व्यक्ति विशेष: आतंकवादी का आखिरी खत! नवेद से क्यों डरा पाकिस्तान?

By: | Last Updated: Saturday, 22 August 2015 3:38 PM
pakistan afraid Naved

यों की आवाजें, बमों के धमाके और चीख-पुकार के बीच जम्मू – कश्मीर की खूबसूरत वादियां उस वक्त दहशत से सराबोर हो जाती हैं जब कभी सीमा पार से यहां आकर आतंकवादी फिदायीन हमला करते हैं. कश्मीर की इन खूबसूरत वादियों में आतंकवाद का ये सिलसिला बरसों से यूहीं चला आ रहा है. पाकिस्तान से कभी कोई अजमल आमिर कसाब आकर मासूमों पर गोलियों की बौछार करता है तो कभी कोई नावेद अपनी बंदूक का मुंह सुरक्षा बलों के काफिले की तरफ खोल देता है. लश्कर ए तैयबा के आतंकावादी अजमल आमिर कसाब के बाद अब नवेद दूसरा आतंकवादी है जिसे जिंदा पकड़ा गया है. सुरक्षा एजेंसियों के सामने नवेद जो खुलासे कर रहा है उससे एक बार फिर ये बात भी साबित है कि पाकिस्तान की सरजमीन पर किस कदर पैदा हो है नवेद और अजमल आमिर कसाब.

 

करीब दो दशकों से पाकिस्तान कभी हुर्रियत की आड़ में तो कभी सबूतों की बात कह कर आतंकवाद के मुद्दे से अपना पीछा छुड़ाता रहा है. पाकिस्तान में सरकार चाहे बेनजीर की रही हो या फिर नवाज शरीफ की. आंतकवाद के मुद्दे पर उसका रवैया हमेशा दोमुहां ही रहा है और यही वजह है कि आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के साथ एक बार फिर बातचीत करने से पाकिस्तान हिचक रहा है.

 

भारत और पाकिस्तान के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की बैठक में सबसे अहम मुद्दा सीमापार से होने वाला आतंकवाद ही है. लेकिन ऐन मौके पर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से बातचीत करने का बहाना बना कर पाकिस्तान ने आतंकवाद के मुद्दे से बचने का रास्ता निकाल लिया. भारत और पाकिस्तान की बातचीत रद्द होने की दूसरी वजह पाकिस्तान की तरफ से सीमा पर हो रही फायरिंग और उधमपुर में जिंदा पकड़ा गया आतंकवादी नावेद भी है पाकिस्तान को ये डर भी सता रहा है कि भारत आतंकवाद के मुद्दे पर जब बात करेंगा तो नावेद के नाम पर पाकिस्तान को जरुर घेरा जाएगा और ये भी वजह है कि आतंकवाद के मुद्दे पर बात करने से पाकिस्तान भाग रहा है.

 

उधमपुर में जिंदा पकड़े गए आतंकवादी नवेद का ये चेहरा अब पाकिस्तान की नवाज शरीफ सरकार को परेशान कर रहा है दरअसल नवेद ने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के सामने जो खुलासे किए है उससे एक बार फिर पाकिस्तान सरकार की कलई खुल गई है क्योंकि नवेद पाकिस्तान में बने आतंकवाद के उन अड्डों के बारे में खुलासा कर रहा है जहां दहशत फैलाने की ट्रेनिंग दी जाती है. वो अपने उन आकाओं के नाम भी उलग रहा है जिनके इशारे पर भारत में आतंकवाद फैलाया जा रहा है. आतंकवादी नवेद ने सीमा पार से भारत में कैसे घुसपैठ की, वो कहां ठहरा और हमले की साजिश को उसने कैसे अंजाम तक पहुंचाया. यही नहीं नावेद आतंकवादी संगठन लश्कर ए तैयबा का भी हर वो राज उगल रहा है जिसने पाकिस्तान को एक बार फिर आतंकवाद को संरक्षण देने के गंभीर आरोपों के घेरे में खड़ा कर दिया है. 

 

सूत्रों के मुताबिक नवेद ने बताया है कि वो सीमा पर घुसपैठ करके भारत आया है, उसे पाकिस्तान के मुजफ्फराबाद के जंगलों में एके 47 जैसे खतरनाक हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी गई थी. हांलाकि नवेद बार – बार अपने बयान बदल रहा है लेकिन सुरक्षा एजेंसियों को पूछताछ में उसने बताया है कि मुजफ्फराबाद के गढ़ी हबीबुल्लाह के ट्रेनिंग कैंप में उसने आतंकवादी हमलों के लिए 21 दिनों की ट्रेनिंग ली थी. इसके अलावा मुजफ्फराबाद से सटे पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वाह के मनशेहरा इलाके में भी नावेद 21 दिन की ट्रेनिंग कर चुका है. मुजफ्फराबाद का ये वो ही गढ़ी हबीबुल्लाह इलाका है जहां ऐसी ही किसी पहाड़ी पर नवेद और उसके साथी नोमान को हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी गई थी.

