प्रसाद यादव ने ये भी कहा दिया हैं कि उन्हें पीना पड़ा है जहर. लालू यादव की तरह ही नीतीश कुमार भी पिछले लोकसभा चुनाव में हार के जहर का घूंठ पी चुके है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना प्रतिद्वंद्धी मानने वाले नीतीश कुमार एक बार फिर कमर कस कर हो गए है तैयार. और इस बार बिहार की चुनाव जंग में लालू प्रसाद यादव भी हैं उनके साथ.

 

लंबी कश्मकश के बाद आखिरकार ये तय हो गया कि बिहार विधानसभा चुनावों में नीतीश कुमार ही जनता परिवार के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे. नीतीश की इस उम्मीदवारी से पहले राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यूनाइटेड ने गठबंधन करके चुनाव लड़ने का फैसला किया था लेकिन मामला मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी पर जाकर अटक गया था.  गौरतलब ये भी है कि आरजेडी यानी राष्ट्रीय जनता दल के कई नेता ही नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का खुला विरोध कर रहे हैं लेकिन सोमवार को जनता परिवार के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने लालू प्रसाद यादव और शरद यादव की मौजूदगी नीतीश की उम्मीदवार का ऐलान कर दिया.  

 

जाहिर है कि नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव दोनों लोकसभा चुनाव में हार के बाद अपना राजनीतिक वजूद बचाने के लिए साथ आए हैं. दरअसल कॉलेज के अपने दिनों में समाजवादी आंदोलन के समय से साथी रहे लालू और नीतीश कुमार करीब 21 साल पहले अलग हो गए थे. साल 1994 में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के काम करने के तरीकों से क्षुब्ध होकर नीतीश कुमार ने उनका साथ छोड़ दिया था.

 

लालू प्रसाद यादव से अपना बीस साल पुराना रिश्ता तोड़ कर अक्टूबर 1994 में नीतीश कुमार ने जॉर्ज फर्नान्डीज के साथ मिलकर अपनी समता पार्टी बनाई थी. समता पार्टी के जरिए नीतीश ने बाद में बीजेपी के साथ राजनीतिक दोस्ती भी कर ली और साल 2005 में लालू यादव के जंगलराज को मुद्दा बना कर बिहार की सत्ता हासिल करने में भी वो कामयाब रहे थे. इसके बाद के आठ सालों तक नीतीश कुमार बीजेपी के साथ मिल कर बिहार में सरकार चलाते रहे लेकिन साल 2013 में एनडीए से अलग होने के बाद बदले राजनीतिक हालात ने उन्हें एक बार फिर घुमाकर लालू यादव के करीब पहुंचा दिया है.

 

राजनीतिक विश्लेषक संकर्षण ठाकुर बताते हैं कि लालू ने 15 साल राज किया और नीतीश ने 10 साल उनको हटाने में लगाए है. 2005 में वो सफल हुए और तब से नीतीश का राज चल रहा है. मेन ऑपोजिशन में लालू थे बीजेपी नहीं थी. बिहार के दो शीर्ष नेता आज एक हैं वो स्पर्धा में रहे है पिछले 25 साल से बिहार में.

 

बिहार के चुनाव को देश की राजनीति में बेहद अहम माना जा रहा है और यही वजह है कि इन चुनावों को लेकर उठ रहे एक-एक कदम पर देश की नजर टिकी हुई हैं. इसी क्रम में जनता परिवार के एक होने और उसके बिखराव की संभावनाओं को भी राजनीतिक गलियारों में दिल थाम कर देखा जा रहा है. जाहिर नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री उम्मीदवार के तौर पर प्रोजेक्ट होने के बाद से बीजेपी पर भी दबाव बढ़ गया है. बिहार की राजनीति के इस पूरे गणित को भी हम समझेंगे आगे लेकिन उससे पहले एक नजर बिहार में सीटों और वोटों के मौजूदा गणित पर भी डाल लीजिए.

 

243 सीटों वाली बिहार विधानसभा की वेबसाइट के मुताबिक जनता दल यूनाइटेड यानी जेडीयू के पास 110 सीटें है. इसके बाद बीजेपी के पास 86 और राष्ट्रीय जनता दल यानी आरजेडी के पास 24 सीटें है. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी गठबंधन को बिहार की 40 में से 31 सीटें मिली थी. जबकि नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को सिर्फ 2 सीट और लालू प्रसाद यादव की आरजेडी और कांग्रेस गठबंधन को महज 7 सीटें मिली थी. वोट प्रतिशत के हिसाब से भी अगर देखें तो बिहार में बीजेपी गठबंधन को करीब 39 फीसदी,  नीतीश कुमार की जेडीयू को 16 फीसदी और आरजेडी गठबंधन को 29 फीसदी वोट मिले थे. लेकिन अब नीतीश कुमार और लालू यादव के एक होने के बाद ये सवाल बड़ा हो गया है कि बिहार के चुनाव में कौन जीतेगा सबसे ज़्यादा सीटें और कौन बनेगा सबसे बड़ा लूज़र?

