व्यक्ति विशेष: रामदेव की रामकहानी!

By: | Last Updated: Saturday, 20 June 2015 1:29 PM

तन पर भगवा कपड़े और पैरों में खड़कते लकड़ी के खडाऊं. लेकिन योग गुरु बाबा रामदेव की बस यही एक पहचान नहीं है. वो एक ऐसे योगी के तौर पर भी पहचाने जाते हैं जिन्होंने किताबों और कंदराओं में छिपी योग की ताकत को निकाल कर उसे आम लोगों के लिए सेहत का रामबाण बना दिया है. यूं तो बाबा रामदेव से पहले महर्षि महेश योगी और अयंगर जैसे योग गुरुओं ने दुनिया भर में योग का डंका बजाया है लेकिन योग को देह, स्वास्थ्य और सौंदर्य से जोड़ कर बाबा रामदेव ने योग की जो नई पैकेजिंग की है उसने उन्हें देश- विदेश में घर –घर तक पहुंचा दिया है.

 

यूं तो बाबा रामदेव ने खेत और खलिहान से लेकर हिमालय के बियाबान तक योग का एक लंबा सफर तय किया है लेकिन उनका योग, हिमालय की गुफाओं और कंदराओं में छिपा नहीं रहा बल्कि टेलीविजन के रुपहले परदे पर उतर कर आम आदमी के बेडरुम तक भी जा पहुंचा है और इसी वजह से एक संन्यासी की सादगी कहीं पीछे छूट गई थी और चमकने लगा था एक योगी का चमत्कार. हरिद्वार में एक हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का पतंजलि योगपीठ आज रामदेव की कामयाबी की सबसे बड़ी पहचान बन चुका है. योग ही नहीं बाबा रामदेव की फैक्ट्रियों में बनी आयुर्वेदिक दवाइयां और उनके देसी प्रोडक्ट भी दुनिया में धूम मचाते रहे हैं और इसीलिए बाबा रामदेव भी खुद बन गए हैं एक बड़ा ब्रांड.

 

हम आपको बताएंगे कि कैसे हिमालय की ख़ाक छानने वाला ये गुमनाम सन्यासी बन गया टीवी कैमरों की खुराक. साथ ही आपको ये भी बताएंगे कि बियाबानों में भटकने वाला ये योगी महज चंद सालों में कैसे बन गया योग का सबसे बड़ा ब्रांड?

 

दिल्ली से करीब 135 किलोमीटर दूर बरगद का विशाल दरख़्त हरियाणा के एक गुरुकुल की पहचान है. एक ऐसा गुरुकुल जहां तालीम का मतलब तलवार की तेज धार है. सख़्ती, पांबदी और नियमों में बंधे इस गुरुकुल में जब उस 13 साल के लड़के ने पहली बार अपने कदम रखे थे तो उसके खिलाफ खुद उसी का परिवार खड़ा हो गया था लेकिन विचारों के जिस तूफान ने उस लड़के के मन को झकझोरा था उसकी तपिश ने उसके इरादों का फौलाद बना दिया था. एक हसरत, एक कसक और एक तड़क उसके दिल में मचल रही थी. क्या थी उस मासूम के दिल की तड़प, कैसी थीं वो हसरतें जिन्होंने एक कम उम्र बच्चे को उस दहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया था जहां खत्म हो जाती हैं संसार की सरहद और शुरु होता है संन्यास का मुश्किल सफर. 13 साल का एक बच्चा आगे 25 सालों में कैसे बन गया देश का सबसे बड़ा बाबा?

 

बाबा रामदेव बताते हैं कि प्राणायाम तो बोलते थे कि जो योगी, ऋषिमुनी है उनको करना चाहिए. फिर हमारे मन में आया कि भई जो योग करेगा वो ऋषिमुनि बन जाएगा इसमें क्या बात है. तो हमने सामान्य जनों को योग सिखाना शुरु किया. तो यदि आप ये कहें कि मुझे लोग डॉक्टर के रुप में या योगी, वैद्य के रुप में चिकित्सक के रुप में देखने लगे इसमें मेरा योगदान 1 प्रतिशत है. 99 प्रतिशत उन लोगों का योगदान है जिन्होंने योग करके मुझे ये बताया कि मेरे यहां गांठ थी मेरी ये गांठ ठीक हो गई. मेरी आंखो पर चश्मा था काइट्रिक ग्लूकोमा था ठीक हो गया. मेरी तो थाइराइड की प्राब्लम थी, मेरे तो ब्रेने ट्यूमर था, मुझे तो हेपेटाइटिस था. मेरा वो ठीक हो गया. लोगो ने मुझे योगी बना दिया.

 

योग गुरु बाबा रामदेव के योग की ये कहानी 1990 के आस-पास उस वक्त शुरु होती है जब वो हरियाणा में खानपुर के गुरुकुल में पढ़ने के बाद जींद जिले के कलवा गुरुकुल में आ गए थे. इस समय तक बाबा रामदेव ने संन्यास नहीं लिया था लेकिन कलवा गुरुकुल में रहने के दौरान ही उन्होंने आस–पास के गांवों में लोगों को योग सिखाना शुरु कर दिया था. साल 1992 में रामदेव ने कलवा गुरुकुल को अलविदा कह दिया था और इसके बाद वो हिमालय चले गए थे. करीब पांच साल हिमालय के पहाड़ों में गुजारने के बाद जब रामदेव हरिद्वार आए तो उन्होंने यहां संन्यास ले लिया था और फिर इसी के बाद वो स्वामी रामदेव से बन गए बाबा रामदेव. ये नब्बे के दशक के मध्य का वो दौर था जब बाबा रामदेव हरिद्वार अपने गुरु शंकरदेव महाराज के आश्रम में रहा करते थे और गुरु के आश्रम से ही उन्होंने योग को फैलाने का काम भी शुरु किया था.