 

वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण स्वामी बताते हैं कि नॉर्मली लश्कर ए तयैबा की जो ट्रेनिंग होती है उसमें एक दौरा आम होता है कुछ दिनों का उसके बाद खास होता है लेकिन उसके आगे भी फिदायिन की ट्रेनिंग होती है. नवेद की अभी तक क्लीयर नहीं है कि एक्स्ट्रा ट्रैनिंग हुई थी या नहीं हुई थी और इनके हमले के पूरे इरादे क्या था नावेद फिलहाल अलग अलग वक्त पर अलग अलग कहानीयां सुनाए जा रहा है लेकिन लश्कर के फिदायिन नें बहुत सारे हमलें ऐसे किए हैं जम्मु कश्मीर में सेना के कैंपो में और अलग हाई सिक्योरिटी इंस्टालेशन में और अफकॉर्स सबको पता है जो मुंबई में 26/11 हमले किए थे तो फिदायिन उनके टाप लेबल के ट्रेनी है.

 

भारतीय एजेंसियों की गिरफ्त में आने वाला नवेद, जिंदा पकड़ा जाने वाला पहला आतंकवादी नहीं है. मुंबई पर 26-11 के आतंकावादी हमले में शामिल रहे आतंकवादी अजमल आमिर कसाब को भी जिंदा पकड़ा गया था. लेकिन तमाम सबतों के बावजूद कसाब की तरह ही आतंकवादी नवेद को भी पाकिस्तान ने क्यों अपना मानने से इंकार कर दिया है इस बात की पडताल भी हम करेंगे आगे लेकिन उससे पहले बात पाकिस्तान में जड़े जमा चुके आतंकवादी संगठन लश्कर ए तैयबा की जिसकी आतंक की फैक्ट्री में हर साल तैयार हो है सैकड़ों नावेद और हजारों कसाब.

 

लाहौर से करीब 40 किलोमीटर दूर मुरीदके में ये लश्कर के राजनीतिक विंग जमात उद दावा का मुख्यालय है. जमात का ये आतंक कॉम्पलेक्स लगभग 75 एक़ड जमीन पर फैला हुआ है लेकिन यहां सुरक्षा इतनी चाक-चौबंद रहती है कि कोई परिंदा भी पर न मार सके. कहा जाता है कि आतंकी अजमल आमिर कसाब और नवेद भी इसी मदरसे में पढ़ चुका है. मुरीदके के ट्रेनिंग कैंप में आतंकवादियों को मजहबी तालीम के साथ-साथ हथियार चलाने की बुनियादी ट्रेनिंग भी दी जाती है खास बात ये है कि आतंकवादियों को जेहाद का पहला सबक भी जमात उद दावा के इसी मुख्यालय में सिखाया जाता है. दरअसल लश्कर ए तैयबा महज एक आतंकवादी संगठन ही नहीं है बल्कि ये एक राजनीतिक और चेरीटेबल ग्रुप भी है और इसका मुख्यालय लाहौर के पास मुरीदके नाम की जगह पर है.

 

वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण स्वामी बताते हैं कि लाहौर के पास मुरीदके में जो कैंपस है वहां जाकर देखे तो उसकी फुटेज देखे. तो पूरी समाज सेवा की एक संस्था है. वहां स्कूले हैं जो फ्री में चलते हैं कॉलेज है जो फ्री में चलते हैं स्वीमिंग पूल, स्पोर्ट्स फैसलिटी, अस्पताल, फ्लड रिलीफ, फूड रिलीफ, मेडिकल एड, मतलब जो चीज आप सोच सकते हो. इंजीनियरिंग कालेज हो सब कुछ वहां है. और जब एक ऐसी संस्था बन जाती है खासकर पाकिस्तान जैसे एक मुल्क मे जहां सरकार ज्यादा कुछ कर नहीं रही होती. जहां नेता बुहत करप्ट होते हैं. तो ऐसी संस्था की समाज में एक बहुत इज्जत मतलब मान्यता एक बन जाती है. यहां इसका फायदा उठाया जाता है और इनके जलूसों से इनके इजतमों से और इनकी गैदरिंग से जेहाद के लिए आगे लड़के तैयार किए जाते हैं.

 

लश्कर ए तैयबा में दो तरह के लोग शामिल किए जाते हैं. पहले वो लोग हैं जो बेहद पढ़े लिखे होते हैं और ऊंची नौकरियों और सरकारी ओहदे वाले होते हैं ये लोग साजिश रचने और लश्कर के लिए आंतकवादी मिशन तैयार करने का काम करते हैं लेकिन लश्कर के ज्यादातर आतंकी गरीब बैकग्राउंड से आते हैं जो अपनी फैमिली प्रॉबल्म और दूसरी सामाजिक परेशानियों के चलते लश्कर जैसे आतंकी संगठन के चंगुल में फंस जाते हैं.

