क्रिकेट कथा: जब क्रिकेट के मैदान में आई क्रांति

By: | Last Updated: Friday, 12 December 2014 7:51 AM
Cricket Katha_World Cup 2015_World Cup 1983_Team India_

नई दिल्ली: साल 1981 में मनोज कुमार की फिल्म आई थी क्रांति. क्रांति फिल्म में अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई की कहानी थी. 1983 में इंग्लैंड के मैदानों पर भी क्रांति आई. ये क्रांति थी क्रिकेट पर एकछत्र राज करने वाली वेस्टइंडीज की टीम के खिलाफ. वेस्टइंडीज टीम 1975 और 1979 के विश्वकप की चैम्पियन थी और 1983 में विश्वकप जीतने की प्रबल दावेदार भी.

 

साल 1983 विश्वकप जब शुरू हुआ तो भारत को कोई दावेदार नहीं मान रहा था. भारतीय टीम पिछले दो विश्वकप में सिर्फ एक मैच जीत पाई थी. लेकिन 1983 में मैदान पर ‘क्रांति भर दो’ के नारे के साथ भारतीय खिलाड़ियों ने वाकई क्रिकेट में क्रांति भर दी. जून 2008 में बीसीसीआई के सम्मान समारोह में श्रीकांत ने बताया कि क्रांति भर दो का नारा मैदान पर कीर्ति आजाद का फेवरेट हुआ करता था.

 

तीसरे विश्वकप में इस बार भी 8 टीमें हिस्सा ले रही थीं. श्रीलंका ने टेस्ट खेलने वाले देश का दर्जा हासिल कर लिया था. सिर्फ जिम्बाब्वे की टीम 1982 में ICC ट्राफी जीत कर विश्वकप के लिए क्वालीफाई किया था. पाकिस्तान ने दूसरे विश्वकप में सनसनी फैला कर धाक जमाई थी. अब तीन टीमें हल्की मानी जा रहीं थीं, भारत, श्रीलंका और जिम्बाब्वे. खुद कपिल देव अपनी आत्मकथा ‘स्ट्रैट फ्रॉर्म द हार्ट’ में किस्सा बताते हैं कि विश्वकप के लिए लंदन के वेस्टमोरलैंड होटल पहुंचने पर उनका स्वागत के लिए एक एनआरआई पहुंचे.

 

एनआरआई ने बताया कि लंदन में सट्टे पर उनकी टीम का रेट 66-1 है. साथ ही ये भी आमंत्रण दिया कि लीग मुकाबलों के 14 मैचों के बाद जब आप बाहर हो जाएंगे तो पूरी टीम पिकनिक के लिए आमंत्रित है. कोई नहीं मानता था कि टीम लीग मुकाबलों से भी आगे बढ़ पाएगी.

 

तीसरे विश्वकप में काफी कुछ वही था जो पिछले दो विश्वकप में था. जैसे सफेद ड्रेस और लाल गेंद. आठ टीमें और साठ ओवर. मेजबान भी वही था इग्लैंड. जीतने का सबसे बड़ा दावेदार भी वही वेस्टइंडीज पर इस बार मैच ज्यादा हो रहे थे. ग्रुप मुकाबलों में इस बार हर टीम को अपने ग्रुप की बाकी तीन टीमों के साथ दो-दो मैच खेलने थे.

 

ग्रुप ए में इंग्लैंड, पाकिस्तान, न्यू जीलैंड और श्रीलंका मौजूद थे. जबकि ग्रुप बी में भारत को वेस्टइंडीज, ऑस्ट्रेलिया और जिम्बाब्वे से भिड़ना था. ग्रुप ए में फैसला इस बात पर होना था कि पाकिस्तान सेमीफाइनल में जाएगा या न्यू जीलैंड. वहीं ग्रुप बी में वेस्टइंडीज और ऑस्ट्रेलिया का सेमीफाइनल में जाना तय माना जा रहा था. लेकिन भारतीय टीम ने अपने पहले मैच से जो क्रांति की वो क्रिकेट के इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई.

 

कप्तान कपिल देव

कपिल देव की उम्र थी करीब चौबीस साल. 1 अक्टूबर 1978 से डेब्यू करने वाले कपिल देव ने विश्वकप से पहले 32 वन डे मैच खेले थे जिसमें गेंदबाज के तौर पर उन्हें सिर्फ 34 विकेट मिले थे. सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था 37/3.

 

दूसरे विश्वकप में तो कपिल देव को सिर्फ दो विकेट मिले थे. लेकिन कपिल की कप्तानी की वजह अलग थी. विश्वकप से पहले सिर्फ पांच टेस्ट में और सात वनडे मैचों में कप्तानी की थी कपिल देव ने. पांचों टेस्ट वेस्ट इंडीज के खिलाफ थे जिसमें से तीन हारे और दो ड्रा कराने में कामयाबी हासिल की. जिन सात वनडे मैचों में कप्तानी की थी उनमें श्रीलंका के खिलाफ 3-0 की जीत.