व्यक्ति विशेष: रामदेव की रामकहानी! 

बाबा रामदेव ने बताया कि हरिद्वार में आकर के हमारे एक मित्र हैं स्वामी अभयानंद जी उनके आश्रम में हम रहने लगे. टीन का बना हुआ एक कमरा था उसी में रहे हम दो या तीन साल. और वहां से जब हमे श्रद्धेय गुरुजी शंकरदेव जी ले आए अपने आश्रम में. उसके बाद दुनिया में मुझे कहां जाना है मुझे कुछ नहीं पता था. और मैं दुनिया को जानता भी नहीं था. तो हमने पहले बड़े शिविर जो है गुजरात में लगाए. दो सौ, ढाई सौ लोग उनमें आया करते थे. फिर वहां तक भी मुझे ये नहीं पता था कि ये करोडों लोग मुझे पहचानने लगेंगे. और मुझे ये कभी ख्वाब भी नहीं था. कि लोग मुझे पहचाने. कोई सेलेब्रिटी मुझे बनना है. ऐसा कुछ भी नहीं था.

 

करीब 20 साल पहले बाबा रामदेव ने गुजरात में शिविर लगा कर योग सिखाने की शुरुआत की थी. साल 1995 में ही जब बाबा रामदेव संन्यासी बने थे तब उनके योग गुरु शंकरदेव महाराज ने हरिद्वार में उन्हें और उनके दो दोस्तों बालकृष्ण और कर्मवीर के साथ मिल कर दिव्य योग ट्रस्ट की स्थापना की थी. दिव्य योग ट्रस्ट उन दिनों हरियाणा और राजस्थान के शहरों में हर साल करीब पचास योग कैंप लगाता था उन दिनों बाबा रामदेव को अक्सर हरिद्वार की सड़कों पर स्कूटर चलाते देखा जाता था. साल 2002 में गुरु शंकरदेव की खराब सेहत के चलते बाबा रामदेव दिव्य योग ट्रस्ट का चेहरा बने जबकि उनके दोस्त बालकृष्ण ने ट्र्स्ट के फाइनेंस का जिम्मा संभाला और कर्मवीर को ट्रस्ट का प्रशासक बनाया गया था. इसके बाद से ही गुरुकुल के जमाने के ये तीनों दोस्त पतंजलि योगपीठ के आर्थिक साम्राज्य को आगे बढ़ा रहे है.

 

दरअसल बाबा रामदेव के ट्र्स्ट का मकसद आम लोगों के बीच योग और आयुर्वेद के प्रयोग को लोकप्रिय बनाना था. खुद बाबा रामदेव भी बताते हैं कि पहली बार उनको जो पचास हजार रुपये का दान मिला था उसी से उन्होंने आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों का कारोबार शुरु किया था जो आज हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है.

 

योग गुरु बाबा रामदेव बताते हैं कि एक शिविर लगा हमारा दिल्ली में. अभी कुछ दिन पहले उनका स्वर्गवास हुआ श्री रामनिवास गर्ग जी. तो उन्होंने हमे पहली बार पचास हजार रुपये का दान दिया ये मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा दान था. ये करीब बीस बाइस साल पहले की घटना है. तो वो पचास हजार की हमने सीधी दवाईयां खरीद ली. कुछ किराए भाड़े के लिए पैसे रख लिए सीधे आसाम पहुंच गए. वहां हम सब लोग बीमार हो गए. वो दिन मुझे याद है उसके बाद फिर कभी बुखार नहीं आया मुझे जिंदगी में. ये करीब बीस एक साल पहले की घटना है. तो इतना भयंकर बुखार हो गया कि किसी को होश ही नहीं. मुझे भी हो गया श्रद्देय आचार्य बालकृष्ण जी को भी हो गया. आचार्य श्री कर्मवीर जी को भी हो गया. और मुझे आचार्य कर्मवीर जी, आचार्य बालकृष्ण जी, एक मॉरिशस का भी बच्चा हमारे साथ रहता था. वो सुनील उसका नाम था. तो उसको भी बुखार हो गया. फिर पता नहीं क्या वहां से फिर आगे की बात कहता हूं कि ये जो जिसे कहते हैं ना आदमी का हम कर्म कर रहे थे. वो निष्काम भाव से हमने किया.

 

हरिद्वार में दिव्य योग ट्रस्ट के बैनर तले बाबा रामदेव ने देश और विदेश में जोर-शोर से योग शिविर लगाने शुरु कर दिए थे. हरियाणा के गांवों से शुरु हुआ उनके योग सिखाने का ये सिलसिला गुजरात और दिल्ली से होते हुए मुंबई तक जा पुहंचा था. शुरुआत में बाबा रामदेव के योग शिविर में दो से ढाई सौ लोग आते थे लेकिन जैसे- जैसे उनकी लोकप्रियता बढ रही थी उनके शिविरों में लोगों की संख्या भी तेजी से बढती चली जा रही थी. 

