भारत के लिए सफल रहा ग्लासगो?

By: | Last Updated: Tuesday, 5 August 2014 3:29 AM
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Kashyap Parupalli

नई दिल्लीः ग्लासगो में रविवार को संपन्न हुए 20वें राष्ट्रमंडल खेलों में भारत अपने पिछली सफलता को नहीं दोहरा पाया, 2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी करते हुए(नई दिल्ली) भारत ने 101 पदक जीते थे. लेकिन यदि नई दिल्ली में हुए पिछले राष्ट्रमंडल खेलों को परे रखकर देखा जाए तो भारत के लिए मैनचेस्टर में 2002 में हुआ टूर्नामेंट को सबसे सफल माना जाएगा.

 

मैनचेस्टर में भारतीय टीम ने 30 स्वर्ण पदकों सहित कुल 69 पदक हासिल किए थे और करियर में पहली बार 50 से आधिक पदक जीते थे.

 

भारतीय दल इस बार जब ग्लासगो के लिए रवाना हुई तो उनसे कहीं न कहीं मैनचेस्टर और मेलबर्न-2006 में किए गए प्रदर्शन के बीच रहने की उम्मीद की जा रही थी.

 

ग्लासगो में भारतीय खिलाड़ियों द्वारा जीते गए 64 पदकों को किसी भी तरह कमतर नहीं माना जा सकता. लेकिन पिछली कामयाबी को दोहराने में भारतीय खिलाड़ी सफल नहीं रहें. दुर्भाग्य से किसी ने नई दिल्ली में भारत के 101 पदकों के साथ दूसरा स्थान हासिल करने को गंभीरता से नहीं लिया. इसके पीछे बड़ा ही अगंभीर तर्क दिया गया कि ‘घर में तो सभी अच्छा करते हैं’.

 

ग्लासगो में भी आखिर हमें मेजबान को मिलने वाला लाभ दिखाई दिया. न सिर्फ मेजबान स्कॉटलैंड ने बल्कि इंग्लैंड ने भी करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया. गौरतलब है कि इंग्लैंड के लिए भी ग्लासगो अपने घर जैसा ही है.

 

इस बार यदि राष्ट्रमंडल खेलों से तीरंदाजी और टेनिस को न हटाया गया होता तो भारत के खाते में कुछ और पदक बढ़ने तय थे. इसके अलावा निशानेबाजी और कुश्ती में भी कुछ खिलाड़ियों से काफी बारीक चूकें हुईं और हम पदक से वंचित रह गए या स्वर्ण से चूक गए.

 

इसके अलावा ग्लासगो में निशानेबाजी की 18 स्पर्धाओं को भी शामिल नहीं किया गया.

ग्लासगो में भारत को सर्वाधिक 13 पदक पहलवानों दिलाए. सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त की अगुवाई में भारतीय पहलवानों ने अपना दबदबा कायम रखते हुए पांच स्वर्ण, छह रजत और दो कांस्य पदक जीते. इसमें विनेश फोगट और बबिता कुमारी ने महिला वर्ग से स्वर्ण पदक दिलाए.

 

ग्लासगो में आखिरी दिन रविवार को पिछले संस्करण की पुनरावृत्ति देखने को मिली. पिछली बार जहां सायना नेहवाल ने बैडमिंटन के महिला एकल वर्ग में देश को स्वर्ण दिलाया था, तो इस बार वही काम पारुपल्ली कश्यप ने पुरुष एकल वर्ग में कर दिखाया.

 

कश्यप ने राष्ट्रमंडल खेलों की पुरुष एकल में भारत के लिए 32 वर्षो बाद स्वर्ण पदक जीता.

 

कश्यप की ही तरह एथलीट विकास गौड़ा ने भी चक्का फेंक में स्वर्ण जीत इतिहास रच दिया. एथलेटिक्स में गौड़ा ने भारत को 56 वर्षो के बाद स्वर्णिम सफलता दिलाई. इससे पहले 1958 में कार्डिफ में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में फर्राटा धावक मिल्खा सिंह ने 440 गज स्पर्धा में स्वर्ण जीता था.

 

ग्लासगो में भारतीय भारोत्तोलकों ने भी शानदार प्रदर्शन किया और तीन स्वर्ण सहित 12 पदक दिलाए, तो भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने लगातार दूसरे वर्ष आस्ट्रेलिया के साथ फाइनल मुकाबला खेला.

 

भारतीय पुरुष हॉकी टीम हालांकि इस बार सिर्फ पिछली बार मिली हार के अंतर को कम कर सकी. पिछली बार ऑस्ट्रेलिया ने भारतीय टीम को 8-0 से हराया था, तो इस बार भारत ने आस्ट्रेलिया को चार गोल ही करने दिए. भारतीय टीम हालांकि इस बार भी फाइनल में अपने गोलों का खाता नहीं खोल पाई.

 

मुक्केबाजी में हालांकि थोड़ी निराशा जरूर हुई. फाइनल में पहुंचे चार मुक्केबाजों में कोई भी स्वर्ण पदक हासिल नहीं कर सका.

 

भारतीय दल को मिली सफलता में हमें उनके साथ लगातार कठिन मेहनत करने वाले अधिकारियों के योगदान को भी नहीं भूलना चाहिए.

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