व्यक्ति विशेष : जेल में जागा जुनून, केजरीवाल का यू टर्न!

By: | Last Updated: Saturday, 14 February 2015 4:32 PM
व्यक्ति विशेष : जेल में जागा जुनून, केजरीवाल का यू टर्न!

बॉलीवुड की दुनिया का भी अजब खेल है जो एक आम आदमी का किरदार निभाने वाले फिल्मी सितारे को बेहद खास बना देती है. लेकिन सिनेमा की तरह यही खेल जब राजनीति के मैदान में खेला जाता है तो तस्वीर अलग होती है. यूं तो बॉलीवुड के कई फिल्मी सितारे कैदी का किरदार निभाते रहे हैं. अक्सर फिल्मों में जेल की कहानियां भी दिखाई जाती रही हैं. लेकिन असल जिंदगी की एक कहानी ऐसी भी है जिसके किरदार ने जेल से अपने संघर्ष की एक नई शुरुवात की और आज वो सत्ता के शिखर तक जा पहुंचा है.

जिस तरह एक आम आदमी फिल्म का टिकट खरीद कर किसी हीरो को हिट या फ्लॉप बनाता है. ठीक उसी तरह चुनाव में भी एक आम आदमी अपने वोट से किसी को सत्ता का ताज दिला कर उसका भाग्य विधाता बन जाता है. दिल्ली के विधानसभा चुनाव में भी आम आदमी के वोट ने सत्ता का जो नया समीकरण बुना है उसका नाम है आप. और आम आदमी पार्टी की इस ऐतिहासिक जीत के हीरो बने है अरविंद केजरीवाल. केजरीवाल आज दिल्ली के मुख्यमंत्री बन चुके हैं. वो सत्ता के शिखर पर पहुंच चुके है लेकिन सिर्फ नौ महीने पहले केजरीवाल राजनीति के बियाबान में भटक रहे थे. वो तिहाड़ जेल की तपिश में भी झुलस रहे थे. मई महीने की तपती गरमी में तब केजरीवाल को छह दिन और पांच रातें इसी तिहाड़ जेल की काल कोठरी में गुजारनी पड़ी थी. तब केजरीवाल जेल में थे और बाहर मौजूद थी उनकी आप.

 

सोलह मई 2014 को लोकसभा चुनाव के नतीजे आए थे. बीजेपी को बहुमत मिला और केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की करारी हार हुई थी. खुद केजरीवाल भी नरेंद्र मोदी के हाथों लोकसभा का चुनाव हार गए और उनकी पार्टी के करीब 400 उम्मीदवारों की जमानत तक जप्त हो गई. लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के ठीक पांच दिन बाद अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के तिहाड़ जेल में भेज दिया गया था. केजरीवाल जब जेल में थे तो जेल से बाहर उनके समर्थकों ने डेरा डाल दिया था.

 

अरविंद केजरीवाल अपने आदर्शों की वजह से जेल गए थे या फिर दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनावों की खातिर. दरअसल अऱविंद केजरीवाल शुरु से ही राजनीतिक विरोधियों को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरते रहे हैं. बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष नितिन गडकरी पर भी उन्होंने भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगाए थे और केजरीवाल के इसी बयान के खिलाफ गडकरी ने उन पर मानहानी का मुकदमा दर्ज कराया था. इस मामले में अदालत ने केजरीवाल को दस हजार रुपये का जमानती बांड भरने का आदेश दिया था. जिसे भरने से केजरीवाल ने इंकार कर दिया जिसके बाद 21 मई 2014 को उन्हें जेल जाना पड़ा. 

 

26 मई 2014 की शाम 6 बजे नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी और इसके ठीक दो घंटे बाद रात करीब 8 बजे अरविंद केजरीवाल को जमानत मिलने के बाद जेल से रिहा कर दिया गया था. अरविंद केजरीवाल ने तिहाड़ जेल में पांच रातें और छह दिन गुजारे थे और इन छह दिनों में ही उन्होंने दिल्ली की चुनावी राजनीति को साधने का मंत्र सीख लिया था. दिल्ली में अपनी शानदार जीत के बाद वही गुरुमंत्र केजरीवाल ने अपने समर्थकों को भी दिया है.