 

राजनीतिक विश्लेषक अरविंद मोहन बताते हैं कि पिछले विधासभा के हिसाब से देखे तो बहुत साफ है कि जेडीयू और बीजेपी को नुकसान उठाना है. जितनी सीटें उनके पास हैं दोनों उसके पास पहुचं जाए ये लगभग असंभव लग रहा है. तो उसके अलावा जो भी प्लेयर है चाहे लालू जी हो भले ही आज के वक्त वो हारे दिख रहे हों लेकिन जब सीटें गिनती बाद में हई तो पता लगा कि लालू जी को सबसे ज्यादा फायदा हुआ. कांग्रेस चार सीट पर है उसको लाभ होगा. कम्युनिस्ट एक सीट है अगर उसको थोडी भी सीट दी गई तो उसको ज्यादा लाभ होगा. फिर यही हाल एनडीए के पार्टनर का होगा. तो बाकी सबका फायदा होना है. असल नुकसान इन्ही दो का होना है. और दोनों लीड कर रहे है. तो असली इस पर है कि दोनों किस तरह से अपनी सीट बचाते हैं. कम से कम नुकसान हो और अपने पार्टनर को ही फायदा हो इसका कोशिश करें.

 

कास्ट पॉलिटिक्स में उलझी बिहार की चुनावी राजनीति में पार्टियों के बीच दोस्ती दुश्मनी का पेंच भी बुरी तरह से फंसा हुआ है. कभी नीतीश कुमार के खासमखास रहे पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी अब उन्हीं खिलाफ और बीजेपी के साथ हो गए हैं. मांझी की तरह ही बीजेपी के साथ मिलकर दो विधानसभा चुनाव लड़ने वाले नीतीश कुमार अब बीजेपी के ही खिलाफ खम ठोंक रहे हैं. बीजेपी के साथ छिड़ी इस चुनावी जंग में लालू प्रसाद यादव भी नीतीश के साथ हैं. लेकिन नीतीश कुमार को जेडीयू – आरजेडी गठबंधन का मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करते वक्त उन्होंने जब जहर का घूंट पीने का ऐलान किया तो बिहार की राजनीति में ही जैसे घमासान मच गया.

 

जाहिर है कि नीतीश और लालू के एक साथ हो जाने से जहां बीजेपी को झटका लगा है वही ये सवाल भी उठा है कि क्या ये गठबंधन एक मजबूरी का गठबंधन है. बिहार में नीतीश औऱ लालू के बीच हुए गठबंधन की इस खींचतान के बीच कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों जैसे सहयोगियों दल जहां फायदे में नजर आ रहे है. वहीं नीतीश कुमार की उम्मीदवारी से भारतीय जनता पार्टी के माथे पर परेशानी के बल पडते चले जा रहे हैं. बिहार में बीजेपी दरअसल दो तरफा दबाव में है.

 

बीजेपी पर पहला दबाव ये कि पार्टी के अंदर और बाहर अब ये सवाव उठेगा कि नीतीश कुमार के मुकाबले में उसका मुख्यमंत्री उम्मीदवार कौन होगा ? और बीजेपी पर दूसरा दबाव गैर बीजेपी वोटों के ध्रुवीकरण का भी है. अभी तक बीजेपी मुख्यमंत्री पद के लिए अपना उम्मीदवार घोषित करने के सवाल से बचती नजर आ रही है और इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि बीजेपी के घोषित उम्मीदवार के राजनीतिक कद की तुलना नीतीश कुमार से होने लगेगी. वही दूसरी तरफ पार्टी के अंदर खेमेबंदी का संकट भी खड़ा हो सकता है जिससे पार बीजेपी के बड़े नेताओं को भी भारी पड़ सकता है.