 

योग गुरु बाबा रामदेव कहते हैं कि दिल्ली में वो शिविर था हमारा, मेरी जिंदगी का जिसे कहते हैं कि इस बड़े संसार में प्रवेश. वो छत्रसाल स्टेडियम में हुआ. और उस कार्यक्रम में पहली बार मुरली मनोहर जोशी भी आए थे. और साहिब सिंह वर्मा उस समय शायद मुख्यमंत्री थे. या जो भी थे मुझे याद नहीं अच्छे से. साहिब सिह वर्मा जी आए थे और भी कुछ लोग आए थे. तो वो मेरी जिंदगी का पहला बड़ा कार्यक्रम था करीब दस हजार लोगों का. उस समय हमें ये भी दिक्कत होती थी कि दस हजार लोग आ गए इन्हें दिखाए कैसे तो बीच बीच में चार पांच स्टेज लगाते थे. उसमें जो हमारे सहयोगी होते थे वो आसन करके बताते थे. सारी चीजें बताते थे. फिर बाद में हमने स्क्रीन आदि लगाई ये सब किया. खैर यहां से ये चीज बदली.

 

गुजरते वक्त के साथ बाबा रामदेव के योग शिविर में जहां गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों की तादाद तेजी से बढ रही थी वहीं आम आदमी से लेकर फ़िल्म स्टार तक बेहतर स्वास्थ्य और खूबसूरत जिस्म की तलाश में उनके शिविरों का रुख कर रहे थे और यही वजह है कि देश और दुनिया में बाबा रामदेव के करोड़ों फैन्स भी पैदा हो हुए. दिलचस्प बात ये है कि एक छोटे से गांव में जन्मे और गुरुकुल की सख्ती के बीच तालीम हासिल करने वाले बाबा रामदेव के लिए भी ये योग शिविर एक दो धारी तलवार साबित हो रहे थे. रामदेव के शिविरों में जहां लोग उनसे योग सीखने आ रहे थे वहीं ये शिविर खुद रामदेव को दुनियादारी का सबक भी सिखा रहे थे. 

 

योग गुरु बाबा रामदेव बताते हैं कि मुझसे मुंबई में लोग बोले कि आप बहुत सेक्सी लगते हो. फिर मैने बोला कि ये तो बहुत गंदा शब्द है. तो फिर बाद में मैने पूछा कि ये सेक्सी का मतलब क्या होता है. तो फिर मैं जब मुंबई में शिविर से निकलता था तो ये बात है शायद 2003 या चार की. तो वहां लाखो लाख लोग आते थे. बांद्रा कुर्ला काम्पलेक्स दोनो समय फुल होता था. तो उसमें सामान्य लोगों से लेकर के स्टार आदि भी उसी समय से आना शुरु हुए. उसके बाद अमिताभ बच्चन जी भी मिले फिल्म जगत के सारे लोग आप जानते हैं भई. तो मुझे ज्यादा दुनिया दारी का पता नहीं था. तो ऐसे मैं जब शिविर से बाहर निकलता था तो लोग फ्लाइंग किस दे रहे हैं. तो मुझे पहली बार पता चला कि ये भी कोई प्रेम का अपना इजहार करने का कोई तरीका होता होगा.

 

बाबा रामदेव ने एक वक्त के बाद योग शिविरों अपनी दवाओं की मार्केटिंग का जरिया भी बनाया. दरअसल हिमालय से लौटने के बाद जब बाबा रामदेव के पैर हरिद्वार में पूरी तरह से जम गए तो उन्होंने अपने करीबी दोस्त बालकृष्ण के साथ मिल कर जड़ी बूटियों और आयुर्वेदिक दवाओं का कारोबार भी शुरु कर दिया था. लेकिन जितनी शोहरत उन्हें योग से मिली उतने ही वो अपने आश्रम की दवाईयां को लेकर विवादों में भी घिरते रहे हैं. बाबा रामदेव के पतंजलि योगपीठ और दिव्य फार्मेसी पर आरोप लगे कि उसकी ट्रस्ट की दुकानों पर लड़का पैदा करने में मदद करने वाली दवा बेची जा रही है. कहा गया कि पुत्रजीवक बीज नाम की दवा के सेवन करने से महिला द्वारा पुत्र पैदा होता है. लेकिन रामदेव के आश्रम ने दावा किया कि पुत्रबीजक दवा महिलाओं में बांझपन जैसे विकार दूर करने के लिए हैं.

 

बाबा रामदेव के आश्रम में बनने वाली दवाओं औऱ विवादों का नाता पुराना रहा है. साल 2006 में सीपीएम नेता वृंदा करात ने रामदेव की दिव्य फार्मेसी की दवाओं में हड्डियों का चूरा होने का आरोप लगाया था. दवाओं में गड़बडी का ये पूरा मामला भी बाद में विवादों में फंस कर रह गया था लेकिन साल 2012 में रामदेव के कनखल आश्रम से खाद्य विभाग ने दिव्य फॉर्मेसी के कई उत्पादों के नमूने लिए जिन्हें रुद्रपुर लैब की जांच में खरा नहीं पाया गया था लेकिन इन तमाम विवादों के बावजूद भी देश भर में बाबा रामदेव के पतंजलि योग ट्रस्ट के सेंटरों में आयुर्वेदिक दवाइयों के लिए रोजाना लंबी कतारे लगती रही हैं. हरिद्वार में बाबा रामदेव का ये पतंजलि ट्रस्ट तो आज उनके ब्रांड की सबसे बड़ी पहचान बन चुका है रामदेव का ये वही ट्र्स्ट है जिसकी स्थापना के साथ ही उनकी शोहरत का नया सफर शुरु हुआ था.