 

विरोधियों पर तीखे हमले बोलने वाले केजरीवाल अपने समर्थकों को अब नम्रता का पाठ पढाते नजर आ रहे हैं. बेहद तल्ख अंदाज में अपनी राजनीति पारी शुरु करने वाले केजरीवाल का अंदाज उनकी जेल यात्रा के बाद से ही बदलने लगा था. 21 मई 2014 से लेकर 7 फरवरी 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के बीच आखिर केजरीवाल के अंदर ऐसा क्या कुछ बदला जिसने उन्हें राजनीतिक की दुनिया का नया चाणक्य बना दिया है.

 

आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष बताते हैं कि वो सुबह  सुबह वॉक पर जाते हैं तो वो और उनकी  पत्नी वॉक करने जा रहे थे तो उनके अपार्टमेंट का गार्ड था. उसने फब्ती कसी उनके ऊपर कि चले थे प्रधानमंत्री बनने के लिए . अरविंद आकर बताने लगे कि भई देखो ऐसा ऐसा लोग कह रहे हैं . जब वो अपनी कॉंस्टीटुएंसी में लोगों से मिलने जाते थे क्योंकि एमएलए होने की वजह से उनको मिलना था तो लोगों के घर नॉक करते थे और जब लोग दरवाजा खोलते थे तो कई बार ऐसा हुआ कि लोगों ने दरवाजा खोला और देखा अरविंद केजरीवाल खड़े तो दरवाजा बंद कर दिया बहुत मुश्किल था . एक बार ऐसा वाक्या हुआ कि इनकी मां सब्जी खरीदने गई थीं तो वो उसको ये नहीं पता था कि वो अरविंद की मां हैं तो कहीं से अरविंद का जिक्र आ गया आम आदमी पार्टी का जिक्र आ गया. उसने कहा कि ये तो भगोड़ा है तो ये इतना तकलीफ देता था हम लोगों को कि हम लोगों ने कौन सा गुनाह किया है कौन सी गलती की है हमने सिर्फ इस्तीफा दिया है. चोरी नहीं की. डकैती नहीं डाली. कोई भ्रष्टाचार नहीं किया कोई घोटाला नहीं किया. लोग इस तरह से क्यों रिएक्ट कर रहे हैं.

 

26 मई 2014 को तिहाड़ जेल से रिहा होने के बाद केजरीवाल सीधे दिल्ली के तिलक लेन वाले अपने निवास पर पहुंचे थे. ये वो घर था जो उन्हें बतौर मुख्यमंत्री मिला था. लेकिन अब ना तो केजरीवाल मुख्यमंत्री रहे थे और ना ही वो सांसद बन सके थे. नरेंद्र मोदी के हाथों वो लोकसभा का चुनाव भी हार चुके थे. मुख्यमंत्री पद से केजरीवाल के इस्तीफा देने से आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका लगा था लेकिन लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद तो जैसे पार्टी ही बिखरने लगी थी. दरअसल केजरीवाल ने एक साथ इतने सारे मोर्चो पर लड़ाई छेड़ दी थी कि अब हर मोर्चे पर लड़ना भी मुश्किल था और उसे समेटना भी. ये वो वक्त था जब अरविंद केजरीवाल अपने राजनीतिक सफर के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे थे. 

 

आशीष खेतान ने बताया कि लोगों ने ऑबिचुअरी लिख दी. एक्सपेरीमेंट फेल हो गया. पीड़ा देने वाला था. आशुतोष बताते हैं कि मुश्किल सफर था क्योंकि दिल्ली की सातों सीटें हम हार गए थे और जो हमारे 400 से ज्यादा कैंडिडेट चुनाव लड़े थे उनमें से करीब 400 के आस पास की जमानत जब्त हो गई थी और सबके चेहरे गिरे हुए थे सबको ये था कि भई जिस मिशन को लेकर हम सब चले हैं वो पूरा होगा कि नहीं, पूरा होगा तब हम लोगों ने तय किया कि हम दिल्ली पर फोकस करेंगे.

 

चुनाव प्रचार के दौरान कई बार केजरीवाल पर हमले भी हुए. कभी उन पर स्याही फेंकी गई तो कभी थप्पड़ मारा गया. साफ है कि केजरीवाल ने जहां से चुनावी राजनीति शुरु की थी वो वापस वहीं पर आ खड़े हुए थे और इसीलिए अब वो दिल्ली में दोबारा चुनाव कराने की मांग करने लगे. लेकिन केजरीवाल को इस बात का एहसास भी था कि जो जमीन पिछले चुनाव में उन्होंने तैयार की थी वो खो चुकी है और इसीलिए जनता की कड़वाहट दूर करने के लिए केजरीवाल ने माफी मांगने का फैसला लिया. 