 

जम्मू के उधमपुर जिले से जिंदा पकड़े गए आतंकवादी नवेद ने बताया है कि वो बशर नाम के एक स्थानीय मौलवी के जरिए पहली बार आंतकवादी संगठन लश्कर ए तैयबा के संपर्क में आया था. खास बात ये है कि लश्कर ए तैयबा से ज्यादातर लोग किसी मजहबी गतिविधी के जरिए ही जुड़ते हैं. मजहबी जलसों, इजतिमों और रैलियों में लश्कर के ट्रेनर और स्पाटर उन नौजवान लड़कों को चुनने का काम करते हैं जो आगे जेहादी गतिविधियों में हिस्सा ले सके. लश्कर के स्पाटर के जरिए चुने गए लड़कों को सबसे पहले 21 दिनों के जेहादी कोर्स के लिए जमात उद दावा में भेजा जाता है और जेहाद की इस पहली ट्रेनिंग को दौरा ए आम कहा जाता है.

 

दरअसल आतंकवादी संगठन लश्कर ए तैयबा की ट्रेनिंग में किसी आम लड़के के खूंखार आतंकवादी में तब्दील होने के चार अहम चरण होते हैं. सबसे पहले मजहबी गतिविधियों के जरिए लड़कों को चुना जाता है और फिर जेहाद के नाम पर उनका ब्रेनवाश किया जाता है. इसके बाद चुने गए लड़कों को 21 दिनों की दौरा – ए- आम की ट्रेनिंग दी जाती है. इस ट्रेनिंग के बाद तीसरे चरण की दौरा – ए – खास की ट्रेनिंग होती है और फिर सबसे आखिरी में आतंकवादियों को आत्मघाती या फिदायीन बनने की कड़ी ट्रेनिंग दी जाती है. जेहाद के नाम पर फैलाया गया आतंकवाद का ये शिगूफा और जेहाद के नाम पर होने वाले ये फिदायीन हमले भला क्या बला होती है इस बात की गहराई में भी हम उतरेंगे आगे और साथ ही आपको बताएंगे फिदायीन का पूरा इतिहास लेकिन उससे पहले देख लीजिए कैसे लश्कर ए तैयबा के ट्रेनिंग कैंपों में आंतकवादी बनता है कोई नवेद तो कोई अजमल आमिर कसाब. 

 

वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण स्वामी बताते हैं कि लश्कर के ट्रेनर है या जो स्पॉटर हैं वो चुनते हैं उन लड़कों को जो लगता है आगे जिहादी एक्टिविटी में पार्टिशिपेट कर पाए तो शुरू शुरु में जब ये लड़के चुने जाते हैं तो 21 दिन के कोर्स के लिए जाते हैं जिसको दौरा आम कहते हैं. आम दौरा सीधी बात है उस दौरा आम में थोड़ी बहुत हथियारों की ट्रेनिंग होती है लेकिन कोई ऐसी बहुत बड़ी ट्रेनिंग नहीं होती है फिजिकल फिटनेस पर ज्यादा जोर दिया जाता है और देखते हैं कि किसका कंडिशन ठीक है और किसका नहीं हैं?

 

दिल्ली पुलिस के पूर्व डीसीपी (स्पेशल सेल) एल एन राव ने बताया कि जो उग्रवादी का साइकोलॉजी है वो इस प्रकार से इनको ट्रेंड किया जाता है. खासतौर से उनको हाईली मोटीवेशन लेवल उनका बड़ा हाई कर दिया जाता है ट्रेनिंग के दौरान और जो उनके हैडंलर होते है वो उनको बार बार ऐसी चीजों को बताते है कि तुम सब इसके लिए कर रहे हो. आप उसको खुदा के पास जाओगे और इसमें अपने इमान के लिए कर रहे हो और साथ साथ उनको ट्रेनिंग के साथ साथ उनको लालच भी देते हैं कि आपको ये पैसा भी मिलेगा और इस प्रकार से वो हाईली मोटीवेट हो जोते है और इतने डिटरमाइंड होते हैं वो कि वो मरने के लिए भी त्यार होते हैं. सुसाइडल अटैक भी कर सकते हैं वो अपने आपको और सुसाइड भी करवा सकते हैं.