 

राजनीतिक विश्लेषक संकर्षण ठाकुर बताते हैं कि नाम घोषित न करना बीजेपी के लिए घाटे की बात है क्योंकि दूसरी तरफ नीतीश कुमार का नाम साफ तौर पर घोषित हो चुका है. भाजपा के सबसे बड़े नेता नरेंद्र मोदी है और वो तो मुख्यमंत्री नहीं होने जा रहे वो प्रधानमंत्री हैं. राज्य में लोग लोकल लीडर खोजते है. दिल्ली में भी वही हुआ.

 

बिहार चुनाव से पहले नीतीश कुमार के नाम पर अपने विरोधियों के एक हो जाने से बीजेपी के लिए दूसरा बड़ा खतरा गैर बीजेपी वोटों के धुव्रीकरण का भी है. दिल्ली के चुनाव में बीजेपी इस संकट से रुबरु हो भी चुकी है.

 

दिल्ली विधानसभा के चुनाव में गैर बीजेपी वोटों का आम आदमी पार्टी के पक्ष में ध्रवीकरण होने से आए परिणाम सबके सामने है. यही वजह है कि बीजेपी नीतीश कुमार के खिलाफ अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार उतारने की बजाए एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर बिहार चुनाव जीतना चाहती है. उधर बिहार की चुनावी जंग में अब नीतीश कुमार भी नरेंद्र मोदी के हथियार को ही आजमाना चाहते हैं दरअसल नीतीश ने चुनाव प्रचार के लिए उसी टीम को अपने साथ जोड़ा है जिसने पिछले लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के चुनाव कैंपेन का जिम्मा संभाला था. सिटिजन फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस नाम की इस टीम में आईआईटी और आईआईएम के ग्रेजुएट शामिल है.

 

राजनीतिक विश्लेषक अरविंद मोहन ने कहा कि पिछला लोकसभा चुनाव भी यही बताता है कि अपना सामाजिक आधार ना होना औऱ कांग्रेस सेदोस्ती ना होना. और फिर मोदी की पर्सनालिटी से सीधी टक्कर हो तो उसमें वो काफी पीछे हो गए. लेकिन अगर बिहार भर की बात है और साल भर में मोदी की इमेज में कुछ गिरावट आई है. उसके बाद नीतीश कुमार काफी बड़ी पर्सनालिटी हैं बिहार भर के लिए. अब वो अपने को कितना बदलते हैं क्योकि अभी उन्होंने लडाई दो तीन लेवल पर शुरु कर दी है. एक अपनी पर्सनालिटी को प्रोजेक्ट करना. उसी ग्रुप को पकड़ कर ले आना जो मोदी के पीछे था. दूसरा उन्होंने ये भी किया कि लालू को दबाने के लिए कांग्रेस का सहारा लिया जो पिछली दफा लालू ने कांग्रेस से मिल कर मुसलमान वोट अपनी तरफ किया था बिहार में कांग्रेस का सपोर्ट बहुत महत्वपूर्ण हैं.

 

जहर का घूंट पीकर ही सही लेकिन बिहार के अगले चुनावों में अब जनता परिवार का चेहरा नीतीश कुमार बन चुके हैं. कांग्रेस पहले ही उन्हें बिहार में अपना नेता मान चुकी है ऐसे में अब सवाल बीजेपी का है. नीतीश औऱ लालू का गठबंधन बीजेपी की राह में सबसे बड़ी चुनावी चुनौती बन कर खड़ा हो गया है लेकिन बिहार के इस चुनाव में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की बीजेपी से लड़ना इतना आसान भी नहीं है क्योंकि राज्य में जहां बीजेपी का सामाजिक आधार बेहद मजबूत है वही उसके संगठन की ताकत और उसके कार्यकर्ताओं की फौज भी काफी बड़ी है. चुनाव लड़ने के लिए बीजेपी के पास रिसोर्स की भी कोई कमी नहीं है. ऐसे में बिहार विधानसभा चुनाव में कांटे की टक्कर तय मानी जा रही है.   

 

राजनीतिक विष्लेषक संकर्षण ठाकुर बताते हैं कि अभी 3-4 महीने बाकी है चुनाव में. अभी कुछ भी कहना मुश्किल है. दोनों खेमों में तैयारियां चल रही है अभी. टक्कर जरुर होगी एकतरफा चुनाव नहीं होगा.

 

बिहार के राजनीतिक हालात से साफ है कि यहां विधानसभा चुनाव में मुकाबला नीतीश कुमार बनाम नरेंद्र मोदी होने वाला है और इसीलिए बिहार के चुनाव में अगर बीजेपी पिछले लोकसभा चुनाव का इतिहास नहीं दोहरा सकी तो इसके मायने नरेंद्र मोदी की लहर कम होने से लगाए जाएंगे. और जिसका असर देश की राजनीति पर पड़ना तय माना जा रहा है. 

