हॉस्पिटल इलाज से पहले बताएं खर्च : कोर्ट

By: | Last Updated: Tuesday, 1 July 2014 2:43 PM
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मुंबई: बंबई उच्च न्यायालय ने कहा है कि अस्पतालों को बिलों का भुगतान नहीं होने पर रोगियों को रोककर रखने के बजाय रोगियों के इलाज का खर्च उन्हें पहले से बता देना चाहिए या अपने नोटिस बोर्ड पर इलाज का खर्च स्पष्ट करना चाहिए.

अदालत की एक खंडपीठ ने कहा, ‘‘अगर रोगियों को पहले ही बता दिया जाता है कि उन्हें कितना खर्च करना होगा तो वे आसानी से फैसला कर सकते हैं कि उन्हें किस अस्पताल में जाना चाहिए. आदर्श तौर पर तो अस्पतालों को उपचार के खर्च का विवरण अपने बोर्ड पर प्रदर्शित कर देना चाहिए.

 

’’खंडपीठ ने कहा, ‘‘ऐसे भी मामले हैं जिनमें अस्पताल में रोगियों को डॉक्टर नहीं देखते लेकिन अस्पताल उनसे इसका भुगतान ले लेते हैं. कई बार रोगी मेडिकल बिल अदा नहीं कर पाते और बकाया भुगतान करने के लिए उन्हें अपनी कीमती चीजें बेचनी पड़ती हैं.’’

 

 न्यायमूर्ति वी एम कनाडे और न्यायमूर्ति पी डी कोडे की पीठ ने 2001 में ठाणे के एक अस्पताल में एक नेता की अचानक मृत्यु के बाद उसके समर्थकों द्वारा इलाके के सिंघानिया अस्पताल में की गयी तोड़फोड़ का जिक्र करते हुए कल कहा, ‘‘अस्पतालों के नियंत्रण के लिए कुछ नियम होने चाहिए.’’ अदालत उपनगर अंधेरी के सेवन हिल्स अस्पताल और रायगढ़ जिले के पनवेल में प्राचीन हेल्थकेयर मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल द्वारा रोगियों को रोककर रखने के आरोपों वाली दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी.

 

 

न्यायाधीशों ने कहा कि अस्पताल दवाओं और सर्जरी पर काफी खर्च करते हैं इसलिए रोगियों से इसकी भरपाई करनी होती है लेकिन आपत्ति उनके सख्त व्यवहार से है. सरकारी वकील संदीप शिंदे ने कहा कि अस्पतालों को रोगियों को बंधक बनाने का कानूनी हक नहीं है. हालांकि वे उनसे कीमत वसूलने के लिए मुकदमा दाखिल कर सकते हैं. फिलहाल बिलों की भरपाई के मामले में अस्पतालों पर नियंत्रण के लिए कोई प्रणाली नहीं है.
 

अदालत ने भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद :एमसीआई: से भी इस बारे में जवाब मांगा है कि क्या उसका अस्पतालों पर कोई नियंत्रण है और उसने अभी तक दिशानिर्देशों का पालन नहीं करने के मामले में कितने डॉक्टरों को दंडित किया है.

 

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