 

लश्कर ए तैयबा की ट्रेनिंग में दौरा ए आम के बाद तीन से छह महीने की लंबी ट्रेनिंग का एक दूसरा सिलसिला चलता है जिसे दौरा ए खास कहा जाता है. इस ट्रेनिंग में कई तरह के कोर्स शामिए किए जाते हैं. दौरा –ए- खास के दौरान आतंकवादियों को एक तरह की मिलिट्री ट्रेनिंग दी जाती है. जिसमें उन्हें बंदूक और तमाम तरह के आर्म्स चलाने से लेकर विस्फोट पदार्थ इस्तेमाल करने के तरीके सिखाए जाते हैं. दौरा ए खास की ट्रेनिंग के दौरान आतंकवादियों को कई तरह की विशेषज्ञता वाले कोर्स भी कराए जाते हैं. जैसे मुंबई पर लश्कर ए तैयबा के जिन आतंकवादियों ने हमला किया था उनको स्वीमिंग करने के साथ- साथ नाव चलाने की ट्रेनिंग भी अलग से दी गई थी. यहीं नहीं मुंबई के 26-11 के हमलों में शामिल रहे आतंकवादी डेविड कोलमन हेडली को खुफिया जानकारियां जुटाने की ट्रेनिंग भी दी गई थी. जाहिर है एक मिलट्री ट्रेनिंग के सारे आयाम लश्कर ए तैयबा के सारे कोर्सों में मौजूद रहते हैं. खास बात ये है कि ये सारी ट्रेनिंग पाकिस्तान आर्मी के रिटायर्ड सैनिकों द्वारा दी जाती है और लश्कर ए तैयबा में दौरा ए खास की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद ये माना जाता है कि आतंकवादी की बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग पूरी हो गई है. जिंदा पकड़े गए आतंकवादी नवेद के बारे में खुलासा हुआ है कि उसने लश्कर ए तैयबा के ट्रेनिंग कैंम्पों में दौरा ए खास की ट्रेनिंग पूरी की थी. आतंकवादी नवेद को ट्रेनिंग के दौरान ए के 47, ए के 56 राइफलों के अलावा ग्रेनेड और आईईडी चलाना भी सिखाया गया था. नवेद को ये सारी ट्रेनिंग पाकिस्तान के जंगलों में दी गई थी और उसने कश्मीर में भी 45 दिन रहने के दौरान अपना ज्यादातर वक्त लश्कर के आतंकियों के साथ जंगलो में ही बिताया था.

 

दिल्ली पुलिस के पूर्व डीसीपी स्पेशल सेल एल एन राव बताते हैं कि जब मै स्पेशल सेल में था तब बहुत से हमनें उग्रवादी पकड़े थे उनकी इनटेरोगेशन से पता लगा था कि उनकी ट्रेनिंग जहां भी ट्रेनिंग सेंटर है वहां पर अलग अलग स्ट्रैजी की ट्रेनिंग होती है एक दस दिन कि ट्रेनिंग है तो फिर 15 दिन की फिर महीने की और उसमें ट्रेनिंग में उनको दिखाते है सिखाते हैं कि कैसे बम बनाना है कैसे हथियार चलाना है उनको ट्रेनिंग ऐसे दी जाती है और उनको बकायदा जैसे हम पुलिस फोर्स को ट्रेनिंग देते है ऐसे उनके ट्रेनिंग सेंटर बने होते हैं जैसा उन्होनें बताया और उस प्रकार से जब वो वेल ट्रैनड हो जाते हैं उसके बाद उन्हें लेक्चर देते है और मोटीवेशनल स्पीच और मोटीवेशनल उनको कैसेट वीडियो कैसेट और वो इतना दिखाते है और उनको दिखाते है कि उनकी कौम के साथ बहुत बड़ा अन्याय हो रहा है इस प्रकार से जब वो देखते है तो अपने आप को समझते है कि हम क्यों ना अपने कौम के लिए कुछ करे तो इसलिए उनका मोटीवेशन लेवल बहुत बड़ा हो जाता है.

 

आंतकी संगठन लश्कर ए तैयबा में दौरा-ए-आम और दौरा-ए-खास के बाद चौथी और सबसे अहम ट्रेनिंग फिदायीन हमले करने के लिए दी जाती है. फिदायीन की ये ट्रेनिंग सबसे खास होती है इसीलिए इसमें उन्हीं कुछ चुनिंदा और मानसिक तौर पर बेहद मजबूत लडकों को शामिल किया जाता है जो संगठन की पहली दो ट्रेनिंग में सबसे बढ़िया कैडेट बनकर निकलते हैं. आम आतंकवादियों से अलग फिदायीन आतंकवादी वो होते हैं जो किसी फौजी कैंप या किसी ऐसी अहम जगहों पर आत्मघाती हमला करते हैं जहां सुरक्षा व्यवस्था सबसे ज्यादा होती है. वीवीआईपी कॉम्पलेक्स, इमारतों या किसी वीआईपी के घर पर आतंकवादी हमले को भी फिदायीन हमला कहा जाता है. दरअसल आंतकवादी जानते बूझते हुए ऐसी जगहों को अपना निशाना बनाते हैं जहां उन्हें सुरक्षा बलों या सेना से सीधे भिड़ना होता है. जाहिर है ऐसे हमलों में आतंकवादियों का बच कर निकलना नामुमकिन सा होता है और यही वजह है कि इस तरह के आतंकवादी हमलों को फिदायीन या आत्माघाती हमला कहा जाता है और इस तरह के फिदायीन हमले अक्सर जम्मू कश्मीर में होते रहे हैं. दिल्ली में संसद भवन पर हुआ आतंकवादी हमला भी फिदायीन हमला माना जाता है.