 

आशुतोष बताते हैं कि तब हम लोगों ने तय किया कि हम लोगों को ये भावना जगानी पड़ेगी कि हमने इस्तीफा दे के गलती की दूसरा हमे लोगों को बताना पड़ेगा  एस्योर करना पड़ेगा कि हम अब दोबारा इस्तीफा नहीं देगें. आप हम पर यकीन करिए चाहे कुछ भी हो जाए और उसके बाद से अरविंद ने कहना शुरू किया कि मुझसे गलती हुई है मैं माफी चाहता हूं और अब हम कभी इस्तीफा नहीं देगा . और तभी से वह टैग लाइन निकली 5 साल केजरीवाल जिससे सब कुछ कम्युनिकेट करना था.

 

दिल्ली के लिए केजरीवाल ने अपनी चुनावी रणनीति अब पूरी तरह बदल दी थी. आक्रामक तेवरों की जगह अब नम्रता ने ले ली थी. केजरीवाल अब अपनी हर सभा में इस्तीफे की गलती के लिए लोगों से माफी मांग रहे थे. विरोधियों का नाम लेकर उन पर हमला बोलने की बजाए वो अब दिल्ली के मुद्दों की बात कर रहे थे. दरअसल ऐसा करके वो दिल्ली की जनता के सामने अपनी एक नई और विनम्र छवि पेश कर रहे थे. लेकिन केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी के सामने चुनौती और भी थीं.

 

आशुतोष बताते हैं कि 17 तारीख को रिजल्ट आया और 18 तारीख को हम सब अरविंद के घर में इकठ्ठा हुए और हमने तय किया कि हमे विधानसभा का चुनाव लड़ने की तैयारी करनी चाहिए . हमारा पहला मिशन था कि यहां दिल्ली में सबसे पहले बीजेपी सरकार बनाने की कोशिश करेगी जिसे हमें रोकना है क्योंकि अगर सरकार बन गई तो दिक्कत होगी . और हमने उसको रोका . लेकिन वह माहौल ऐसा था. बहुत मुसीबत वाले दिन थे बहुत कष्टदायक दिन थे.

 

केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद दिल्ली के राजनीतिक हालात भी अब बदल चुके थे. गेंद अब बीजेपी के पाले में थी. दिल्ली में दोबारा चुनाव करवाए जाएं या फिर बीजेपी जोड़–तोड़ से अपनी सरकार बना लें. इन्ही दो विकल्पों के बीच वक्त तेजी से गुजरता चला जा रहा था. दिल्ली में सरकार के गठन को लेकर बीजेपी संगठन और केंद्र सरकार के बीच लंबी जद्दोजहद चलती रही लेकिन केजरीवाल की सक्रियता और विरोधी दलों के दबाव के चलते बीजेपी को दिल्ली में दोबारा चुनाव करवाने के लिए मजबूर होना पड़ा.

 

वरिष्ठ पत्रकार अभय कुमार दुबे बताते हैं कि ये हकीकत है कि बीजेपी ने पूरी कोशिश की लोकसभा चुनाव के बाद किसी तरह जोड़तोड़ के सरकार बना लेगी और दिल्ली के ऊपर हुकुमत करें और नया चुनाव न कराना पड़े लेकिन आप शुरू से ही उसके पीछे पड़ी रही बार बार और लगातार ये कहती रही कि ये तो तोड़फोड़ करना चाहते हैं और सार्वजनिक बयान देती रही एक तरह की रणनीतिक जद्दोजेहद थी. इसमें आप की कोशिश ये थी कि तोड़फोड़ न कर पाए. बीजेपी की कोशिश थी कि हम कर लें और उसमे मुझे ताज्जुब होता है कि बीजेपी जैसे शक्तिशाली पार्टी तोड़फोड़ नहीं कर पाई और एक तरह से देखा जाए तो आप की रणनीतिक जीत हुई उसने बीजेपी को सरकार नहीं बनाने दी और बीजेपी चुनाव कराने के लिए मजबूर हुई.