 

बाबा रामदेव बताते हैं कि 2006 में जब पतंजलि योगपीठ का उद्घाटन हो रहा था. तो उस समय श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी और हमारे जो भी सहयोगी थे उन्होने कहा कि अब मौका है कुछ लोगों को बुलाओ. तो इससे पहले तो सामान्य रुप से लोग मिलते थे. दरअसल हमने ये सोचा नहीं कि हम लोग बहुत बड़े बन चुके हैं. या हमें बहुत लोग प्यार करते हैं हमें अपनी शक्ति का भी नहीं पता था. हकीकत तो ये हैं. और अपनी लोकप्रियता का भी नहीं पता था. 2006 में जब मैने पहली बार पतंजलि योगपीठ के लिए आमंत्रण दिया उद्घाटन के लिए तो करीब पच्चीस मुख्यमंत्री आए थे. तो उसमें मैंने जिसको भी फोन किया एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जो करोड़पति, अरबपति व्यक्ति थे चाहे जो है वो कितने बड़े राजनेता थे. शेखावत साहब को मैंने फोन किया उस समय राजनीतिक लोगों से हम बहुत ज्यादा नहीं मिले थे. तो उनको फोन किया तो वो भी आ गए. तब मुझे थोड़ा सा लगा कि लोग मुझे बहुत प्यार करते हैं.

 

पिछले करीब 25 सालों से बाबा रामदेव के योग और ट्रस्ट का सिलसिला कभी थमा नहीं है. साल 1995 मे दिव्य योग ट्रस्ट, साल 2006 में दूसरा पतंजलि योगपीठ ट्र्स्ट बना और तीसरा भारत स्वाभीमान ट्र्स्ट. बाबा रामदेव एक के बाद एक अपने ट्रस्ट बनाते चले गए और इसी के साथ तेजी से इस संन्यासी का आर्थिक साम्राज्य भी फैलता चला गया है. बाबा रामदेव के अकेले पतंजलि योगपीठ की संपत्ति ही करीब एक हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की बताई जाती है. हरिद्वार में बाबा रामदेव का ये आर्थिक साम्राज्य करीब 6 सौ एकड़ के इलाके में फैला हुआ है. इसमें तीन सौ बैड का मल्टी सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल, योग रिसर्च सेंटर, यूनीवर्सिटी और आयुर्वेदिक फार्मेसी के अलावा फूड पार्क और कॉस्मेटिक मेन्युफैक्चरिंग यूनिट शामिल है. बताया जाता है कि अमेरिका में ह्यूस्टन के पास बाबा रामदेव के ट्रस्ट को करीब 95 एकड़ जमीन दान में मिली है और उनके ट्रस्ट के पास एक स्कॉटिश टापू भी है. खबरों के मुताबिक साल 2009 से आस्था टीवी चैनल के अधिकार भी रामदेव के पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट के पास है. दरअसल मीडिया और टेलीविजन से बाबा रामदेव का उतना ही पुराना नाता रहा है जितना पुराना उनकी शोहरत का इतिहास है. कैसे टेलीविजन ने बाबा रामदेव को शोहरत के सातंवे आसमान तक पहुंचाया था.

 

बाबा रामदेव ने बताया कि ये आस्था और संस्कार चैनल उन दिनों शुरु ही हुए थे. ये हमसे बोले कि आपको योग और आयुर्वेद का बहुत ज्ञान है. आप लोग एक प्रोग्राम बना कर दीजिए. तो मैने कहा ठीक है ले लो. तो ऐसे ही कैमरे पर हमको देखकर कि बोलना होता था. अब हम कैमरे पर बोले तो हमारी आंखे ऐसे – ऐसे करें. तो मेरे से बोले कि बाबा जी आंख ऐसे ज्यादा बंद होती है. खुलती हैं आप थोडा आराम से बात कीजिए. तो हमको कैमरे पर बोलना नहीं आता था. कोई फोटो खींचे तो हम ऐसा ढक लिया करते थे. इतने संकोची थे फोटो का कोई शौक नहीं था. तो फिर हमने पंद्रह बीस मिनट का प्रोग्राम दिया टीवी के उपर. तो फिर बाद में हमको पता लगा कि बहुत प्रसिद्ध हो चुका है. हमारे पास पत्र आने लगे फिर फोन आने लगे. और उसके बाद ये यात्रा शुरु हो गई तो ये जो करोडो लोगों तक जो मैं पहुंचा तो इसमें मैं मानता हूं कि 99 प्रतिशत जो योगदान है वो मीडिया का है.

 

देश भर में लगने वाले योग शिविरों से आगे बढ़ कर बाबा रामदेव ने साल 2002 में पहली बार टेलीविजन की दुनिया में कदम रखा था. उन दिनों साधना और उसके विरोधी आस्था चैनल पर बाबा रामदेव के योग शिविर का प्रसारण भी दिखाया जाने लगा था. रामदेव के पतंजलि योगपीठ ने भी साल 2004 में खुद के योग वीडियो तैयार करने भी शुरु कर दिए थे और इसी के बाद टीवी की दुनिया में बाबा रामदेव ब्रांड का योग इस तेजी फैला कि इसका करीब 25 चैनलों पर 7 भाषाओं में प्रसारण किया जाने लगा. सुबह सबेरे टीवी पर नजर आने वाले बाबा रामदेव के इन योग कार्यक्रमों में भजनों की गूंज भी सुनाई देने लगी थी. अपने योग शिविरों में बाबा रामदेव ने धीरे– धीरे मल्टीनेशनल कंपनियों और होमोसेक्सुआलिटी जैसे विषयों को भी निशाने पर लेना शुरु कर दिया था.