 

पिछले लोकसभा चनाव में बिहार में बीजेपी ने 40 में से 31 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी. इस हिसाब से बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 243 सीटों में से 188 सीटों पर जीत मिलनी चाहिए लेकिन ये एक बेहद मुश्किल टारगेट है जिसे भेद पाना नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए आसान नहीं होगा. नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट होने के बाद बीजेपी की मुश्किल और ज्यादा बढ़ चुकी है इसीलिए बीजेपी अब विपक्ष को विभाजित करने की कोशिश में लगी है. इसके लिए रामविलास पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाह जैसे नेताओं के जरिए हवा भी दी जा रही है ताकि सर्वण जातियों और महादलितों के समर्थन से पार्टी की राह आसान की जा सके.

 

राजनीतिक विश्लेषक संकर्षण ठाकुर बताते हैं कि ये कहना बहुत मुश्किल है कि मोदी का जादू बिहार में चलेगा. ये सब आगे की बाते है. मेरा आंकलन ये है कि 2014 के बाद नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए बिहार का चुनाव सबसे बड़ा चुनाव है. चुनाव करीब आते आते सबको ये पता चल जाएगा कि चुनाव का संचालन प्रधानमंत्री खुद की तरफ से हो रहा है.

 

बिहार चुनाव के नतीजे देश की राजनीति पर असर डालने वाले हैं और इसीलिए एनडीए और यूपीए दोनों खेमों में चुनावी तैयारी तेज हो चुकी है. ये चुनाव नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी के लिए भी सबसे ज्यादा अहम है. वैसे भी इन दोनों के बीच राजनीतिक दोस्ती – दुश्मनी की ये कहानी करीब दस साल पुरानी है. जिसकी शुरुवात साल 2005 में हुई थी.

 

साल 2005 में नीतीश कुमार गुजरात दंगों की तुलना काठी की हांडी से किया करते थे. उनके मुताबिक जैसे काठ की हांडी एक बार ही आग पर चढ़ कर जल जाती है वैसे ही गुजरात दंगों का मामला 2004 में एनडीए की हार के साथ खत्म हो जाना चाहिए. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले नीतीश कुमार अपनी ही बात से पलट गये थे.

 

पिछले 11 सालों में नरेंद्र मोदी को लेकर नीतीश कुमार का जो रुख रहा है उसकी शुरूआत दरअसल 2005 से ही हुयी थी. उस वक्त बिहार में विधानसभा चुनाव होने थे. तब नीतीश कुमार ने बीजेपी को इस बात के लिए राजी कर लिया था कि अगर बिहार में सत्ता में आना है तो नरेंद्र मोदी को बिहार से दूर रखना होगा.  

 

एक हाथ से बीजेपी का समर्थन और दूसरे हाथ से नरेंद्र मोदी का विरोध. साल 2005 में नीतीश कुमार को इस चुनावी रणनीति का फायदा मिला. उन्होंने बिहार में लालू प्रसाद यादव के 15 साल के राज को खत्म कर दिया था.

 

नीतीश कुमार दूसरी बार बहुमत के साथ बिहार के मुख्यमंत्री बने. इस बहुमत की एक बड़ी वजह नीतीश की सोशल इंजीनियरिंग यानी समाज के अलग अलग वर्गों को अपने साथ जोड़ने की राजनीति थी. लालू प्रसाद यादव ने पिछड़े वर्ग और मुसलमानों के वोट बैंक पर अपनी सत्ता खड़ी की, तो नीतीश ने पहले अति पिछड़े वर्ग और महादलितों को अपने साथ जोड़ा, फिर बीजेपी के साथ से सवर्णों का समर्थन भी हासिल किया और मोदी के विरोध से मुस्लिम वोट.  

 

सोशल इंजीनियरिंग के अलावा नीतीश की जीत के लिए बहुत हद तक लालू यादव खुद भी जिम्मेदार थे. लोगों में लालू के खिलाफ गुस्सा था. क्योंकि लालू राज के शुरूआती कुछ सालों के बाद से बिहार की हालत बद से बदतर होती गयी. वहीं नीतीश कुमार ने विकास और सुशासन का नारा दिया. मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश ने सबसे पहले बिहार की कानून व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित कर दिया था.

 

कानून व्यवस्था के अलावा नीतीश ने राज्य की सड़कों और बुनियादी ढांचे के सुधार पर ध्यान दिया. पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को पचास फीसदी आरक्षण दिया. इन फैसलों से नीतीश की छवि विकास पुरूष की बनी.