 

दिल्ली की सत्ता छोड़ने के नौ महीने बाद अपने कार्यकर्ताओं और समाज-सेवियों की बदौलत अऱविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी एक बार फिर दिल्ली में चुनावी जंग के लिए वापस लौटी थी लेकिन इस बार केजरीवाल का मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी की बजाए सीधा बीजेपी से था. 

 

आशुतोष बताते हैं कि हमारी शुरू से ही ये कोशिश थी कि इस चुनाव को किसी भी हालत में केजरीवाल बनाम मोदी नहीं बनने देना चाहे कुछ भी हो जाए. और तब हमने ट्रैप प्ले किया. हमने कहा कि हम बीजेपी को मजबूर कर देगें ये कहने के लिए कि तुम्हारा मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार कौन है. दिल्ली के अंदर ये चर्चा होनी चाहिए कि नरेंद्र मोदी तो मुख्यमंत्री नहीं बन सकते. मुख्यमंत्री तो किसी और को बनना है तो तुमको क्या डर है तुम क्यों नहीं मुख्यमंत्री पद का उम्‌मीदवार बताते हो . जब उनकी तरफ से नाम नहीं आया तो हमने जगदीश मुखी का नाम डाल दिया.  और उसको इतना हैमर किया और हम रोज शाम को बैठते थे और खूब मजा लेते थे कि अब ये जवाब दें इसका और जब उनसे जवाब देते नहीं बनता था तो हम हर सभा में कहते थे कि भई क्या दिक्कत है ये क्यों नहीं अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करते . क्या दिक्कत है इन्होंने 1993 में बताया 98 में बताया 03, 08 में बताया लेकिन अब क्यों नहीं बता रहे. इसका मतलब इनके पास टैलेंट नहीं है तो वो एक ऐसा इशू हमने क्रिएट किया कि उन्हें मजबूरन किरण बेदी को घोषित करना पड़ा.

 

दिल्ली में चुनाव के ऐलान के साथ ही केजरीवाल ने प्रचार अभियान छेड़ दिया था. आम आदमी पार्टी ने सकारात्मक चुनाव प्रचार पर अपना फोकस किया. जिसे केजरीवाल के समर्थक दिल्ली के विकास का एजेंडा कहते हैं. बिजली, पानी, गरीबों के लिए मकान, महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई जैसे मुद्दों को केजरीवाल ने अपने चुनाव प्रचार का अहम हथियार बनाया. जबकि इसके उलट बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे वक्त अरविंद केजरीवाल को ही अपने निशाने पर लिए रखा. 

 

वरिष्ठ पत्रकार अभय कुमार दुबे बताते हैं कि मोदी ने दिल्ली के चुनाव में वही गलती की जो कि मोदी विरोधियों ने लोकसभा चुनाव में की ती उन्होंने आम आदमी पार्टी और केजरीवाल के खिलाफ बहुत नकारात्मक मुहिम चलाई और केजरीवाल के न जाने क्या क्या कहा और इतने अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया जिसकी कोई सीमा नहीं थी. उसका असर ये हुआ कि केजरीवाल का अपना जनाधार मजबूत होकर उसके साथ जुड़ता चला गया. और कुछ जो फैंससीटर होते है जो बीच मैं बैठते हैं और देखते हैं इन बातों को और देखते है कि कौन क्या दे रहा है और उसके हिसाब से तय करते हैं उसमें से भी केजरीवाल को काफी हमदर्दी मिली.

 

चुनाव प्रचार के दौरान केजरीवाल पर तीखे हमले हो रहे थे. उनकी ईमानदारी और तौर तरीकों को लेकर सवाल खड़े किए गए. बीजेपी में पार्टी प्रवक्ता से लेकर प्रधानमंत्री तक ने केजरीवाल पर हमला बोला. किसी ने बंदर कहा, किसी ने बदनसीब तो किसी ने चोर. लेकिन इन तमाम हमलों के बावजूद केजरीवाल ने किसी का नाम लेकर जवाबी हमला नहीं किया. जवाब दिया भी तो विनम्र तरीके से. दरअसल बीजेपी की निगेटिव कैंपेनिंग को भी केजरीवाल ने एक हथियार बना लिया था. वो अपनी सकारात्मक सोच, संकल्प और मजबूत इच्छाशक्ति के सहारे लगातार आगे बढ़ते चले गए. संघर्ष की इस राह पर केजरीवाल बार-बार गिरते रहे लेकिन दोबारा जब भी उठते तो दोगुनी हिम्मत और जोश के साथ, जैसा एक चींटीं करती है.