 

योग गुरु बाबा रामदेव के कद को टेलीविजन के छोटे परदे ने चंद सालों में ही इतना बड़ा बना दिया कि उनका एक पांव देश में रहता तो दूसरा विदेश में. वो दुनिया के कई देशों में अब तक सैकड़ों योग शिविर लगा चुके है. यही वजह है कि रामदेव ब्रांड का योग आज आम आदमी के बीच लोकप्रिय हो चुका है और इसीलिए उनकी शोहरत भी ऊंचे आसमान का हिस्सा बन सकी है लेकिन बाबा रामदेव ने इस शोहरत के रास्ते में कई रुकावटे भी देखी हैं.

 

बाबा रामदेव ने बताया कि एक बार मैं लांस एंजलिस में था वहां पर एक लेडी आई पता नहीं वो बड़े शहर की होगी जो भी होगा मुझे याद नहीं है उसके गांव का नाम तो. मुझे बोली कि मेरे पास इतने बिलियन या ट्रिलियन रुपए हैं वो मैं सब आपको दान करना चाहती हूं. मैंने कहा ये तो बहुत बड़ा निर्णय है आपका और मैं आपको दोबारा से सोचकर इसके बारे में बताउंगा. आपको भी सोचना चाहिए. बोली बाबाजी सुनिए ना मैं तो आपको अपना सबकुछ दे चुकी हूं मैने कहां सब कुछ का मतलब. बोली मैं आप के ही साथ रहूंगी. मैंने कहा ठीक है मैं अभी इसकी व्यवस्था करता हूं. आपकी भावनाएं बहुत अच्छी हैं. मेरे जो सेक्रेट्री थे मैंने कहा आर्य जी इसको संभालो जरा कोई पागल आ गई है. फिर उसने हजारों फोन किए लेकिन मैंने हाजरे जी से कहा कि इसके दिमाग में खराबी है इसको मुझसे मत मिलवाना दोबारा.

 

दवाओं का कारोबार और योग का चमत्कार. दो – दो अचूक हथियारों से लैस होकर बाबा रामदेव जब कारोबार के मैदान में उतरे तो उनकी शोहरत के साथ – साथ उनका आर्थिक साम्राज्य भी तेजी से फैलता चला गया. उत्तरप्रदेश के हरिद्वार से लेकर देश और दुनिया के कई देशो तक बाबा रामदेव का नाम भी तेजी से एक ब्रांड की शक्ल अख्तियार करने लगा था.

 

जिस तरह भारतीय संस्कृति में दर्ज योग मानवता के लिए एक चमत्कार माना जाता है ठीक उसी तरह बाबा रामदेव की ये बड़ी कामयाबी भी चमत्कारी कही जा सकती है. स्वामी रामदेव ने पहले योग को अपना ब्रांड बनाया फिर अपने आयुर्वेदिक प्रोडक्ट को और उसके बाद वो खुद भी एक ब्रांड बन गए हैं. 

 

बाबा रामदेव ने कहा कि जो हमे ज्ञान था वो बिना किसी संकोच के हम उसको आगे बताते गए. किसी को एक जड़ी बूटी का भी पता चल जाता है तो वो कहता है कि बताऊंगा नहीं किसी को. तो हमे जो पता थ योग के बारे में आयुर्वेद के बारे में. वेदो के बारे में वो हम सब बताते गए हमने कुछ छिपा कर नहीं रखा. और फिर तो करोडों लोगों का ऐसा सिलसिला शुरु हुआ. आज मैं ग्यारह लाख किलोमीटर की यात्रा पूरी कर चुका हूं पूरे देश दुनिया की. करीब ग्यारह हजार से ज्यादा योग शिविर सभाएं कर चुका हूं. ग्यारह करोड़ से ज्यादा लोगों ने इसमें शिरकत की है. एक दिन मैं ऐसा ही बैठा हुआ था और पीछे प्रोग्राम की कोई क्लिप दिखा रहे थे. तो देखकर के मुझे भी कई बार आश्चर्य होता है कि एक एक दो दो लाख पांच पाच लाख लोग कार्यक्रमों में शरीक होते हैं रोज. मैं भी नहीं समझ पाया ये क्या करिश्मा है कुदरत का. क्या विधान है भगवान का.

 

पहले योग वाले बाबा, फिर टीवी वाले बाबा, उसके बाद फिल्मी सितारों और ताकतवर हस्तियों के बाबा और उसके भी बहुत बाद में बयानों वाले बाबा रामदेव. पिछले करीब बीस सालों में बाबा रामदेव ने एक के बाद एक कई अवतार लिए हैं और आज वो देश में सबसे बडे बाबा ब्रांड भी बन चुके हैं . कैसे 25 साल पहले नन्हा रामकिशन यादव स्वामी रामदेव बन गया था. 

