सचिन ने खोले सफलता के राज

By: | Last Updated: Friday, 21 August 2015 4:03 PM
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चेन्नई: महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर ने एमआरएफ पेस फाउंडेशन के ट्रेनी खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के विभिन्न पहलुओं से अवगत कराते हुए कहा कि कड़ी मेहनत और प्रतिबद्धता कड़ी और प्रतिस्पर्धी दुनिया में सफलता की कुंजी हैं.

 

तेंदुलकर ने यहां एमआरएफ पेस फाउंडेशन के दौरे के दौरान कहा, ‘‘मुझे उनके साथ बात करने का मौका मिला. मुझसे कुछ सवाल पूछे गए. अपने अनुभव युवाओं के साथ बांटने के मौके से मुझे काफी संतुष्टि मिलती है. मैंने उन्हें बताया कि उन्हें समझना चाहिए कि असल में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट क्या है. समय के साथ खेल और ज्यादा कड़ा और प्रतिस्पर्धी होता जा रहा है.’’

 

अपना उदहारण देते हुए तेंदुलकर ने कहा, ‘‘अगर आपको भारत के लिए खेलना है तो यह आसान नहीं है. भारत के लिए खेलने का जज्बा और इच्छा मेरे अंदर काफी अधिक था. मैं क्रिकेट से बेइंतहा प्यार करता था और अब भी क्रिकेट से बेइंतहा प्यार करता हूं. मैं घंटों तक काम करता था और कुछ भी चीज मुझे थका नहीं पाती थी. मेरे कोच को मुझे नेट से खींचकर ले जाना पड़ता था.’’

 

उन्होंने कहा, ‘‘कई मौकों पर काफी अंधेरा हो जाता था और अंधेरे में हम एक दूसरे के चेहरे बामुश्किल देख पाते थे. आपको पता नहीं चलता था कि गेंद का टप्पा कहां पड़ रहा है. लेकिन मैं नेट पर बल्लेबाजी करता था. सही मार्गदर्शन और सहायता करने वाली सही टीम के साथ इस तरह की चीजों की जरूरत पड़ती है. ’’

 

एमआरएफ पेस फाउंडेशन को 27 साल पूरे करने के लिए बधाई देते हुए तेंदुलकर ने कहा कि इस प्रतिष्ठित अकादमी की अगुआई करने के लिए ग्लेन मैकग्रा शानदार पसंद हैं. उन्होंने कहा, ‘‘मैं 27 साल तक प्रतिबद्धता दिखाने के लिए एमआरएफ पेस फाउंडेशन को बधाई देता हूं. 27 साल काफी समय होता है. योजना और विजन होना अलग चीज है लेकिन इसके लिए प्रतिबद्ध रहना अलग चीज है. मुझे लगता है कि यह शानदार है.’’

 

तेंदुलकर ने कहा, ‘‘सही व्यक्ति खोजने के लिए योजना और इसे अमलीजामा पहनाने पर काफी समय खर्च होता है. डेनिस लिली के रूप में पहली पसंद बेजोड़ थी. उनकी जगह ग्लेन मैकग्रा का लेना शानदार है. इन दोनों गेंदबाजों ने विश्व क्रिकेट के लिए शानदार काम किया है. ये पूरी दुनिया में हीरो थे.’’

 

इस पूर्व भारतीय कप्तान ने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि ग्लेन ऐसा व्यक्ति है तो काफी एकाग्र, आक्रामक, अनुशासित है और अपनी योजनाओं पर डटा रहता है. मुझे 1999 में एडिलेड का मैच याद है. मैं दूसरे दिन चाय के बाद बल्लेबाजी करने आया और मैंने ग्लेन के छह ओवर मेडन खेले. उसने ऑफ स्टंप पर गेंदबाजी जारी रखी और मैं इसे छोड़ता रहा. मैं चाहता था कि वह शरीर के करीब गेंदबाजी करे. उसने मेरे करीब गेंदबाजी नहीं की और मैं गेंद के करीब नहीं गया. हम दोनों अपनी योजनाओं पर टिके रहे.’’

 

तेज गेंदबाज बनने के इरादे के साथ पहली बार 1987 में अकादमी आए तेंदुलकर ने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि अच्छा गेंदबाज बल्लेबाज को खेलने के लिए बाध्य करता है.’’

 

अकादमी के दौरे के बारे में पूछने पर तेंदुलकर ने बताया कि कैसे उनके भाई (अजित तेंदुलकर) की बल्लेबाजी का सामान साथ ले जाने की सलाह ने उनका भाग्य बदल दिया. तेंदुलकर ने कहा, ‘‘मेरे भाई मुझे हमेशा कहते थे कि मुझे ऑलराउंडर बनना चाहिए. मुझे तेज गेंदबाजी करना पसंद था. जब मैं अपना बैग पैक कर रहा था तब मेरे भाई ने कहा कि बल्लेबाजी का सामना भी साथ रख लो. मैं अपना बल्लेबाजी का सामान भी लेकर आया. ट्रायल की घोषणा हुई और नंबर दिए गए. मुझे नंबर याद नहीं लेकिन मैंने कुछ मौकों पर गेंदबाजी की और मैं वहां खड़ा था.’’

 

उन्होंने कहा, ‘‘मेरे साथ खड़े वासु परांजपे ने मुझे इन्हीं गेंदबाजों के खिलाफ बल्लेबाजी करने को कहा. मैंने कहा बहुत अच्छा विचार है. मैंने पैड पहने और बल्लेबाजी शुरू कर दी. डेनिस मुझे बल्लेबाजी करते हुए देख रहे थे. इसके बाद डेनिस मेरे पास आए और बोले- मेरे दोस्त यह बेहतर विकल्प है, तुम बल्लेबाजी क्यों नहीं करते.’’

 

तेंदुलकर ने कहा, ‘‘मैंने उन्हें कह ही दिया था कि मैं बल्लेबाज हूं जो तेज गेंदबाज बनना चाहता है. लेकिन मैं कह सकता हूं कि मेरे भाई का विजन मुझसे बेहतर था. चेन्नई जाने से पहले उन्होंने मुझे बल्लेबाजी का सामान ले जाने का सुझाव दिया था. मुझे तेज गेंदबाजी पसंद थी.’’

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