धोनी, बीसीसीआई ने कराई भारत की किरकिरी

By: | Last Updated: Thursday, 7 August 2014 2:52 AM
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नई दिल्ली: भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की जिद और अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) की प्रक्रिया की उनकी अनभिज्ञता के कारण ही जडेजा-एंडरसन मामले में भारत को मुंह की खानी पड़ी, अन्यथा भारत को जीत मिल सकती थी.

 

इस मामले में भारत को आखिरी और बड़ा झटका बुधवार को आईसीसी ने दिया. आईसीसी ने एंडरसन पर आए फैसले के खिलाफ अपील करने के बीसीसीआई के अनुरोध को ठुकरा दिया.

 

गौरतलब है कि आईसीसी के न्यायिक आयुक्त गॉर्डन लुइस ने पर्याप्त सबूतों के अभाव में जडेजा और एंडरसन दोनों को दोषमुक्त करार दिया.

 

भारतीय टीम को समझौता करने की पेशकश की गई थी, जिसमें एंडरसन का माफी मांगना शामिल था. अगर ऐसा हो सकता तो इसे ही भारत की जीत माना जा सकता था.

 

कप्तान धोनी ने लेकिन भारतीय टीम के प्रबंधक सुनील देव को इंग्लैंड एंड वेल्स क्रिकेट बोर्ड (ईसीबी) के प्रबंध निदेशक पॉल डाउनटन से इस मामले में बातचीत करने से रोक दिया.

 

इससे पहले, ईसीबी के अध्यक्ष जाइल्स क्लार्क ने आईसीसी के चैयरमैन एन. श्रीनिवासन से इस मामले पर बातचीत की थी. फिर श्रीनिवासन ने धोनी से बात की, लेकिन धोनी भारत की तरफ से एंडरसन पर आरोप लगाए जाने पर अड़े रहे.

 

डाउनटन और देव के बीच लॉर्ड्स में हुए दूसरे टेस्ट मैच के पहले दिन सुबह एक बैठक की व्यवस्था की गई, लेकिन धोनी ने इसे खारिज कर दिया.

 

एंडरसन इससे पहले कई बार खेलों के दौरान बल्लेबाजों पर जुबानी हमले करते रहे हैं. यह निश्चित तौर पर अस्वीकार्य है और यदि इसकी शिकायत अंपायर से करते तो यह आईसीसी की आचार संहिता के स्पष्ट उल्लंघन का मामला बनता.

 

गौर करने वाली बात है कि ईसीबी ने इससे कभी भी इनकार नहीं किया कि एंडरसन विवाद में शामिल नहीं थे. हालांकि वे इसे मामूली बताते रहे.

 

असली सवाल यह है कि अपने सहयोगी जडेजा के लिए दृढ़ता से खड़े रहे धोनी के पास आईसीसी के स्वतंत्र जांच अधिकारी के सामने अपनी बात साबित करने के लिए क्या पर्याप्त सबूत थे?

 

भारतीय टीम ने मैच रेफरी डेविड बून से शिकायत करने के विकल्प को छोड़ते हुए सीधे आईसीसी जाने का फैसला किया.

 

एक बार दोनों पक्षों के बीच बातचीत का रास्ता बंद होने के बाद सारा दारोमदार धोनी पर आ गया कि वह कानूनी रूप से अपना आरोप साबित करें.

 

आशय स्पष्ट था कि या तो धोनी के पास ऐसे किसी तीसरे पक्ष का गवाह हो या मान्य वीडिया दस्तावेज हों. धोनी के पास इनमें से कुछ भी नहीं था.

 

मैदान से बाहर टीम प्रबंधक देव का काम था कि कप्तान धोनी की इच्छा से बाहर जाते हुए वे बातचीत के जरिए मामला सुलझाने की पूरी कोशिश करते.

 

लेकिन सिर्फ देव ही नहीं बीसीसीआई के अंदर भी धोनी के दावे का समर्थन करने वालों की कमी नहीं थी. एक तरह से यह बीसीसीआई के अधिकारियों की कमजोरी ही कहा जाएगा, क्योंकि बीसीसीआई के संविधान के अनुसार, कई मामलों में अधिकारी कप्तान से अधिक अधिकार रखते हैं.

 

जब पता हो कि विवाद वाली जगह कोई सीसीटीवी नहीं लगा है, तो ऐसा आरोप लगाना मूर्खतापूर्ण है. यहां तक कि तीनों प्रत्यक्ष गवाहों ने जडेजा को धक्का देने की बात से इनकार कर दिया.

 

वास्तव में बीसीसीआई को चाहिए था कि इस मामले में वे धोनी पर थोड़ा लगाम लगाते. बल्कि उलटे यह हुआ कि धोनी का समर्थन करने के कारण बीसीसीआई की साख को भी धक्का लगा है.

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