 

दिल्ली से करीब 150 किलोमीटर दूर हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले का गांव है सैद अलीपुर. इसी गांव में बाबा रामदेव का जन्म हुआ था लेकिन ना तो गांव के लोग और ना ही बाबा रामदेव के रिश्तेदार ये खुलासा करने को तैयार है कि आखिर उन्होंने इस दुनिया में कदम कब रखा था. सैद अलीपुर गांव की गलियों में खेलते कूदते बाबा रामदेव का बचपन भी गुजरा है, वो बचपन जिसका बोझ बाबा रामदेव आज भी अपने सिर पर महसूस करते हैं. 

 

रामदेव बाबा बताते हैं कि मैं एक छोटे से गांव में पैदा हुआ हूं. अनपढ़ थे मेरे मां बाप. और जो गांव के बच्चे काम करते हैं वो सब काम, जो आम लोग काम करते हैं वो सब काम. झाड़ू बुहारी से लेकर गाय का गोबर उठाने से लेकर के फसल बोने और काटने से लेकर वो सारे काम मैने किए हैं. और घर से गोबर उठा कर के कूढी में ले जाकर डालते थे. जिसमें गोबर डालते है उसको कूढी कहते हैं. तो वो कोई आधा किलोमीटर दूर थी कूढी तो बीस पच्चीस किलो गोबर एक बार में ही सिर पर रख लिया करते थे नहीं तो दोबारा जाना पड़ता था तो गढ्ढा हो गया था यहां. वो बाद में शीर्ष आसन करके ठीक हुआ.

 

एक छोटा सा गांव, छोटा सा परिवार और छोटी सी उसकी पूंजी. मां-बाप गरीब थे. खेती-किसानी से किसी तरह गुजारा चलता था. परिवार के खराब हालात का अहसास शायद बालक रामकिशन यादव को भी था और इसीलिए आम बच्चों की तरह उसका ध्यान खेल-कूद में कम ही लगता था. बाबा रामदेव के मां-बाप अनपढ़ थे बावजूद इसके गांव के इसी छोटे से स्कूल में उन्होंने रामकिनशन यादव को पढ़ाया जहां उन्होने अपनी जिंदगी का पहला सबक भी सीखा था. आज भले ही बाबा रामदेव का हजारों करोड रुपये का आर्थिक साम्राज्य फैला हुआ है लेकिन स्कूल के उन दिनों में वो फीस भऱने के लिए पैसे भी मुश्किल से ही जुटा पाते थे.

 

योग गुरु रामदेव बाबा बताते हैं कि घर में संघर्षों के बीच में हम जिये. सेकेंड हैंड बुक लेकर के हम पढ़ा करते थे. बहुत कम अपने ऊपर खर्च किया हमने. हम बड़े हो जाया करते थे पैजामा हमारा छोटा हो जाया करता था. अब दो साल तक तीन साल तक एक ही पैजामा चल रहा है तो हमारी हाइट बड़ी हो गई और पैजामा जो है वो छोटा पड़ गया. सेकेंड हैंड बुक लेकर के पढते थे हां क्लास में पोजीशन फर्स्ट आती थी वो अलग बात है मेहनत करके पढ़ते थे. रबर की, टायर बोलते हैं उसको टायर वाली हम चप्पल पहनते थे.

 

हर क्लास में हमेशा अव्वल आने वाले रामकिशन यादव जब स्कूल में आठवीं क्लास मे पढ रहे थे तब एक दिन अचानक उनका स्कूल की पढाई से मोहभंग हो गया और इसीलिए उन्होंने स्कूल ही नहीं छोडा बल्कि वो गांव से ही फरार हो गए थे.

 

रामदेव बाबा बताते हैं कि करीब मैं 9 वर्ष का था तब मैने महर्षि दयानंद को पढ़ना शुरु किया. 12 वर्ष की उम्र तक पहुंचते पहुंचते ये विचार मेरा दृढ हो गया कि मुझे अध्यात्म की दुनिया में जाना है. 15- 16 साल की उम्र में मैंने घर छोड़ दिया. और ये तय कर लिया कि मुझे ऋषियों के रास्ते पर चलना है. महर्षि दयानंद का सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर के मुझे प्रेरणा मिली और मैकाले की शिक्षा पद्धति से मुझे घृणा हो गई विद्रोह हो गया. और मुझे नहीं पता था मेरा कर्म और मेरा प्रारब्ध भाग्य मुझे कहां लेकर जाएगा. लेकिन मुझे इतना जरुर पता था कि मेरी राह अनंत की है मुझे शुरुवात का तो पता था लेकिन मंजिल का नहीं पता था.

 

सैद अलीपुर गांव से करीब 25 किलोमीटर दूर नारनौल का यही वो बस अड्डा है जहां से 27 साल पहले रामकिशन यादव ने अपने घर से भाग कर बस पकड़ी थी. वो बस जो उन्हें संसार से दूर संन्यास के एक ऐसे सफर पर ले गई जिसने ना सिर्फ उनका नाम बदला बल्कि उनकी पूरी पहचान ही बदल कर रख दी थी. अलीपुर गांव से भाग कर तेरह साल का रामकिशन यादव सीधा उत्तर प्रदेश के शहर हरिद्वार पहुंच गया था. जहां वो किसी गुरुकुल में पढना चाहता था. लेकिन दो – तीन गुरुकुल ने जब उसे दाखिला देने से मना कर दिया तो रामकिशन ने अपने गांव के ही पास के एक गुरुकुल में दाखिल ले लिया था.   

