टीआरपी के दबाव में सीरियल 'बालिका वधु','प्रतिज्ञा'

टीआरपी के दबाव में सीरियल 'बालिका वधु','प्रतिज्ञा'

By: | Updated: 01 Jan 1970 12:00 AM

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<b>नई
दिल्ली:</b> इन दिनों टीवी पर
प्रसारित ज्‍यादातर
कार्यक्रमों में कोई न कोई
सामाजिक संदेश देने की कोशिश
की जा रही है, लेकिन टीआरपी का
दबाव इतना बढ़ गया है कि
सामाजिक बदलाव की कहानी बयां
करे वाले 'बालिका वधु' और
'प्रतिज्ञा' जैसे धारावाहिक
भी शुरुआती कड़ियों के बाद
अपने विषय से भटकते जा रहे
हैं.<br /><br />बाल विवाह पर आधारित
'बालिका वधु' ने हाल ही में
अपनी 1000 कड़ियां पूरी की हैं,
लेकिन इसके मुख्य किरदार
आनंदी का भाग्य आज भी दुविधा
में है और कुछ इसी तरह का
'प्रतिज्ञा' में देखने को मिल
रहा है, जहां मुख्य नायिका
आखिरकार उसी शख्स से शादी कर
लेती है, जो उसे तंग करता था.<br /><br />बालिका
वधु की लेखिका गजरा कोठारी ने
कहा कि ग्रामीण परिवेश में
जीवन आसान नहीं होता. <br /><br />राजस्थान
के एक गांव को आधार बनाकर
कहानी लिखने वाली कोठारी ने
बताया, 'जीवन में कोई छलांग
नहीं होती. सब कुछ बहुत
नियमित होता है और यही वह चीज
है, जिसे हम धारावाहिक में
दिखाने की कोशिश कर रहे हैं.
हमने अब तक आनंदी की यात्रा
का दर्द दिखाया है.'<br /><br />उन्होंने
कहा, 'आनंदी ने काफी कुछ पाया
है. यहीं कारण है कि उसने अपने
ससुराल पक्ष को जीत लिया है,
जो अब उसके समर्थन में हैं.
मैं नहीं समझती कि इसे किसी
उपलब्धि से कम समझा जाना
चाहिए.'<br /><br />वैसे आनंदी की इस
उपलब्धि के बाद भी धारावाहिक
अब तक कोइ ठोस संदेश नहीं दे
पाया है.<br /><br />कुछ ऐसा ही
'प्रतिज्ञा' में भी देखने को
मिला है, मुख्य नायिका शुरुआत
में नारी शोषण के खिलाफ लड़ती
है, लेकिन बाद में उसी लड़के
से शादी कर लेती है जो उसे तंग
करता था.<br /><br />कन्या भ्रूण
हत्या और यौन उत्पीड़न जैसे
मुद्दों को लेकर आए 'न आना इस
देस लाडो' और 'अगले जन्म मोहे
बिटिया ही किजो' भी कुछ
कामयाब कड़ियों के बाद अपने
सामाजिक विषयों से दूर हो गए.<br /><br />लेकिन
ऐसा क्या था, जिसकी वजह से
घरों में होने वाली राजनीति
ने सामाजिक विषयों को फीका कर
दिया?<br /><br />मीडिया विश्लेषक
किंजल शाह की राय में
निर्माता धारावाहिक के नवीन
विचारों के साथ आ रहे हैं
लेकिन जब वे कम टीआरपी को
देखते हैं, तो विषय को छोड़कर
घर की राजनीति पर अपना ध्यान
लगाते हैं.<br /><br />शाह ने बताया,
'निर्माता सांस-बहु के नाटकों
के एकाधिकार को खत्‍म करने के
लिए दिलचस्प कहानी के साथ आते
हैं. यह शुरुआत में तो अच्छा
करती है, लेकिन लंबेसमय तक
दर्शकों को बांधकर नहीं रख
पाती.'<br /><br />उन्होंने बताया कि
शोध की कमी भी टीआरपी कम होने
का एक और कारण है. जब वे समाजिक
मुद्दों पर केंद्रित
कहानियों को दिलचस्प बनाए
रखने में कामयाब नहीं हो
पाते, तो घरों की राजनीति
दिखाने का सहारा लेते हैं.<br /><br />लेखिका-निर्देशक
मृणाल झा ने कहा टीआरपी से
ज्याद निर्माताओं में
आत्मविश्वास की कमी इस तरह की
चीजों के लिए जिम्मेदार है.<br /><br />'अगर
आप समझते हैं कि लोग कुछ अलग
तरह की कहानी देखना पसंद करते
हैं, तब आपको ऐसा करना चाहिए.
अगर निर्माता मूल विषय को बदल
देते हैं और वही सास-बहु की
कहानी पर चले जाते हैं, तो
इसका अर्थ यह है कि वे कहानी
को लेकर संतुष्ट नहीं थे. यह
उनमें आत्मविश्वास की कमी को
दिखाता है.'<br /><br />
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