एबीपी न्यूज़ की खबर का असर: स्पोर्ट्स कमेटी पर बैन लगाएगा DDCA!

By: | Last Updated: Tuesday, 29 December 2015 5:37 PM
DDCA reacts after Abp news report

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नई दिल्ली: कल एबीपी न्यूज़ ने दिल्ली में डीडीसीए में चल रहे कागज़ों के क्रिकेल क्लबों को लेकर बड़ा खुलासा किया था. जिसके बाद अब डीडीसीए की नींद खुली है. अब डीडीसीए के अंदर से जो खबरें आ रही हैं उनके मुताबिक खुद डीडीसीए स्पोर्ट्स कमेटी की व्यवस्था खत्म करने की सोच रहा है. इस बात का औपचारिक एलान जनवरी के पहले हफ्ते में हो सकता है जब एक्सिक्यूटिव कमेटी की बैठक होगी.

 

क्या था खुलासा?

एबीपी न्यूज़ ने बीते दिन दिल्ली के क्रिकेट में चल रहे बड़े गोरखधंधे का खुलासा किया था. आपका चैनल एबीपी न्यूज बता रहा है कि किस तरह दिल्ली के क्रिकेट में कागजी घोटाले हो रहे हैं. एबीपी न्यूज़ ने आपको बताया था कि तरह आखिर किस तरह क्लबों के नाम पर व्यापार हो रहा है और जिसका खामियाजा उठा रहे हैं क्रिकेट में नाम कमाने वाले बच्चे.

 

आइए देखें आखिर क्या है कागजों पर कल्ब?

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ये क्रिकेट पर कलंक नहीं तो और क्या है?
दिल्ली के सभी क्लब DDCA से जुड़े होते हैं जिनके जरिये क्रिकेट में अपना करियर बनाने वाले सबी बच्चे अपना करियर बनाने के बारे में सोचते हैं. डीडीसीए का जिम्मा है दिल्ली में क्रिकेट को बढ़ावा देना. वहीं डीडीसीए ये भी दावा करती है कि वो देश में सबसे ज्यादा क्रिकेट मैच आयोजित करवाने वाली संस्था है. लेकिन असलियत इस दावे से बहुत अलग है.

 

डीडीसीए में रजिस्टर्ड 111 क्लबों के जरिए लगभग हजार क्रिकेट मैच होते हैं. आप भी ये खबर पढ़कर चौंक जाएंगे कि दिल्ली में DDCA के पास 111 क्लब रजिस्टर्ड हैं. ये क्लब तीन हिस्सों में बंटे हैं एलीट, प्रिमियर, और प्लेट डिवीजन. इनमें सरकारी विभागों के क्लब हैं, पब्लिक सेक्टर यूनिट्स के कल्ब हैं, बैंकों के कल्ब हैं और फिर प्राइवेट क्लब हैं. अब आपके मन में ये सवाल घूम रहा होगा कि आखिर ये क्लब करते क्या हैं? आइये पढ़ें:

 

लेकिन ये क्लब क्रिकेट करते क्या हैं?
इन क्लबों की जिम्मेदारी है अपने खिलाड़ियों को प्रैक्टिस कराने की, उन्हें बल्ले गेंद से लेकर नाश्ता तक मुहैया कराने की. लेकिन हकीकत जान कर कर आप हैरान रह जाएंगे कि इन 111 क्लबों में से करीब 25 को छोड़कर अधिकतर कागजों में शुमार हैं. हम खबर की शुरूआत में इन क्लबों को कागजों का कल्ब इसलिए कहा ता क्योंकि इन क्लबों के पास ना तो मैच कराने के लिए मैदान हैं. ना ही प्रैक्टिस कराने के लिए नेट हैं और यहां तक की ऑफिस चलाने तक की जगह तक नहीं हैं.

कुल मिलाकर अधिकतर गतिविधियां सिर्फ कागजों में होती हैं. डीडीसीए इस बात को मानता तो है पर कागजों के क्लब शब्द इस्तेमाल नहीं करना चाहता.

 

आपका अगला सवाल होगा कि जब पिच नहीं, मैदान नहीं, तो ये क्लब चलते क्यों हैं?
चलिए अब आप ये आंकड़ा देखिए दिल्ली के हर क्लब को हर साल 80 हजार रुपये मिलते हैं. नाश्ते के नाम पर साल के 50 हजार रूपये. कुल मिलाकर एक लाख तीस हजार रुपये का भुगतान डीडीसीए हर साल हर एक कल्ब को करता है. आरोप तो यहां है कि असली खेल तो इन एक लाख तीस हजार के बाद शुरू होता है.