 

रामदेव बाबा बताते हैं कि मैं गुरुकुल कालवा चला गया तो वहां के गुरुजी ने कहा कि बेटा आपकी उम्र अभी कम है. हम तो यहां दसवीं बारहवीं करके या बी ए एम ए करके आते हैं उनको पढ़ाते हैं. तो फिर मैं वापस गुरुकुल एक खानपुर है. जहां मैं पैदा हुआ उसी के नजदीक वहां चला गया. तो वहां कहा कि बेटा हम रख तो लेगें लेकिन तुम्हारे मां बाप को चिट्ठी लिख कर बुला लेंगे. उन्होंने चिट्ठी लिख दी मां बाप आ गए फिर लेने के लिए. तो करीब नौ या बारह दिन बाद में वो घर पर लेकर चले गए. पिताजी बोले हाथ – पैर तोड़ दूंगा दोबारा घर से निकला तो. बोले तेरी पढ़ाई बहुत हो गई अब खेती कर.

 

आध्यात्म की आग बालक रामकिशन यादव को वापस खानपुर के इसी गुरुकुल में खींच लाई थीं. मां-बाप ने लाख समझाया, भाइयों ने भी खूब मनाया लेकिन रामकिशन का फैसला फौलादी था उसने इसी आर्य गुरुकुल में करीब पांच साल तक योग और वेद की शिक्षा हासिल की. गुरुकुल के सख्त नियमों के बीच 1992 तक इसी कमरे में रह कर रामकिशन यादव ने योग का बुनियादी सबक सीखा है. इसी गुरुकुल में पढ़े आचार्य अभयदेव उन दिनों को याद कर बताते हैं कि तेज याददाश्त वाले रामकिशन के लिए सुबह चार बजे से ही दिन की शुरुआत हो जाती थी.

 

गुरुकुल में बाबा रामदेव सहपाठी आचार्य अभयदेव बताते हैं कि रामदेव को कोई विषय़ दिया जाता था तो वो उसको बहुत जल्दी याद कर लिया करते थे. यहां गुरुकुल की एक परंपरा रही है कि यहां कोई भी ब्रहम्चारी यहां प्रवेश लेता है विद्यार्थी प्रवेश लेता है. तो उसको संस्कृत पढाई जाती है. संस्कृत में पहले ही एक अष्टाध्यायी, पाणिनी मुनी ने एक पुस्तक लिखी है जिसके अंदर चार हजार सूत्र हैं. वो अष्टाध्यायी कंठस्थ कराई जाती है. इसके बाद में फिर धातु पाठ वगैरह होते हैं. फिर प्रथमावर्ती होती है फिर धातवर्ती होती है कासिका और महाभाष्य तक मतलब चार पांच साल में पूरा कोर्स पूरा हो जाता है.

 

गुरुकुल की परंपरा के मुताबिक खानपुर के आर्य गुरुकुल के नियम भी बेहद सख्त है. यहां विद्यार्थीयों को सुबह चार बजे उठना होता है. फिर दिन भर, हर घंटे के हिसाब से पढाई लिखाई और गुरुकल के दूसरे काम चलते हैं. तन पर सफेद कपडे, जमीन का बिछौना और गुरु के हर आदेश का मुस्तैदी से पालन करना. यही गुरुकुल की रीत होती है और खानपुर के आर्य गुरुकुल की इस परंपरा को रामकिशन यादव ने भी बखूबी निभाया था.

 

गुरुकुल में बाबा रामदेव सहपाठी आचार्य अभयदेव बताते हैं कि स्वामी जी के साथ मैं केवल दो महीने रह पाया. वो हमारे से पहले आ गए थे. और मैं जब यहां आया तब लगभग उनकी शिक्षा पूरी हो गई थी. वो यहां से जाने की तैयारी में थे. और जब उनके साथ रहा तो उनके अंदर बहुत कुछ ऐसी प्रतिभा दिखी कि एक तो वो कार्य के प्रति बहुत ज्यादा निष्ठा वान रहते थे. दूसरा आत्मविश्वास उनमें बहुत ज्यादा था. और वो हम सबके सामने ऐसा बोलते थे कि इस पृथ्वी का मैं ही कल्याण करुंगा. अर्थात ब्रहमचारी पृथ्वी को बदल देता है. बहुत ज्यादा उत्साह होता था उनके अंदर तो हम सोचते थे कि ऐसे ही बोल रहे हैं हमें हंसी आती थी. परिश्रमी बहुत थे एक आज्ञाकारी बहुत ज्यादा थे. गुरुजनों के प्रति कि कुछ भी अगर उनको कहा जाए तो ना नहीं कहते थे.

 

खानपुर के गुरुकुल में पांच साल जैसे पलक झपकते ही गुजर गए थे अक्टूबर 1992 में गुरुकुल की शिक्षा खत्म होने के बाद रामकिशन यादव ने सांसारिक कामों से भी संन्यास ले लिया था और इस तरह महज तेरह साल का रामकिशन यादव 7 सालों में ही स्वामी रामदेव बन चुका था. 

 

गुरुकुल में बाबा रामदेव सहपाठी आचार्य अभयदेव बताते हैं कि गुरुकुल की परंपराओं में या वैदिक परंपराएं कहें जिसको. उसके अंदर सन्यास लेने के बाद में स्वामी लगता है. तो उनका नाम स्वामी रामदेव रख दिया.