 

ये उस संघर्ष की दास्तान है जिससे गुजरते हुए अरविंद केजरीवाल दिल्ली की सत्ता तक पहुंचे हैं. ये उन मुश्किलों की कहानी है जो बार-बार कदमों को आगे बढ़ने से रोकती रहीं है. लेकिन केजरीवाल कभी थके नहीं.  केजरीवाल कभी रुके नहीं. क्योंकि केजरीवाल को ये भरोसा था कि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

 

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की बातें आज सुनी जाती है. सुनाई जाती है. वो अखबारों की सुर्खियां बटोरते हैं. यही नहीं आज उनके विरोधियों को भी यह कहना पड़ रहा है कि अरविंद आज जो भी है वो उनकी मेहनत का नतीजा है.

 

तब अरविंद केजरीवाल तब आईआरएस यानी भारतीय राजस्व सेवा में थे. पोस्टिंग दिल्ली में ही थी. लेकिन सरकारी नौकरी से अलग कुछ करने की सोच रहे थे और यही सोच उनको ले पहुंची दिल्ली के पांडव नगर में जहां सम्पूर्ण परिवर्तन नाम का एक संगठन काम किया करता था. इसे कैलाश जी नाम के व्यक्ति चलाते थे. कैलाश जी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े थे. अरविंद केजरीवाल सबसे पहले कैलाशजी की संस्था सम्पूर्ण परिवर्तन से जुड़े थे और एक पत्रिका निकाला करते थे. सामाजिक कार्यकर्ता, राजीव शर्मा भी तब सम्पूर्ण परिवर्तन से जुड़े थे.

 

पूर्वी दिल्ली में सक्रिय सम्पूर्ण परिवर्तन से  केजरीवाल पहले पहल जुड़े. लेकिन अरविंद केजरीवाल ज्यादा दिनों तक सम्पूर्ण परिवर्तन से जुड़े नहीं रहे सके. 15 अगस्त 2002 को को अरविंद केजरीवाल और सम्पूर्ण परिवर्तन से जुड़े कुछ और साथियों के साथ सम्पूर्ण परिवर्तन संस्था को छोड़ दिया. छोड़ने से पहले कामकाज को लेकर बहस भी हुई थी. सम्पूर्ण आंदोलन से निकल कर केजरीवाल ने परिवर्तन संस्था बनाई. परिवर्तन में राजीव शर्मा उऩके साथ थे. तब अरविंद केजरीवाल को कम ही लोग जानते थे. अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने नार्थ- इस्ट दिल्ली के एक पिछड़े इलाके सुंदर नगरी को अपना कार्यक्षेत्र बनाया था.

 

बतौर आंदोलन कारी दिल्ली का सुंदर नगरी इलाका, अरविंद केजरीवाल का पहले कार्यक्षेत्र बना. परिवर्तन  के कार्यकर्ता हिसाब लेकर जनता के बीच जाते थे और उन्हें बताते थे कि उनके क्षेत्र का विकास क्यों नहीं हो पा रहा था.

 

सुंदर नगरी में केजरीवाल के तमाम आंदोलनों की नींव पड़ी लेकिन सुंदर नगरी और उऩका परिवर्तन जल्द ही बहुत पीछे छूट गया है. दरअसल जिस परिवर्तन, एऩजीओ को अरविंद केजरीवाल ने जोर शोर से शुरु किया उसका दायरा उन्हें जल्द ही छोटा लगने लगा. या फिर बड़ा बदलाव का जुनून उनके अंदर काम कर रहा था. जिसकी नींव उनके बचपन में पड़ गई थी.