 

नीतीश कुमार जितना ध्यान अपने काम पर था. उनका उतना ही ध्यान अपनी इमेज पर भी था. वो देश में विकास पुरूष और सेक्युलर नेता के तौर पहचाने जाना चाहते थे. यही वजह है कि 2005 के बाद से बीजेपी के साथ रहते हुए भी उन्होंने नरेंद्र मोदी से दूरी बनाये रखी. इतना ही नहीं 2009 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर उन्होंने नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार के लिए बिहार आने से रोक दिया था.

 

लेकिन जो बिहार में न हो सका वो 2009 में लुधियाना में हो गया. नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार एक मंच पर हाथ में हाथ डाले नजर आये. एनडीए की इस रैली में नीतीश कुमार बैठे हुए थे, तभी नरेंद्र मोदी उनके पास गये और हाथ पकड़ कर भरी भीड़ के सामने ले आये.

 

नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी की तस्वीर एक साल बाद साल 2010 में बिहार के अखबारों में एक विज्ञापन के तौर पर छपीं. इसमें बिहार में बाढ़ के समय गुजरात की तरफ से दी गयी मदद का जिक्र किया गया था. इस पर नीतीश कुमार आपे से बाहर हो गये.

 

जून 2010 में बिहार में बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक थी. नीतीश कुमार ने बीजेपी नेताओं के लिए डिनर का आयोजन किया था लेकिन नीतीश का गुस्सा इतना भड़क गया कि उन्होंने न सिर्फ बीजेपी नेताओं के लिए रखा गया डिनर कैंसिल कर दिया बल्कि गुजरात की तरफ से दिया गया मदद का चेक भी वापस लौटा दिया था.

 

29 अक्टूबर 2013 की रैली में नीतीश कुमार ने कहा कि कोसी में त्रासदी आयी बहुत लोगों ने मदद की हर राज्य ने सहायता भेजी. 5 करो़ड़ की सहायता भेजी गयी उसका गुणगान किया गया जो दान दिया जाता है उसका बखान नहीं किया जाता. कोसी में 5 करोड़ की क्या मुराद – ले जाओ अपना 5 करोड़.

 

साल 2010 की इस घटना के बाद नीतीश कुमार ने बीजेपी से गठबंधन तोड़ने की धमकी तक दे डाली थी लेकिन उसी साल विधानसभा चुनाव होने थे इसीलिए ये मामला उस वक्त शांत हो गया और नीतीश एक बार फिर प्रचार के लिए नरेंद्र मोदी के बिहार आने पर रोक लगाने में कामयाब रहे थे.

 

नरेंद्र मोदी के विरोध की रणनीति 2010 में भी नीतीश कुमार के काम आयी. इस साल हुए बिहार विधानसभा के चुनाव में एनडीए को 206 सीटों के साथ जबरदस्त बहुमत मिला था और अकेले जेडीयू को 115 सीटें मिलीं थीं. नीतीश तीसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने. इस जबरदस्त जीत के बाद से ही नीतीश कुमार को ये लगने लगा कि उन्हें सत्ता के लिए बीजेपी की बैसाखी की जरूरत नहीं है बिहार में. विकास को मुद्दा बनाने में भी कामयाब रहे थे. वहीं दूसरी तरफ गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने राज्य में विकास का नारा बुलंद कर रहे थे.

 

नीतीश कुमार अब तक नरेंद्र मोदी के खिलाफ इसलिए रहे ताकि बिहार का मुस्लिम वोटबैंक उनके साथ बना रहे लेकिन अब ये लड़ाई दो ऐसे मुख्यमंत्रियों की होती जा रही थी जो विकास के रथ पर सवार होकर दिल्ली की गद्दी तक पहुंचना चाहते थे. जून 2012 में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जो राज्य जातिवाद के जहर के अंदर उलझ गये वहां क्या हुआ. बिहार कभी कितना शानदार था वहां के जातिवादी लोगों ने उसे तबाह कर दिया.

 

नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी के बीच की ये लड़ाई अब इस बात पर थी कि कौन बेस्ट पीएम उम्मीदवार होगा ? नीतीश कुमार को लगता था कि मोदी की कट्टर छवि के मुकाबले उनका उदारवादी चेहरा उन्हें ज्यादा मजबूत उम्मीदवार बनाता है. लेकिन वो ये भी खूब समझते थे कि बीजेपी के मुकाबले उनकी पार्टी जेडीयू बहुत छोटी है, जिसका जनाधार बिहार तक ही सीमित है. इसीलिए उन्होंने प्रधानमंत्री बनने की इच्छा कभी खुलकर जाहिर नहीं की.

