कप्तान के रूप में टूट चुके थे तेंदुलकर, संन्यास लेना चाहते थे: आत्मकथा

By: | Last Updated: Sunday, 2 November 2014 6:52 AM
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नई दिल्ली: सचिन तेंदुलकर को भले ही ‘क्रिकेट का भगवान’ माना जाता हो लेकिन उनके बेजोड़ करियर में भी एक ऐसा दौर आया था जब यह महान खिलाड़ी अपनी कप्तानी में टीम की असफलता से इतना ‘डर’ गया था और ‘टूट’ चुका था कि वह पूरी तरह से खेल से दूर होना चाहता था.

 

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में ढेरों रिकार्ड बनाने के बाद पिछले साल खेल को अलविदा कहने वाले पूर्व बल्लेबाज तेंदुलकर ने दो दशक से अधिक के अपने करियर के अहम लम्हों को उजागर किया है जिसमें उनका बुरा दौर भी शामिल है.

 

दुनियाभर में छह नवंबर तेंदुलकर की आत्मकथा ‘प्लेइंग इट माई वे’ का विमोचन होना है जिसमें इस महान बल्लेबाज ने कप्तान के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान की हताशा का भी जिक्र किया है.

 

तेंदुलकर की किताब के एक्सक्लूसिव मुख्य अंश ‘पीटीआई भाषा’ के पास उपलब्ध हैं जिनके अनुसार, ‘‘मुझे हार से नफरत है और टीम के कप्तान के रूप में मैं लगातार खराब प्रदर्शन के लिए खुद को जिम्मेदार मानता था. इससे भी अधिक चिंता की बात यह थी कि मुझे नहीं पता था कि इससे कैसे उबरा जाए क्योंकि मैं पहले ही अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रहा था.’’

उन्होंने कहा, ‘‘मैंने अंजलि :तेंदुलकर की पत्नी: से कहा कि मुझे डर है कि मैं लगातार हार से उबरने के लिए शायद कुछ नहीं कर सकता. लगातार करीबी मैच हारने से मैं काफी डर गया था. मैंने अपना सब कुछ झोंक दिया और मुझे भरोसा नहीं था कि क्या मैं 0 . 1 प्रतिश्त भी और दे सकता हूं.’’

 

जाने माने खेल पत्रकार और इतिहासविद बोरिया मजूमदार के सह लेखन वाली इस आत्मकथा में तेंदुलकर ने खुलासा किया, ‘‘इससे मुझे काफी पीड़ा पहुंच रही थी और इन हार से निपटने में मुझे लंबा समय लगा. मैं पूरी तरह से खेल से दूर होने पर विचार करने लगा था क्योंकि ऐसा लग रहा था कि कुछ भी मेरे पक्ष में नहीं हो रहा था.’’

 

तेंदुलकर का यह बुरा दौर 1997 के समय का है जब भारतीय टीम वेस्टइंडीज का दौरा कर रही थी. पहले दो टेस्ट ड्रा कराने के बाद भारतीय टीम तीसरे में जीत की ओर बढ़ रही थी और उसे सिर्फ 120 रन का लक्ष्य हासिल करना था. लेकिन भारतीय टीम सिर्फ 81 रन पर ढेर हो गई जिसमें सिर्फ वीवीएस लक्ष्मण ही दोहरे अंक में पहुंच पाए.

 

तेंदुलकर ने कहा, ‘‘सोमवार, 31 मार्च 1997 भारतीय क्रिकेट के इतिहास का काला दिन था और निश्चित तौर पर मेरे कप्तानी करियर का सबसे खराब दिन था. इससे एक दिन पहले रात को सेंट लारेंस गैप में एक रेस्टोरेंट में डिनर के दौरान मुझे याद है कि मैंने वेटर से मजाक किया कि कौन वेस्टइंडीज की जीत की भविष्यवाणी कर रहा है. उसे विश्वास था कि अगली सुबह एंब्रोस भारत को ध्वस्त कर देगा. ’’

 

उन्होंने कहा, ‘‘इस मैच की पहली पारी में फ्रेंकलिन रोज ने मुझे बाउंसर की थी और मैंने पुल करते हुए छक्का जड़ा था. मैंने वेटर को वह शाट याद दिलाया और मजाक में कहा कि अगर एंब्रोस मुझे बाउंसर फंेकने की कोशिश करेगा तो मैं गेंद को मारकर एंटीगा पहुंचा दूंगा.’’

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