 

सीवानी मंडी . जहां अरविंद केजरीवाल का गांव है. जो कि हरियाणा के भिवानी जिले में है . यहीं 16 अगस्त 1968 में गोविंद राम केजरीवाल और गीता देवी के घर जनमाष्टमी के दिन अरविंद केजरीवाल का जन्म हुआ था. इसीलिये घरवाले उन्हें किशन नाम से भी बुलाते हैं. पिता पेश से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर थे और उनकी पोस्टिंग सोनीपत, गाजियाबाद और हिसार में हुई. अरविंद भी साथ-साथ जाते रहे.  अरविंद की हाई स्कूल की पढ़ाई हुई हिसार के इस कैम्पस स्कूल में . उनके बचपन के दोस्त बताते हैं कि अरविंद को किताबें पढने और शतरंज खेलने का शौक था. इससे फुर्सत मिलती तो स्कैच बुक थाम लेते. पेड़ , इमारतें , पशुओं के स्कैच बनाते. कभी कोई शिकायत घर नहीं पहुंची.

 

अरविंद बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे. मिशिनरी स्कूल में पढने की वजह से चर्च जाते थे और घर पर हिन्दु रीति रिवाजों सीखा करते थे. सुबह प्रार्थना करते और रात को सोते समय भी . अरविंद को इससे नैतिक बल मिलता था और अपनी बात मनवाने की इच्छा शक्ति भी. उनके स्कूल की टीचर एक किस्सा सुनाती  हैं. वो बताती है कि अरविंद किस तरह धुन के पक्के और जिद्दी थे.

 

अरविंद केजरीवाल को अपने जूनून के साथ जीने आदत बचपन से ही रही है . आईआईटी खड़गपुर भी वो इसी जुनून से पहुंचे. आईआईटी के नीचे किसी भी इंजीनियरिंग कॉलेज में जाने से उन्होने इंकार कर दिया था. वो आई आई टी खड़कपुर में मैकेनिकल इंजिनियरिंग पढ़ने चले गये.

 

वैसे आईआईटी खड़गपुर से केजरीवाल की राजनीतिक विचारधारा बननी शुरु हुई, गरीबों उपेक्षितों की तकलीफों को उन्होंने समझना शुरु हुआ खुद से ही सवाल उठाने शुरु किये कि दुनिया में इतनी असमानता है तो क्यों है.

 

पढ़ाई पूरी करने के बाद अरविंद ने जमशेदपुर में टाटा स्टील में नौकरी की . लेकिन इस नौकरी के दौरान उन्होंने छुट्टी लेकर भारतीय सिविल सर्विस में दाखिल होने की तैयारी करते रहे थे. 1992 में तीन साल तक टाटा स्टील में काम करने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी. और तभी अरविंद केजरीवाल के मुताबिक उनकी जिंदगी नया मोड़ आया. 1992 में जब टाटा स्टील की नौकरी छोड़ने के बाद वो कोलकाता आए और मदर टेरेसा से मिले. केजरीवाल ने इंडिया टुडे को बताया था . मैं टाटा स्टील में सोशल वर्क विभाग में जाना चाहता था लेकिन चूंकि मैं इंजिनियर था लिहाजा मेरा तबादला नहीं हो सका और मैंने नौकरी छोड़ दी. मैं कोलकाता आया. मदर टेरेसा से मिलने की बड़ी इच्छा थी. मिशिनरीज आफ चैरिटी में बहुत लंबी कतार थी. जब मेरा नंबर आया तो मदर टेरेसा ने मेरा हाथ चूमा. मैंने कहा कि मैं उनके साथ जुड़ना चाहता हूं. ये मेरे लिए एक बेहद देवीय क्षण था. मदर टेरेसा ने कहा कि मैं उनके कालीघाट आश्रम जाकर काम करुं. मैं वहां दो महीने रहा.

 

केजरीवाल ने अब आईएएस बनने की ठानी. पहली बार उनका चयन आईआरएस (भारतीय राजस्व सेवा) में हुआ तो अरविंद ने अगले साल फिर आईएएस की परीक्षा दी लेकिन इस बार भी जब चयन आईआरएस में ही हुआ तो ना चाहते हुये भी अरविंद केजरीवाल भारतीय राजस्व सेवा में शामिल हो गये. जिसकी शुरुआती ट्रेनिंग मसूरी में होती है. यहीं उनकी मुलाकात बैचमेट सुनीता से हुई. मसूरी के बाद नागपुर के नेशनल एकेडमी फोर डायरेक्ट टैक्सस में 62 हफ्तों के कोर्स के दौरान मुलाकातें दोस्ती से प्यार में बदल गयी. केजरीवाल ने विधानसभा चुनाव नतीजे आने के बाद कार्यकर्ताओं से अपनी पत्नी सुनीता से मुलाकात भी करवाई.