 

दिल्ली पुलिस के पूर्व डीसीपी स्पेशल सेल एल एन राव बताते हैं कि हर आतंकवादी फिदायीन नहीं होता. लेकिन हर फिदायीन आतंकवादी जरुर होता है. फिदायीन को मतलब है सुसाइडल उसकी टेडंनसी है. जब वो अपने आप को मरने के लिए तैयार रहता है तो वो ये चाहता है कि मैं ऐसा कुछ काम कर जाऊं जो की असंभव लगे क्योंकि आदमी जो सुसाइड करना चाहे तो वो कुछ भी कर सकता है. कोई वीआईपी को मारना है तो उसको पता है कि मुझे मरना है तो कुछ भी किसी हद तक जाके जैसे  जा रहा है किसी वीआईपी का उसके आगे गिर जाएगा बम लेके तो वो बम ब्लास्ट हो जाएगा तो वो खुद मर रहा है लेकिन अलटीमेट उसका ओबजेक्ट है की वो इतना बड़ा आतंकी अटैक कर सकता है तो वो फिदायीन होता है जो सुसाइडल करने के लिए त्यार रहता है. उग्रवादी तो आम उग्रवादी होते हैं. उन उग्रवादी में से जो हाई लेवल के मोटीवेटिड आदमी होते हैं वो फिदायीन हो जाते हैं. ये वो पैसों की लालच में भी करते हैं, धर्म की आड़ में भी उनको मोटीवेट किया जाता है और इस प्रकार से वो बहुत ज्यादा हाई लेवल के ट्रेनिंग देने के बाद में और जो उग्रवादियों में जो हाई लेवल के मोटीवेटिड आदमी तो वो फिदायीन बनते हैं.

 

फिदायीन या आत्मघाती हमलावरों के बारे में सबसे अहम बात ये है कि फिदायीन हमलों की शुरुआत आतंकवादी संगठनों ने नहीं की है बल्कि फिदायीन हमलों का इतिहास सैकड़ों बरस पुराना रहा है. फिदायीन के इस इतिहास के बारे में भी हम आपको बताएंगे आगे लेकिन उससे पहले देखिए आतंकवादी संगठन लश्कर ए तैयबा के ट्रेनिंग कैम्पों में किस तरह आतंकवाद की ट्रेनिंग दी जाती है.

 

पीओके यानी पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वाह इलाके में आतंकवादी संगठनों ने अपने कई ट्रेनिंग कैंप बना रखे हैं. लश्कर ए तैयबा का मुख्यालय जमात उद दावा तो लाहौर के पास मुरीदके नाम की जगह पर है लेकिन उसका सबसे अहम और बड़ा ट्रेनिंग कैंप मनशेहरा नाम की जगह पर है. जिंदा पकड़े गए आतंकवादी नवेद ने भी मनशेहरा के कैंप में ही आतंकवाद फैलाने की ट्रेनिंग पूरी की थी.

 

पाकिस्तान में लाहौर के पास मुरीदके से लेकर मनशेहरा और नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस तक लश्कर ए तैयबा की आतंक की फैक्ट्री का जाल फैला हुआ है. इस आतंकवादी सगंठन ने पाकिस्तान के कबाईली इलाकों और भारत- पाकिस्तान की लाइन आफ कंट्रोल के करीब तक अपने ट्रेनिंग कैंप बना रखे हैं. लश्कर तैयबा के ये ट्रेनिंग कैंप दो तरह के होते हैं. पहले कैंप में आंतकवादियों को हथियार चलाना सिखाया जाता है इसीलिए इन्हें ट्रेनिंग कैंम्प कहा जाता है और दूसरी तरह के कैम्पों को लॉन्चिंग कैम्प कहा जाता है. क्योंकि इन कैम्पों से ही आतंकवादियों की भारतीय सीमा में घुसपैठ कराई जाती है.

 

वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण स्वामी बताते हैं कि अगर इनके कैंपो में आप देखेंगे जब हम कैंप कहते है तो सोचते है कि कोई बहुत बड़ा ये और बिल्डिंग होगी ऐसा कुछ नहीं है और ज्यादातर इनकी ट्रेनिंग खुले मैदान में होती है मंशेहरा जैसे एनडब्लूएफपी जो इनका बड़ा मरकस्त टाइप का ट्रेनिंग कैंप है वहां अगर देखेंगे तो बगल में पहाड़ है जंगली इलाका है लेकिन एक्चुअली किसी की काबिलियत देखने के लिए आइडल ट्रेनिंग है कि लड़कों को फिर जाना है कश्मीर के जंगलों में और फिर लड़ना है तो फिर उस तरह का ही ट्रेन खोजा गया है. और उस तरीके का माहौल खोजा गया है जहां इनकी ट्रेनिंग की जाती है.

