धार्मिक एकता के पक्षधर थे रामकृष्ण परमहंस

By: | Last Updated: Friday, 16 August 2013 7:42 AM
धार्मिक एकता के पक्षधर थे रामकृष्ण परमहंस

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<b>नई
दिल्ली: </b>भारतीय अध्यात्म और
चिंतन परंपरा को जिन संतों
मनीषियों ने समृद्ध किया है
उनमें रामकृष्ण परमहंस का
नाम बेहद आदर से लिया जाता है.
वह आधुनिक भारत के उद्गाता और
दुनिया भर में भारतीय चिंतन
का डंका बजाने वाले स्वामी
विवेकानंद के आध्यात्मिक
गुरु भी थे.
</p>
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रामकृष्ण परमहंस ने सभी
धर्मों की एकता पर जोर दिया
था. वह बचपन से ही इस विश्वास
से भरे थे कि ईश्वर के दर्शन
हो सकते हैं. ईश्वर की
प्राप्ति के लिए उन्होंने
कठोर साधना की और भक्तिपूर्ण
जीवन बिताया. अपनी साधना के
बल पर वह इस निष्कर्ष पर
पहुंचे कि संसार के सभी धर्म
सच्चे हैं और उनमें कोई
भिन्नता नहीं है. वह ईश्वर तक
पहुंचने के भिन्न-भिन्न साधन
मात्र हैं.
</p>
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रामकृष्ण परमहंस का जन्म
पश्चिम बंगाल के हुगली जिले
में कामारपुकुर नामक गांव के
एक गरीब धर्मनिष्ठ परिवार
में 18 फरवरी 1836 को हुआ था. उनके
बचपन का नाम गदाधर था. उनके
पिता का नाम खुदीराम
चट्टोपाध्याय था. जब परमहंस
सात वर्ष के थे तभी उनके पिता
का निधन हो गया.सत्रह वर्ष की
अवस्था में अपना घर-बार त्याग
कर वह कलकत्ता चले आए तथा
झामपुकुर में अपने बड़े भाई
के साथ रहने लगे. कुछ दिनों
बाद भाई के स्थान पर रानी
रासमणि के दक्षिणेश्वर
मंदिर में वह पुजारी नियुक्त
हुए. यहीं उन्होंने मां
महाकाली के चरणों में अपने को
उत्सर्ग कर दिया.
</p>
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परमहंसजी का जीवन द्वैतवादी
पूजा के स्तर से क्रमबद्ध
आध्यात्मिक अनुभवों द्वारा
निरपेक्षवाद की ऊंचाई तक
निर्भीक एवं सफल उत्कर्ष के
रूप में पहुंचा हुआ था.
उन्होंने प्रयोग करके अपने
जीवन काल में ही देखा कि उस
परमोच्च सत्य तक पहुंचने के
लिए आध्यात्मिक विचार-
द्वैतवाद, संशोधित
अद्वैतवाद एवं निरपेक्ष
अद्वैतवाद, ये तीनों महान
श्रेणियां मार्ग की
अवस्थाएं थीं. वह एक दूसरे की
विरोधी नहीं, बल्कि यदि एक को
दूसरे में जोड़ दिया जाए तो
वे एक दूसरे की पूरक हो जाती
थीं.
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उन दिनों बंगाल में बाल विवाह
की प्रथा थी. उनका विवाह भी
बचपन में हो गया था. उनकी
पत्नी शारदामणि जब
दक्षिणेश्वर आईं तब गदाधर
वीतरागी हो चुके थे. परमहंस
अपनी पत्नी शारदामणि में भी
महाकाली का रूप देखने लगे थे.<br />
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उनके कठोर आध्यात्मिक
अभ्यासों और सिद्धियों का
समाचार जैसे-जैसे फैलने लगा
वैसे-वैसे दक्षिणेश्वर
मंदिर की ख्याति भी फैलती गई.
मंदिर में भ्रमणशील
संन्यासियों, बड़े-बड़े
विद्वानों एवं प्रसिद्ध
वैष्णव और तांत्रिक साधकों
का जमावड़ा होने लगा. उस समय
के कई ख्याति नाम विचारक
जैसे- पं. नारायण शास्त्री, पं.
पद्मलोचन तारकालकार,
वैष्णवचरण और गौरीकांत
तारकभूषण आदि उनसे
आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त
करते थे.
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वह शीघ्र ही तत्कालीनन
सुविख्यात विचारकों के
घनिष्ठ संपर्क में आए जो
बंगाल में विचारों का
नेतृत्व कर रहे थे. ऐसे लोगों
में केशवचंद्र सेन,
विजयकृष्ण गोस्वामी,
ईश्वरचंद्र विद्यासागर,
बंकिमचंद्र चटर्जी, अश्विनी
कुमार दत्त के नाम लिए जा
सकते हैं.
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आचार्य के जीवन के अंतिम
वर्षों में पवित्र आत्माओं
का प्रतिभाशील मंडल, जिसके
नेता नरेंद्रनाथ दत्त (बाद
में स्वामी विवेकानंद) थे,
रंगमंच पर अवतरित हुआ. आचार्य
ने चुने हुए कुछ लोगों को
अपना घनिष्ठ साथी बनाया,
त्याग एवं सेवा के उच्च
आदशरें के अनुसार उनके जीवन
को मोड़ा और पृथ्वी पर अपने
संदेश की पूर्ति के निमित्त
उन्हें एक आध्यामिक बंधुत्व
में बदला. महान आचार्य के ये
दिव्य संदेशवाहक
कीर्तिस्तंभ को साहस के साथ
पकड़े रहे और उन्होंने मानव
जगत की सेवा में पूर्ण रूप से
अपने को न्योछावर कर दिया.<br /><br />1885
के मध्य में उन्हें गले के
कष्ट की शिकायत हुई. शीघ्र ही
इसने गंभीर रूप धारण किया
जिससे वह मुक्त न हो सके. 16
अगस्त 1886 को उन्होंने
महाप्रस्थान किया.<br /><br />अपने
शिष्यों को सेवा की शिक्षा जो
उन्होंने दी थी वही आज
रामकृष्ण मिशन के रूप में
दुनिया भर में मूर्त रूप में
है. उनके ज्ञान दीप को स्वामी
विवेकानंद ने संसार में
फैलाया था.<br />
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