 

अरविंद केजरीवाल औऱ सुनीता की पहली पोस्टिंग दिल्ली में हुई. दोनों ही इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में असिस्टेंट कमीश्नर बने. अरविंद केजरीवाल ने जल्द ही अपने लिये नया रास्ता  निकाल लिया. रास्ता था गैरसरकारी संगठनों के जरिये समाजिक बदलाव का.

 

लगभग पांच साल तक परिवर्तन और नौकरी साथ साथ चली. इस बीच स्वयंसेवी संगठनों और सामाजिक आंदोलन चलाने वालों के बीच केजरीवाल का दायरा बढ गया था. परिवर्तन का कैनवास केजरीवाल को छोटा लगने लगा और वो सूचना के अधिकार आंदोलन के साथ जुड़े जिसके लिए उन्हे एशिया का नोबल पुरस्कार माना जाने वाला मैगसेसे अवार्ड भी मिला. अवार्ड में मिले पैसे से अरविंद केजरीवाल ने, 2006 के दिसंबर महिने में पब्लिक कॉज रिसर्च फाउंडेशन नाम की संस्था बनाई. इसके बाद परिवर्तन से उनका संबंध कम हो गया .

  

इससे आगे बढे तो अरविंद केजरीवाल सितंबर 2010 में अरुणा रॉय के नेतृत्व में स्वयं सेवी संस्थाओं के ग्रुप नेशनल कैंपेन फॉर पीपल राइट टू इनफॉरमेशन की  लोकपाल ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष बने थे.  ये वो दौर था जब देश में कुछ स्वयंसेवी संगठन और सामाजिक आंदोलन चलाने वाली संस्थाओं को एक झंडे तले लाने की कोशिश हो रही थी. विवेकानंद फाउंडेशन और बीजेपी से जुडे रहे चिंतक विचारक गोविंदाचार्य ने बड़ी पहल की थी. बाबा रामदेव भी सक्रिय रुप से जुड़े थे. और संघ भी परोक्ष रुप से भूमिका निभा रहा था. केजरीवाल ने अरुणा राय की एन सी पी आर आई (नेशनल कैंपेंन फोर पीपुल्स राइट टू इनर्फोरमेशन) को छोड़ा और इस महाआंदोलन का हिस्सा बन गये.

 

अप्रैल 2011 को भारत ने मुम्बई में विश्व कप क्रिकेट का फाइनल जीता . सारे देश में खुशी का माहौल था. कुछ दिनों बाद ही क्रिकेट की इंडियन प्रीमियर लीग शुरु होनी थी. यानि कमोबेश लोग इस दौरान खाली थे. उनकी शामें खाली थी. इसी का फायदा अन्ना केजरीवाल टीम ने उठाया और 5 अप्रैल को अन्ना हजारे जंतर मंतर पर धरने पर बैठ गये. जनलोकपाल को लागू करने की मांग की गयी. दिन भी छुटटी का रखा गया ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग जंतर- मंतर पहुंच सकें.

 

तब अरविंद केजरीवाल अन्ना हजारे की छत्रछाया में काम कर रहे थे . लोग धरने का उद्देश्य ठीक से समझ रहे हैं या नहीं , ये जांचने के लिए केजरीवाल ने गाजियाबाद के अलग – अलग बस स्टाप पर पर्चे बंटवाए और लोगों पर उसके असर का अध्ययन किया गया. ये आंदोलन कामयाब रहा. सरकार झुकी और बातचीत का सिलसिला शुरु हुआ. सरकार से बातचीत  के कई दौर चले. इस दौरान टीम अन्ना देश को बताने में लगी रही कि आखिर उनका जनलोकपाल क्या है , किस तरह उनका जनलोकपाल भ्रष्टाचार को दूर करेगा , घोटाले करने वाले नेताओं और अफसरों को जेल भेजेगा. साथ ही बड़ी सफाई से सरकारी लोकपाल की पोल खोली जाती. कांग्रेस सरकार को आड़े हाथ लिया जाता. सरकार को टीम अन्ना की सारी मांगे हुबहू माननी नहीं थी. उसने मानी नहीं. टीम अन्ना को भी पता था कि ऐसा ही होना है. बातचीत टूटी और टीम अन्ना ने ऐलान किया कि कि 15 अगस्त से एक बार फिर अन्ना हजारे आमरण अनशन पर बैंठेंगे.

