Happy B'Day Dada: 'मेरा नाम है दादा भूले तो नहीं...'

By: | Last Updated: Wednesday, 8 July 2015 4:24 AM
Team India_England Tour_Captain_

नई दिल्ली: साल 1996 में भारतीय टीम के इंग्लैंड दौरे के लिए 2 युवा चेहरों को टीम में चुना गया. इन दोनों ने लॉर्ड्स पर खेले अपने पहले मैच में अपनी छाप छोड़ी. लेकिन हम आज उस खिलाड़ी बात कर रहे हैं जिसने अपने पूरे करियर को एक योद्धा की तरह जिया.

 

अपने पहले मैच में  क्रिकेट के मक्का यानी लॉर्ड्स के मैदान पर अज़हर की कप्तानी में टीम इंडिया के ओपनर बल्लेबाज़ विक्रम राठौर के आउट होने के बाद तीसरे नंबर पर बल्लेबाज़ी करने उतरा एक बाएं हाथ का 24 साल का नौजवान था. जो अपने पहले मैच में भी चीते की चाल चलता हुआ मैदान पर आ रहा था.

 

अपने पहले टेस्ट मैच में ही इस लड़के ने 131 रनों की शतकीय पारी खेल वर्ल्ड क्रिकेट को अपने आगमन की दस्तक दे दी थी.

 

जी हां 24 साल का ये लड़का और कोई नहीं बल्कि टीम इंडिया के सबसे जुझारू कप्तान और बाएं हाथ के सफलतम बल्लेबाज़ों में एक सौरव गांगुली ही थे. गांगुली का 1996 में लॉर्ड्स के मैदान पर शुरू हुए करियर ने लगभग 12 सालों तक बिना रूके और बिना थके देश सेवा की. गांगुली ने टीम में सलेक्शन के बाद लगातार अच्छा प्रदर्शन किया.

 

लेकिन 1999 विश्वकप में गांगुली ने अपनी एक अलग पहचान बनाई. गागंली ने इस विश्वकप में श्रीलंका के खिलाफ 17 चौके और 7 छक्कों के साथ 186 रनों की तूफानी पारी खेली और पूरे टूर्नामेंट गांगुली अच्छा खेले. तब से गांगुली टीम इंडिया में और ऊंचाई पर पहुंच गए. जिसके बाद साल 2000 में टीम इंडिया में फिक्सिंग स्कैंडल को लेकर भूचाल आ गया और फिर एक नए गांगुली की शुरूआत हुई… 

 

सौरव गांगुली 1999-2004: अज़हर की टीम से विदाई के बाद टीम की कमान एक ऐसे कप्तान के हाथ में दी गई जिसने वनडे करियर की शुरूआत में ही अपने रुतबे को अपने प्रदर्शन से ज़ाहिर कर दिया था. जी हां साल 1999 में सौरव गांगुली को टीम इंडिया की कमान सौंपी गई. गांगुली ने टीम इंडिया को लड़ने का जज्बा सिखाया. उन्होनें विदेशी ज़मीन पर देश को जीत की परिभाषा गढ़नी सिखाई.

 

साल 2002 में इंग्लैंड में जाकर भारतीय टीम ने नेटवेस्ट सीरीज़ जीती. इसके बाद अगले साल 2003 में साउथ-अफ्रीका में तमाम बड़ी टीमों को पछाड़ते हुए भारतीय टीम साल 1983 के बाद पहली बार विश्वकप फाइनल तक पहुंची. ये सब कप्तान गांगुली के रहते ही हुआ.

 

गांगुली ने 6 साल के अपने कप्तानी करियर में 147 वनडे मैचों में कप्तानी की जिसमें उन्होनें टीम को 76 मुकाबले जिताए. ये किसी भी भारतीय कप्तान का तीसरा सबसे सफल प्रदर्शन था. लेकिन विश्वकप के बाद जब भारतीय टीम का कोच ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ग्रेग चैपल को बनाया गया तो तब से गांगुली के ऊपर गर्दिश के बादल छाने शुरू हो गए.

 

चैपल ने हर ज़ोर लगाकर गांगुली को टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया. चैपल ने बोर्ड से कहा कि गांगुली शारीरिक और मानसिक तौर पर टीम इंडिया के लिए फिट नहीं हैं और फिर बेहद गुपचुप तरीके से गांगुली को टीम से बाहर कर दिया गया. सबको लगने लगा बस अब गांगुली का अंत हो गया है. अब फिर कभी मैदान पर बंगाल टाईगर को रोब, वो जलवा, वो लड़ने का जज़्बा नही दिखेगा.

 

लेकिन गांगुली ने सभी धारणाओं को गलत साबित करते हुए साल 2006-07 में अपने प्रदर्शन के दम पर टीम इंडिया में वापसी की और बल्ले से खुद को साबित भी किया. गांगुली ने वापसी के बाद खेले 30 मैचों में 41 के अच्छे औसत से 1240 रन बनाए. गांगुली ने अपने करियर के अंतिम दिनों में खुद में भी हार नहीं मानी बतौर कप्तान ना सही लेकिन बतौर बल्लेबाज़ी गांगुली टीम इंडिया से एक रॉयल टाइगर की तरह ही विदा हुए.

Sports News से जुड़े हर समाचार के लिए हमे फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस पर फॉलो करें साथ ही हमारा Hindi News App डाउनलोड करें
Web Title: Team India_England Tour_Captain_
Explore Hindi News from politics, Bollywood, sports, education, trending, crime, business, साथ ही साथ और भी दिलचस्प हिंदी समाचार
और जाने: captain england tour Team India
First Published:

Get the Latest Coupons and Promo codes for 2017