 

जम्मू- कश्मीर के ऐसे पहाड़ी और जंगली इलाकों में लश्कर ए तैयबा आतंकवादियों को लड़ने के लिए तैयार करता रहा है. यही वजह है कि पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर आंतकवादियों की सैरगाह बन चुका है. पीओके में ही मौजूद हैं लश्कर ए तैयबा के वो लॉन्चिंग कैंप भी जहां से निकल कर आतंकवादी भारतीय सीमा में घुसपैठ करते हैं और उनके इस नापाक काम में पाकिस्तान की फौज भी खुलकर मदद करती रही है. सैकड़ों किलोमीटर में फैली हुई भारत और पाकिस्तान के बीच लाइन ऑफ कंट्रोल को ही पार कर आंतकवादी नवेद और उसके तीन साथियों ने कुछ दिनों पहले भारत में घुसपैठ की है. आखिर आतंकवादी किस तरह भारतीय सीमा में घुसपैठ करने में कामयाब होते हैं ये बात भी हम आपको विस्तार से बताएंगे लेकिन उससे पहले जान लीजिए फिदायीन यानी आत्मघाती हमलों का ये इतिहास.

 

वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण स्वामी बताते हैं कि इसके इतिहास में बहुत पुराने रूप हैं शुरू शुरू के जो फिदायिन होते थे वो एक छोटे से रीलिजस ग्रुप के साथ थे जो बगदाद के खलिफा के खिलाफ लड़ रहे थे और वो अपने आप को फिदायिन इसलिए कहते थे कि क्योंकि वो कहते थे कि वो सिर्फ अल्लाह से फिदा हैं या फिर अल्लाह से जुड़े हुए हैं उनको जान का कोई प्यार नहीं है तो वो जाकर खुले दरबार में बगदाद के कालिफ के जो बड़े नेता या जो लोग थे उनतो जाकर छुरी से मारते थे औऱ फिर अपने आप को पकड़ने देते थे इनका खुद का जो स्पेक्टेकल था कि देखे सबके सामने कट रहें हैं सारे गार्डों के सामने जा पाए हैं वो एक थिरेटिकल स्पेक्टेकल था बहुत मतलब सदियों से ऐसे अटैक रहें हैं इस्लामी इतिहास में कोई नई बात नहीं है फिलिस्तिन लेबरर आर्गेनाइजेशन के जो अटैकर थे वो भी अपने आप को फिदायिन कहते थे तो आईडिया ये था दिखाना कि चाहे हम 3-4 लोग ही हों फिर भी हम बहुत बड़ा नुकसान दूसरे पक्ष को पहुंचा सकते हैं.

 

भारत – पाकिस्तान की एलओसी यानी लाइन ऑफ कंट्रोल पर आतंकवादियों की घुसपैठ भारत के लिए सबसे बडा सिरदर्द बनी हुई है. दरअसल आतंकवादी संगठन भारतीय फौज के हमले के डर से अपने ट्रेनिंग कैंप बॉर्डर से काफी अंदर की तरफ बनाते हैं. पाकिस्तान के मुजफ्फराबाद के पास भी कई जेहादी गुटों ने अपने ट्रेनिंग कैंप बना रखे हैं. इन ट्रेनिंग कैंपों में आतंकवाद फैलाने की ट्रेनिंग देने के बाद तैयार लड़कें बॉर्डर के पास लाए जाते है जहां इन्हें लॉन्चिंग कैंप में रखा जाता है. लश्कर ए तैयबा जैसे आतंकवादी संगठनों ने अपने लॉन्चिंग कैंप भारत – पाक बॉर्डर के किनारे बना रखे हैं.

 

वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण स्वामी बताते हैं कि लांचिग कैंप कुछ नहीं होता वहां कोई गुज्जर का या बकरवाल का डेरा होता है. या डोक होता है. या गांव में कोई छोटा सा घर होता है. जहां इनको बैठाया जाता है और फिर वहां से इनको बार्डर पार कराया जाता३ है. पाकिस्तानी फौज की मदद के साथ क्योकि पाकिस्तान फौज को भी पता रहता है कि आगे कहां भारतीय फौज की भी वीकनेस है. या कहां से रास्ता निकल जाता है.