 

बड़ी बात ये है कि इन कल्ब की जरूरत क्या है दरअसल क्लब टीम को 15 मैच मिलते हैं और इन्हीं के आधार पर रणजी और फिर नेशनल टीम में जगह मिलती है. यानी दिल्ली के बच्चों को आगे जगह बनाने के लिए इनमें से किसी क्लब का रास्ता पकड़ना होता है और यहीं से शुरूआत हो जाती है एक दूसरे खेल की.

 

जी हां हमने डीडीसीए के जिन कागज़ी क्लबों के बारे में आपको बताया उससे आगे की हकीकत और हैरान करने वाली है. कागजों के क्लबों का खेल यहीं तक नहीं है. जैसे आप प्रॉपर्टी खरीदते बेचते हैं वैसे ही इन क्लबों की खरीद बिक्री भी होती है. पिछले दिनों में तो ये क्लब एक करोड़ रूपये की कीमत तक में बिके हैं. सूत्रों के मुताबिक कागजों के इन क्लबों की कीमत डेढ़ करोड के आसपास चल रही है. डीडीसीए को नए मालिक के नाम का सिर्फ एक कागज देना होता है और बाकी सभी कुछ सिर्फ कागजों पर हो जाता है.

 

डीडीसीए स्पोर्ट्स कमिटी के चुनावों पर निगरानी के लिए पटियाला हाउस कोर्ट के दो जजों बाबू लाल और जी पी थरेजा की कमेटी बनी थी. कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक तीन डीडीसीए क्लब एक ही पते पर चल रहे थे ये थे यंगस्टर्स क्रिकेट क्लब, जीएन गोल्डन सीसी और सिटीजन क्रिकेट क्लब. इसी रिपोर्ट में जिक्र किया गया कि किस तरह खोसला क्लब पहले के एन कोलट्स में बदला और फिर कैसे वही क्लब कैलाश नगर क्लब हो गया. इसी तरह सिंडिकेंट बैंक एक प्राइवेट क्लब में बदल गया. जी हां बीजेपी से निष्कासित सांसद कीर्ति आज़ाद ने भी कुछ यही मुद्दे उठाए थे.

 

इन जजों ने कहा कि करीब 30 कल्बों ने मालिकाना हक बदल दिए और कुछ ने नाम तक बदल दिए बिना रिकॉर्ड में तब्दीली किए पर डीडीसीए का दावा है कि उसके पास ऐसी कोई जानकारी नहीं है. सूत्रों के मुताबिक डीडीसीए के क्लब सिर्फ खरीदे-बेचे नहीं जाते बल्कि अवैध रूप से किराए पर भी दिए जाते हैं.

 

सूत्रों के मुताबिक फिलहाल करीब 50 क्लब तो किराए पर ही चल रहे हैं जिनसे 3 से चार लाख रूपये सालाना का किराया वसूला जाता है. क्लब को किराए पर लेने वाला शख्स अपनी पसंद के लड़कों को क्लब में खिलाता है और इस तरह किराए की रकम वसूल करता है. हर लड़के से करीब 15 लीग मैचों के बदले 30 हजार रूपये वसूले जाते हैं.

 

अब सवाल ये उठता है कि ये कल्ब इतने ताकतवर कैसे हो गए कि कोई उन्हें रोकता टोकता क्यों नहीं है?
डीडीसीए में क्रिकेट को चलाने का काम स्पोर्ट्स कमेटी के पास है. ये कमेटी कोच और सेलेक्टर्स को नियुक्त करती है. यही कमेटी सब्सिडिज देती है. क्लब का मालिक होने का मतलब है कि चुनावों में वोट करने की ताकत हासिल होना. क्लब का मालिक होने का मतलब है अपनी टीम में अपने बच्चों या अपनी पसंद के बच्चों को चुनवाने का.

 

हालांकि इस बड़ी पड़ताल के बाद जब एबीपी न्यूज ने डीडीसीए से सवाल किया तो डीडीसीए ने माना कि कई क्लबों के पास मैदान नहीं है और प्रैक्टिस के लिए व्यवस्था की जा रही है.

 

लेकिन डीडीसीए की इस पूरी पड़ताल के बाद सबसे बड़ा सवाल ये है कि डीडीसीए का काम क्रिकेट को प्राथमिकता देना है पर कागजों पर चल रहे दर्जनों क्लबों को देखने के बाद लगता है कि जैसा यहां क्रिकेट, क्लबों के खेल में कहीं पीछे रह गया है.

देखें पड़ताल का पूरा वीडियो: 

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Web Title: DDCA reacts after Abp news report
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