 

एक तरफ नीतीश खुद को पीएम पद की दौड़ से बाहर बता रहे थे और दूसरी तरफ एनडीए से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम पूछ रहे थे. लेकिन गुजरात में लगातार तीसरी बार चुनाव जीत कर नरेंद्र मोदी ने अपनी बीजेपी में प्रधानमत्री पद की अपनी दावेदारी को और मजबूत कर लिया था जिसके बाद से नीतीश कुमार खुलकर नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने लगे थे.

14 अप्रैल 2013 का भाषण दिल्ली में. नीतीश कुमार ने कहा ये देश हवा बनाने से नहीं चल सकता है लोगों को भ्रम हो जाता है कि जो हवा बांध देंगे उसी मे लोग बंध जाएंगे. ये देश प्रेम, मोहब्बत, भाई चारे, सद्भाव से चलेगा गले मिलने से चलेगा. इसमें कभी टोपी भी पहननी पड़ेगी कभी टीका भी लगाना पड़ेगा.

 

एक तरफ एनडीए में नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी के नाम पर हंगामा कर रहे थे तो दूसरी तरफ बीजेपी के अंदर भी मोदी की उम्मीदवारी को लेकर घमासान मचा हुआ था. लेकिन आखिरकार बीजेपी ने जब नरेंद्र मोदी को 2014 के आम चुनाव की कमान सौंपने का फैसला किया तो इसी के साथ नीतीश कुमार ने भी बीजेपी से 17 साल पुराना रिश्ता तोड़ने का ऐलान कर लिया था.

 

शरद यादव, 16 जून 2013 – एक आमराय बन रही है कि अब साथ चलने से न तो उनके गठबंधन को लाभ होगा और न हमारी पार्टी के लिए हितकारी होगा इसलिए हमने फैसला किया कि अब उनका रास्ता और हमारा रास्ता अलग हो गया.

 

जेडीयू से अलग होने के बाद सितंबर 2013 में बीजेपी ने औपचारिक तौर पर नरेंद्र मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया. इसके बाद नरेंद्र मोदी ने पटना जाकर नीतीश कुमार को ललकारा.

 

27 अक्टूबर 2013 की हुंकार रैली में नरेंद्र मोदी ने कहा कि बिहार के मुख्यमंत्री मेरे दोस्त हैं. लोग मुझसे पूछते हैं कि उन्होंने साथ क्यों छोड़ा तो मैं बताता हूं. जो जेपी को छोड़ देता है वो भाजपा को क्यों नहीं छोड़ देगा? जो खुद को लोहिया के चेले समझते हैं उन्होने खंजर घोंपा है और कांग्रेस के साथ आंख मिचौली खेल रहे हैं.

 

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की लहर ने कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष का सूपड़ा साफ कर दिया था. बिहार में नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जेडीयू को भी करारी शिकस्त मिली थी औऱ वो महज 2 सीटों पर ही सिमट गई थी. लेकिन अब एक बार फिर बिहार में चुनावी जंग का मैदान सज रहा है, जहां एक बार फिर नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी की होनी है अग्निपरीक्षा.

 

अरविंद मोहन बताते हैं कि अगर बिहार हार गई बीजेपी तो फिर मोदी के लिए आगे की पॉलिटिक्स में दिक्कत आएगी. अमित शाह के लिए टिकना मुश्किल हो जाएगा. मोदी के लिए पार्टी और सरकार के अंदर से आलोचना शुरु हो जाएगी. और फिर देश की पालिटिक्स फिर एक नए फेज़ में जाएगी. इसीलिए बिहार चुनाव का ज्यादा महत्व है.  

 

देश के तीसरे सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य बिहार में चुनावी बिसात पर शह और मात का खेल अभी शुरुआती दौर में है. हांलाकि नीतीश कुमार की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी ने बीजेपी की बेचौनी जरुर बढा दी है लेकिन बिहार में बीजेपी के मुंकाबले खुद को बेहतर विकल्प के तौर पर पेश करने में अभी लालू – नीतीश के गठबंधन को बहुत कुछ करना बाकी है. चुनाव में जातियों का गणित और सीटों का बंटवारा भी अभी बाकी है, और साथ ही बिहार में अभी बाकी है प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश की लोकप्रियता का इम्तिहान.

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