 

पाकिस्तान की जमीन पर आतंकवाद की ट्रेनिंग लेने वाले लड़कों का पहला इम्तिहान बॉर्डर पर ही होता है. क्योंकि बॉर्डर पर भारत और पाकिस्तान की सेनाएं चौबीसों घंटे चौकन्ना रहती है ऐसे हालात में घुसपैठ करना आसान काम नहीं है. पहले के दौर में आतंकवादियों को ऐसे गाइड सीमा पार करने में मदद करते थे जिनकों बॉर्डर पर मौजूद नालों और रास्तों की बारीक जानकारी होती थी लेकिन अब जीपीएस तकनीक के जमाने में आतंकियों के लिए घुसपैठ करने का काम पहले से ज्यादा आसान हो गया है. आतंकी संगठन घुसपैठ करने वाले अपने लड़कों को जीपीएस सेट देते हैं जिसमें रास्ते के प्वाइंट मार्क होते हैं जीपीएस पर रास्ता देखते – देखते ही आतंकवादी सीमा पार कर जम्मू – कश्मीर के इलाकों में दूर – दूर तक निकल आते हैं और एक बार नक्शा बनने के बाद फिर वो आगे दूसरे आतंकवादियों को दे दिया जाता है. जिंदा पकड़े गए आतंकवादी नवेद ने भी जीपीएस के सहारे ही कश्मीर में घुसपैठ की थी.

 

आतंकवादी नवेद ने भारतीय सीमा में घुसपैठ तो जीपीएस के सहारे की थी लेकिन उसे कश्मीर के सीमाई इलाके से जम्मू के उधमपुर तक पहुंचाने में लश्कर ए तैयबा के हैडलर ने अहम भूमिका निभाई थी. दरअसल जब आतंकवादी सीमा पार कर जाते है तब भारतीय जमीन पर किसी सुरक्षित इलाके में लश्कर का कोई स्थानीय आदमी उनका इंताजर करता है जिसे उस आतंकवादी का हैंडलर कहा जाता है. ये हैंडलर ही घुसपैठ करने वाले आतंकवादी को आगे अंदर की तरफ ले जाता है और हर तरह से उसकी मदद भी करता है. आतंकवादी के रुकने, खाने- पीने, छिपने का इंतजाम भी हैंडलर ही करता है. यही नहीं आतंकवादी के लिए साधन जुटाना और उसे पैसे मुहैया कराने का काम भी हैंडलर ही करता है. क्योकि जब आतंकवादी सीमा पार करते हैं तो वो अपने पास जीपीएस सेट, असलहे और हथियार के सिवाए कोई दूसरा सामान नहीं रखते हैं. वो अपने कपड़ों और सामान से उन सारी चीजों को भी अलग कर देते हैं जिनसे पाकिस्तान का कोई कनेक्शन रहता है. ताकि पकड़े जाने पर इस बात का कोई सबूत ना रहे कि वो पाकिस्तान से आए हैं. यहां सबसे खास बात ये है कि आतंकवादियो की घुसपैठ के इस काम में सबसे बड़ी मदद पाकिस्तान की फौज ही करती है.

 

वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण स्वामी बताते हैं कि इतने बड़े बार्डर पर हर वक्त चौबीस घंटे उतनी ही विजिलेंस नहीं रह सकती. तो पाकिस्तानी फौज को भी जानकारी रहती है कि हमारी तारबंदी कहां कच्ची है. या तारबंदी कहां गिरी हुई है. फौज की किस जगह डिपलायमेंट ज्यादा है किस जगह कम है. तो एक तो ये इंफोर्मेशन ये जानकारी उनको दे दी जाती है. दूसरी बात ये है कि कई बार जब फायरिंग चल रही होती है तो दोनों फौजों के आड़ ले लेती हैं. और जब आड़ ले लेते हैं फायरिंग से बचने के लिए तो आना जाना घुसपैठ के लिए आसान हो जाता है. तो कभी कभी फायरिंग की जाती है ताकि इसकी आड़ में घुसपैठ निकल पाए. और तीसरी मदद ये होती है कि आगे की इनकी जो पोजीशन है. पाकिस्तान फौज इनको वहां आराम से बैठने देती है. जबकि इनको पूरी तरह पता है कि ये लांचिग कैंप है.

 

जम्मू कश्मीर के रिहाईशी इलाकों तक घुस आए आतंकियों की सबसे बड़ी मदद वो स्थानीय लोग या हैंडलर करते हैं जिन्हें या तो आतंकी संगठन पैसो की ताकत से खऱीद लेते हैं या फिर वो लश्कर जैसे आतंकी संगठनों की जेहादी विचारधारा से प्रभावित होकर आतंकवादियों की मदद करते हैं. दरअसल एक बार जब आतंकवादी जीपीएस की मदद से कश्मीर में पहुंच जाते हैं तब यहां स्थानीय लोगों की मदद के बिना उनका काम करना मुश्किल हो जाता हैं. क्योंकि किसी खास जगह पर कैसे और किस रास्ते से पहुंचना है ये बात उन्हें स्थानीय आदमी ही बताते हैं. स्थानीय लोगों यानी हैंडलर की मदद से ही आतंकवादियों के रुकने और छिपने का इतंजाम भी किया जाता है. जिंदा पकड़े गए आतंकवादी नवेद के हैंडलर ने भी उसे ना सिर्फ एक घर में छिपाया बल्कि उसको खर्च करने के लिए पैसे दिए और एक लोकल आदमी के ट्रक में बैठा कर हाइवे से उसे जम्मू के पास उधमपुर तक पहुंचने में मदद भी की थी. जाहिर है किसी आतंकवादी के लिए अपने काम को अंजाम देना किसी हैंडलर के बिना नामुमकिन हैं.  