 

स्वामी रामदेव अब एक नए नाम और एक नई पहचान के साथ गुरुकुल की चारदीवारी से बाहर निकल चुके थे. घर, परिवार तो उनका पहले ही छूट चुका था और अब गुरुकुल से दूर हिमालय की बर्फीली वादिया उसका इतंजार कर रही थी. हिमालय की पथरीली पहाडियों के बीच पगडंडियों पर रामदेव का ये एक नया सफर था लेकिन इस सफर में वो अकेले नहीं थे बल्कि उनके गुरुकुल के करीबी दोस्त बालकृष्ण भी उनके साथ थे.

 

जिस्म ही नहीं हड्डियों तक को थर्रा देने वाली ठंड और बर्फीले पहाडों के बीच जिंदगी कितनी दुश्वार हो सकती है इसका अहसास ही रोंगेटे खडा करने के लिए काफी है लेकिन ऐसी सुनसान औऱ अंधेरी गुफाओं के अंदर स्वामी रामदेव और बॉलकृष्ण ने अपना नया ठिकाना बना लिया था जिसमें उन्होंने आध्यात्म और योग का एक नया सिलसिला भी शुरु किया था.

 

रामदेव बाबा बताते हैं कि हमने कहा कि नहीं अब घी दूध सबसे मोह छोड़ दिया तो हमको एक समय भिक्षा पर जीना है. तो इसमें थोड़ा सा एडवांस थे आचार्य बालकृष्ण जी. ये लड्डू खाया करते थे वहां. तो इनकी गुफा भी थोड़ी हमसे ज्यादा एडवांस थी. तो हम इनसे कहते भी थे कि भई देखो तुम जो है बड़े मजे ले रहे हो यहां. तो खैर गुफा इनकी ज्यादा खूबसूरत थी. वहां ये रहते थे. और हम एक अलग गुफा में रहते थे. दोनों गुफाओं में अंतर करीब पांच सात किलोमीटर का था. तो हमारी जो गुफा थी वहां एकांत में कोई नहीं था कोई कहता था यहां रात को भालू आता है तो हमारा तो एक हलका सा दरवाजा था उसमें घुसकर ऐसे नीचे झुक कर के घुसते थे उसके अंदर. खड़े नहीं हो सकते थे सीधे उस गुफा में. नीचे ऐसे ही एक कंबल बिछा लिया करते थे. उसमें बिच्छू भी आ सकता है रात को सांप भी आ सकता है लेकिन हमको कभी किसी बिच्चू ने काटा ना साप ने काटा. दो तीन किलोमीटर दूर लेने के लिए जाते थे पानी. स्नान के लिए या पीने के लिए थोड़ा-सा एक डोलू भरके ले आते थे.

 

हिमालय की कंदराओं में सत्य की खोज और सांस साधने का हुनर सीखते स्वामी रामदेव एक और कठिन तपस्या में लीन होना चाहते थे लेकिन हिमालय में पांच साल गुजारने के बाद उनकी जिंदगी ने एक बार फिर ऐसी करवट बदली कि इस संन्यासी को पहाडों की शरण छोड कर गंगा के मैदान में उतरना पडा.  

 

रामदेव बाबा बताते हैं कि वहां जो हम भिक्षावृत्ति करते थे. गंगोत्री में तो ऐसा हुआ कि एक भंडारे में ऐसे ही वहां दूध बांट रहे थे. वो दूध ले लिया हमने भी. तो उन्होंने ऐसा बोल दिया कि गुरुकुल के तो पढे लिखे होते हैं. उस समय हम आचार्य रामदेव हो चुके थे. और ये गुरुकुल के पढे लिखे आचार्य होते हैं. ये कुछ भी नहीं कर सकते जिंदगी में अपने लिए ये रोटी का प्रबंध भी नहीं कर सकते. दो वक्त की ये रोटी भी ठीक से नहीं खा सकते. लेकिन फिर मुझे लगा कि मैंने जब इतना ज्ञान प्राप्त किया है. तो फिर इतने अपमान की जिंदगी ठीक नहीं है. कि हम एक वक्त भिक्षावृत्ति करते हैं उसके उपर साधु संत ही टीका टिप्पणी करने लगे. तो खैर बहुत कुछ देखा. बहुत अपमान सहा. घर से लेकर और संन्यास तक.

 

हिमालय की ऊंची वादियों से निकल कर बाबा रामदेव ने हरिद्वार में अपने पैर जमाए थे. उन्होंने अपने गुरु शंकरदेव महाराज के आश्रम को योग के प्रचार का केंद्र बनाया और आज बाबा रामदेव ब्रांड के योग का सफर अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के पड़ाव तक भी आ पहुंचा है. योग की दुनिया में सबसे बड़ा ब्रांड बन चुके बाबा रामदेव ने व्यापार के संसार से लेकर राजनीतिक के मैदान तक भी अपने हाथ आजमाएं है. बाबा रामदेव उस लक्ष्मण रेखा को पार करने की कोशिश करते भी नजर आए है जिसके सामने खड़ा है एक अहम सवाल. क्या एक संन्यासी को सत्ता सुख की खातिर करना चाहिए अपने साधुत्व का त्याग.

 

रामदेव बाबा कहते हैं कि मेरी जिंदगी की भीष्म प्रतिज्ञा है. मेरा कभी भी ना टूटने वाला अखंड व्रत है कि मैं कभी कोई राजनीतिक पद ग्रहण नहीं करुंगा.

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