 

पाकिस्तान के खिलाफ एकमात्र वन डे में हार मिली. वेस्टइंडीज के खिलाफ दो हार भी मिलीं. जो चीज कपिल के साथ गई वो थी वेस्टइंडीज में वेस्टइंडीज के खिलाफ मिली जीत. इस जीत में भारत ने 282 रन बनाए थे जो उस वक्त का वेस्टइंडीज के खिलाफ रन बनाने का रिकॉर्ड था. वेस्टइंडीज दबाव झेल नहीं पाया और 27 रन से हार गया.

 

दिलचस्प ये है कि इस मैच में कपिल देव ने 38 गेंदों में 72 रन की पारी खेली थी जिसमें 7 चौके और 3 छक्के शामिल थे. ये भारत की पिछली दो विश्वकप टीमों से अलग अंदाज था. आक्रामक, निडर, और चढ़कर खेलने का अंदाज. इस जीत के साथ कपिल की कप्तानी में वन डे में जीत का स्कोर हुआ था 4/7.

 

1983 की भारतीय बल्लेबाजी

कपिल देव को साथ मिला दुनिया भर में अपनी बैटिंग का सिक्का जमा चुके सुनील गावस्कर का. दो बार विश्वकप खेल चुके थे. ओपनर के तौर पर गावस्कर से बिल्कुल उलटे थे कृष्णाचारी श्रीकांत जो पहली बार विश्वकप टीम का हिस्सा बने थे.

 

1981 में टीम में आए श्रीकांत गावस्कर से बिल्कुल उलटे थे. गावस्कर पारी खेलते समय चुप रहना पसंद करते थे और युवा श्रीकांत बिल्कुल चुप नहीं रह सकते थे. यही अंदाज खेल के मैदान पर भी था. गावस्कर जहां पारी जमाते थे तो श्रीकांत तेजी से रन बोटरते थे.

 

बल्लेबाजी को मजबूती देने की जिम्मेदारी थी लॉर्डस में तीन लगातार मैचों में शतक जड़ने वाले वेंगसरकर के पास. अनुभवी दिलीप वेंगसरकर पहले विश्वकप के बाद से टीम में थे. 1980 के दिसम्बर में टीम में आए संदीप पाटिल और तेज खेल के लिए पहचाने जाने वाले यशपाल शर्मा.

 

1983 की भारतीय गेंदबाजी

कपिल देव के साथ गेंदबाजी आक्रमण की जिम्मेदारी थी बलविंदर संधू की. संधू बहुत तेज तो नहीं थे पर स्विंग अच्छी कराते थे. विश्वकप की पहली गेंद डालने वाले मदन लाल उर्फ ‘मदी पा’ का अनुभव भी टीम के साथ था. दो गेंदबाज और थे एक थे युवा रवि शास्त्री जो उन दिनों लेफ्ट ऑर्म स्पिनर के रूप में जाने जाते थे. साथ ही दिल्ली के तेज गेंदबाज सुनील वालसन.

 

1983 की असली ताकत – ऑलराउंडर

रवि शास्त्री 1983 तक गेंदबाज के रूप में ही मशहूर थे पर वो बल्लेबाजी में भी नाम कमाना शुरू कर चुके थे. मोहिंदर अमरनाथ वन डाउन आया करते थे. लेकिन मीडियम पेसर के तौर पर भी टीम इस्तेमाल करती थी. मोहिंदर अमरनाथ टीम के उपकप्तान भी थे. कीर्ति आजाद ऑफ ब्रेक करते थे लेकिन बल्लेबाजी भी कर लेते थे. रोजर बिन्नी ऐसे ऑलराउंडर थे जिनकी फिल्डिंग की आज भी दाद दी जाती है. अच्छी स्विंग बॉलिंग करते थे. 1982 में श्रीलंका के खिलाफ कपिल देव उऩ्हें ओपनिंग पर भी उतार चुके थे.

 

1983 में भारत के विकेटकीपर

1983 के विश्वकप में 14 लोगों का दल गया था. भारतीय दल के 14वें सदस्य थे सैयद किरमानी. कपिल देव ने एक कार्यक्रम में किस्सा सुनाते हुए कहा कि सैयद किरमानी लेट लतीफ थे पर विकेट के पीछे कैच लपकने में कभी उऩ्होंने देरी नहीं की. 1949 में जन्मे किरमानी तब करीब 34 साल के थे.

 

24 साल के कप्तान की टीम में 34 साल के गावस्कर और किरमानी, 33 साल के मोहिंदर अमरनाथ थे तो दूसरी तरफ 21 साल के रवि शास्त्री भी थे. कपिल देव और उनकी 14 की टीम को 9 जून से लेकर 25 जून 1983 के बीच के 17 दिनों ये साबित करना था कि वो अच्छा क्रिकेट खेलना जानते हैं और इस टीम का पहला मुकाबला विश्वकप के पहले ही दिन 9 जून 1975 को विश्वविजेता वेस्टइंडीज से था, मैदान था मैनचेस्टर का ओल्ड ट्रैफर्ड. एक करिश्मा उनका इंतजार कर रहा था.

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क्रिकेट कथा में पढ़िए क्रिकेट विश्वकप कप से जुड़े किस्से

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तो पहले विश्वकप में यहां अटक गया था भारत

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