इस दौर में गांधी का सर्वोदय ही है एकमात्र विकल्प:अनंतमूर्ति

By: | Last Updated: Wednesday, 2 October 2013 5:22 AM
इस दौर में गांधी का सर्वोदय ही है एकमात्र विकल्प:अनंतमूर्ति

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<b>नई
दिल्ली: </b>देशों के दिवालिया
होने और सरकारों के काम-काज
ठप्प होने के घटनाक्रम से
औद्योगिक पूंजीवाद की थकान
बिल्कुल साफ होने लगी है और
ऐसे में गांधी का सर्वोदय ही
एकमात्र विकल्प है. यह बात
ज्ञानपीठ पुरस्कार से
सम्मानित साहित्यकार यूआर
अनंतमूर्ति ने कही है.<br /><br />भूदान
जैसे आंदोलनों में सक्रिय
रहे अनंतमूर्ति ने कहा
‘‘पूरी वैश्विक प्रणाली
पूंजीवाद की गिरफ्त में है
लेकिन जिस तरह यह भरभरा कर ढह
रही है उसमें जरूरी है कि
महात्मा गांधी के सर्वोदय पर
नयी बहस हो.’’ गांधी को नैतिक
द्रष्टा मानने वाले
अनंतमूर्ति ने कहा ‘‘गांधी
के लिए अर्थशास्त्र और
नैतिकता एक ही सिक्के के दो
पहलू हैं.
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सर्वोदय विशुद्ध रूप से
आर्थिक सिद्धांत है जिसका
लक्ष्य है विकास को समाज के
आखिरी व्यक्ति तक
पहुंचाना.’’ उन्होंने कहा कि
कुछ लोगों की सीमित समृद्धि
तब तक साधनविहीनों तक नहीं
पहुंचती किसी भी दौर में
विकास के लक्ष्य को प्राप्त
नहीं किया जा सकता. वृद्धि की
थमती गति को प्रोत्साहित
करने के लिए कभी दबंगई, कभी
हिंसा और कभी युद्ध का सहारा
लेना जारी रहेगा. यहां सबसे
अधिक आत्म विश्लेषण और नैतिक
जागृति की जरूरत है.<br /><br />यह
पूछने पर कि वैकल्पिक
व्यवस्था में आधुनिक
प्रौद्योगिकी की क्या
भूमिका होगी क्यों कि आज इसे
राज्य, समाज और आम लोगों का
जोरदार समर्थन हासिल है,
उन्होंने कहा इसका जवाब
‘उपयुक्त प्रौद्योगिकी’.
जिसकी बात गांधी ने विस्तार
से की है.<br /><br />81 वर्षीय कन्नड़
साहित्यकार ने कहा गांधी
पूंजीवाद के खिलाफ इसलिए
खड़े हैं कि यहां मुनाफा
मनुष्य को बौना बना रहा है,
मशीनों का मूल्य मनुष्य से
अधिक है, मानवता की जगह
मशीनीकरण को तरजीह दी जाती
है. <br /><br />अनंतमूर्ति ने कहा
गांधीजी के विचार बाद में कुछ
बदले और उन्होंने
प्रौद्योगिकी के संदर्भ में
समय व श्रम की बचत जैसे कुछ
सकारात्मक आयामों को
स्वीकार किया. हर घर में
सिलाई मशीन रखने की वकालत इसी
का उदाहरण है. हालांकि
उन्होंने संपत्ति के
संकेंद्रण और मशीनरी के
कामगारों की जगह लेने जैसे
नकारात्मक पहलुओं के प्रति
आगाह भी किया.<br /><br />अनंतमूर्ति
ने कहा कि आज की कंप्यूटर
प्रौद्योगिकी चरखे की तरह
विकेंद्रीकृत प्रौद्योगिकी
है. उनकी राय में गांधी होते
तो इस प्रौद्योगिकी के
विकेंद्रण के पहलू की
प्रशंसा करते. जिस तरह चरखे
से घर बैठ कर अपनी जरूरत और
कारोबार के लिए कपड़ा बुन
सकते थे वैसा ही इस्तेमाल इस
प्रौद्योगिकी का हो सकता है.<br /><br />उन्होंने
कहा कि इसलिए यह कहना कि वह
मशीन या प्रौद्योगिकी के
खिलाफ थे यह सही नहीं होगा. वह
सिर्फ उस प्रौद्योगिकी के
खिलाफ थे जो मानव के अस्तित्व
को बौना करता हो.<br /><br />उन्होंने
कहा आज अपनी जरूरतों को कम
करना पहले से कहीं अधिक
प्रासंगिक हो गया है. जरूरतें
बढ़ाकर ऐसा भ्रष्ट समाज पैदा
कर लिया है कि वह अपने
अस्तित्व को बरकरार रखने के
लिए अपने आपको ही कुतर रहा है.<br /><br />उन्होंने
कहा कि गांधी ने नैतिक
जिम्मेदारी को जो तवज्जोह दी
है वह आज बेहद महत्वपूर्ण हो
गई.<br /><br />गांधीजी ने सर्वोदय की
अपनी अवधारणा को सबसे पहले
‘हिंद स्वराज’ में पेश किया
था जो अपनी संपूर्णता में
पूंजीवाद की प्रत्यालोचना
है. अनंतमूर्ति ने कहा ‘‘मैं
हिंद स्वराज को क्लासिक
मानता हूं. यह हमारे लिए
जर्मन दार्शनिक कार्ल
मार्क्‍स की पूंजीवाद की
प्रत्यालोचना ‘दास कैपिटल’
की तरह ही महत्वपूर्ण है
हालांकि इसकी सीमा है कि यह
सिर्फ यूरोपीय अवधारणाओं और
अनुभवों पर केंद्रित है.’’ <br /><br />अनंतमूर्ति
पूछने पर कि क्या विनोबा भावे
के स्वतंत्रता पश्चात के
भूदान जैसे आंदोलन आज हो सकते
हैं उन्होंने कहा ‘नहीं’. तब
लोग अपेक्षाकृत निष्कपट थे.
आज मीडिया और गलत
प्रौद्योगकी ने उन्हें
चालाक बना दिया है.<br /><br />उन्होंने
कहा ‘‘उस दौर में जब हमने कहा
कि ‘जमीन जोतदार की हो’ तो
लोगों ने समझा. आज ऐसी स्थिति
नहीं है.’’ लालच की वजह से न वन
बच रहे न वनवासियों की
अस्मिता.<br /><br />गांधी का
सर्वोदय का सिद्धांत
ब्रिटिश चिंतक जान रस्किन के
आर्थिक लेख ‘अंटू दिस लास्ट’
से प्रभावित है. उन्हें यह
लेख मित्र और एक समाचारपत्र
के संपादक हेनरी पोलाक के
जरिए पढ़ने को मिला जिसका
उनके उपर क्रांतिकारी असर
हुआ.<br /><br />संस्कार, भारतीपुरा,
भाव जैसी कृतियों के लिए
मशहूर अनंतमूर्ति मैसूर
विश्वविद्यालय में अंग्रेजी
के प्राध्यापक रहे और
साहित्य अकादेमी, एफटीआईआई
जैसे संस्थानों के अध्यक्ष
रहे. फिलहाल वह कर्नाटक
केंद्रीय विश्वविद्यालय के
कुलाधिपति हैं.<br />
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