 

 

देखते ही देखते केजरीवाल ने सारे आंदोलन को अपने हाथ में ले लिया. एबीपी न्यूज को मई 2014 में इंटरव्यू में किरण बेदी ने बताया कि कैसे केजरीवाल अपनी तरफ से नये कार्यक्रम या तारीख की इक तरफा घोषणा कर देते थे और सबको उनकी बात माननी ही पड़ती थी . किरन बेदी भी उस आंदोलन से जुड़ी थी.

 

अन्ना और अरविंद की स्ट्रेटेजी को जल्दी ही एक बड़ा झटका लगा. अन्ना ने दिल्ली से बाहर मुंबई में आमरण अनशन का एलान किया. एक तरफ अन्ना अनशन पर बैठे और दूसरी तरफ 28 दिसंबर 2011 को लोकसभा में लोकपाल बिल पास हुआ. उधर मुम्बई में अन्ना का आमरण अनशन फ्लाप हुआ. ये पहला मौका था जब अन्ना का अनशन तुड़वाने कोई नहीं आया.

 

मुंबई से बहरहाल अरविंद केजरीवाल भारी मन से दिल्ली लौटे. और यहीं से केजरीवाल और उनके साथियों ने दबे शब्दों में कहना शुरु किया कि राजनीति का कीचड़ साफ करना है तो कीचड़ में उतर ही जाना चाहिए.

 

26 नवंबर 2012 को आम आदमी पार्टी का गठन हो गया. बिजली के बिल आधे करने, 700 लीटर पानी रोज मुफ्त देने, भ्रष्टाचार खत्म करने वाला जनलोकपाल बिल 15 दिन में लाने और ठेके पर कर्मचारियों को एक महीने में पक्की नौकरी देने जैसे लोक-लुभावने वायदे करके केजरीवाल की आप दिल्ली के विधानसभा चुनावों में उतरी. चुनाव नतीजे आए तो केजरीवाल ने सबकी बोलती बंद कर दी. 70 में से 28 सीटें आई. सरकार बनाने की बारी आई तो पहले लोगों की राय जानने के लिये एसएमएस मंगवाये. सर्वे किया और आखिरकार किसी से समर्थन लेंगे और ना ही देंगे की कसम खाने वाले केजरीवाल ने कांग्रेस की बैसाखी के सहारे सरकार बनाई.

 

जितनी वाहवाही उतने ही विवाद. सरकार बनने के साथ ही विवादों का सिलसिला भी शुरु हो गया. बहरहाल  14 फरवरी 2014 को दिल्ली विधानसभा की बैठक शुरु होने से पहले ही लगभग तय हो गया था कि अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री पद से छोड़ देंगे. और वही हुआ भी.

 

केजरीवाल ने बड़ा दांव खेला. दिल्ली राज्य की सत्ता छोड़ कर लोकसभा चुनाव में कूदे. खुद बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ गये. पार्टी की बुरी तरह हार हुई. लेकिन लगता है कि उसी हार ने जेल यात्रा के बाद केजरीवाल को जीत का रास्ता भी दिखा दिया. और जीत भी ऐसी जिसकी मिसाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में नहीं मिलती.

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ENGvsSA: बेयरस्टा के अर्धशतक से इंग्लैंड की आसान जीत

साउथम्पटन: जानी बेयरस्टा के नाबाद 60 रन की बदौलत इंग्लैंड ने तीन मैचों की श्रृंखला के पहले टी20...

दिवालिया घोषित किए गए तीन बार के विंबलडन चैंपियन बोरिस बेकर
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नई दिल्ली/लंदन: जर्मनी के पूर्व टेनिस स्टार बोरिस बेकर को लंदन की एक अदालत ने दिवालिया घोषित कर...

सचिन-गांगुली-लक्ष्मण की क्या ज़रूरत, विराट खुद ही चुन लें कोच: सुनील गावस्कर
सचिन-गांगुली-लक्ष्मण की क्या ज़रूरत, विराट खुद ही चुन लें कोच: सुनील गावस्कर

मुंबई: अनिल कुंबले और विराट कोहली के विवाद में टीम इंडिया के सबसे बड़े बल्लेबाज़ों में से एक...

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