 

दिल्ली पुलिस के पूर्व डीसीपी स्पेशल सेल एल एन राव बताते हैं कि एक होता है हैडंलर एक होता है ओ.जी.डब्ल्यु- ओवर ग्राऊड वर्कर. ओवर ग्राऊड वर्कर है जो जिस जगह पर उसको भेजते हैं उसको उसको कॉनटेक्ट दिया जाता है कि आप यहां पर जाओगे ये आदमी मिलेगा तुम्हें वो आपको पूरी फैसीलिटी देगा रहने की फैसीलिटी देगा ट्रांसपोर्ट की देगा, आपको कम्यूनिकेशन के साधन देगा. उसके साथ साथ आपको उस ऐरिआ की रेकी कराएगा. एक होता है हैडंलर, इंडिया में भी हो सकता है उसका हैडंलर और बाहर जहां से वो ट्रेनिंग करके आता है वो वहां भी एक. हैडंलर बेसिक्ली उस आतंकी संगठन का एक बहुत बड़ा मुखिया कहिए या उसके मुखिया के नीचे डिप्टी होते हैं या वो कहिए.

 

भारत के लिए पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी संगठन आज सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं. आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा पाकिस्तान ही नहीं बल्कि भारत, मालदीव, बांग्लादेश और बर्मा जैसे तमाम मुल्कों में मजबूती से अपनी जड़े जमा चुका है. लश्कर के राजनीतिक विंग जमात उद दावा ने सामाजिक कामों के बूते पाकिस्तान में भी एक ऐसी अहमियत हासिल करा दी है जिस वजह से पाकिस्तान सरकार भी उस पर हाथ डालने से कतराती है. यही वजह है कि जेहाद यानी धर्मयुद्ध के नाम पर नौजवानों को भड़का कर आतंकवाद की भट्टी में झोकने वाले लश्कर के चीफ हाफिज सईद ने फिदायीन नाम का एक ऐसा जख्म भारत को दिया है जो आज एक नासूर बन चुका है. लश्कर के वो फिदायीन जिनका आखिरी खत भी खुद लश्कर के खिलाफ बन चुका है अहम सबूत.

 

वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण स्वामी बताते हैं कि अगल अलग ग्रुप के लिए अगल अलग रिवाज है. ज्यादातर ये अपनी फैमिली के लिए खत या वीडियो बनाकर छोड़ते हैं. ये समझाते हुए कि ऐसा कोई अमल या एक्शन करने जा रहे हैं. जिसमें उनके वापस आने की संभावना कम ही है. जिन तंजीमों में माना जाता है कि अल्लाह के फिदायीन जब मारे जाते हैं तो जब वो जन्नत में जाते हैं उपर तो वहां हूरे उनका इंताजर करेंगी. तो आप देखेंगे कि कई सारे अपने जाने से पहले शेव भी करते हैं. इत्र पहन लेते हैं. अच्छे एक बार नहा लेते हैं. एक आखिरी बार नमाज पढेंगे जाने से पहले जिसमें वो कहेंगे कि वो ऐसा करने जा रहे हैं औऱ जो पिछली जिंदगी में उन्होंने गलतियां की है उसके लिए माफी चाहेंगे. तो ये इनके आखिरी पल होते हैं. कई तंजीमों में वीडियो छोड़ते हैं. ये रिवाज लश्कर तैयबा में देखा नहीं गया है और शायद इसकी वजह ये हो सकती है कि ये भी एक सबूत रहेगा जो पाकिस्तान से इसको जोड़ सकता है वो ऐसे सबूत चाहते नहीं है इसलिए ऐसे खत लिखते हैं.

 

जम्मू कश्मीर से लेकर मुंबई और देश की राजधानी दिल्ली तक लश्कर ए तैयबा के आतंकवादी हमले पाकिस्तान को कटघरे में खड़ा करते रहे हैं. आतंकी अजमल आमिर कसाब के बाद अब नवेद का जिंदा पकड़ा जाना भी पाकिस्तान के आतंकवाद विरोधी होने के दावों की पोल खोल रहा है क्योकि नवेद ने ये राज भी खोला है कि उसने करीब दो सौ आतंकवादियों के साथ पाकिस्तान के कैंपों में ट्रेनिंग ली है. जाहिर है लश्कर ए तैयबा सीमा पार आतंकियों की एक पूरी फौज खड़ी करने में जुटा है. जेहाद के नाम पर वो भारत के खिलाफ लगातार साजिशों के नए कुचक्र रचने में लगा हुआ है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत के सामने अब आतंकवादियों के गढ़ में घुसकर ही उनका सफाया करने का रास्ता बचा है.

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