पितृऋण से मुक्ति का द्वार है विधिवत किया श्राद्ध

By: | Last Updated: Saturday, 29 September 2012 10:40 AM
पितृऋण से मुक्ति का द्वार है विधिवत किया श्राद्ध

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<b>नई
दिल्‍ली:</b> हिन्दु धर्म और
वैदिक मान्यताओं के अनुसार
अश्विन के श्राद्ध पक्ष के
रूप में पुत्र का पुत्रत्व
तभी सार्थक माना जाता है जब
वह अपने जीवनकाल में जीवित
माता-पिता की सेवा करे और
उनके मरणोपरांत उनकी बरसी और
महालया (पितृपक्ष) में उनका
विधिवत श्राद्ध करे.<br /><br />आश्विन
कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से
अश्विन की अमावस्या तक को
पितृपक्ष या महालया पक्ष कहा
गया है. तमिलनाडु में इसे आदि
अमावसाई, केरल में करिकड़ा
वावुबली और महाराष्ट्र में
पितृ पंधरवड़ा नाम से जाना
जाता है.<br /><br />श्राद्ध का अर्थ
अपने देवताओं, पितरों, वंश के
प्रति श्रद्धा प्रकट करना
होता है. इस साल 30 सितंबर से
पितृपक्ष शुरू हो रहा है.<br /><br />मान्यता
है कि जो लोग अपने शरीर को
छोड़कर चले जाते है, वे किसी
भी रूप में अथवा किसी भी लोक
में हों, श्राद्ध पक्ष में वे
पृथ्वी पर आते हैं और उनकी
तृप्ति के लिए श्रद्धा के साथ
जो शुभ संकल्प और तर्पण किया
जाता है, वह श्राद्ध होता है.<br /><br />हिंदू
मान्यताओं के अनुसार
पिंडदान मोक्ष प्राप्ति का
एक सहज और सरल मार्ग है. ऐसे तो
देश के कई स्थानों पर पिंडदान
किया जाता है लेकिन बिहार के
गया में पिंडदान का बहुत
महत्व है. कहा जाता है कि
भगवान राम और सीताजी ने भी
राजा दशरथ की आत्मा की शांति
के लिए गया में ही पिंडदान
किया था.<br /><br />गया को विष्णु का
नगर माना गया है. यह मोक्ष की
भूमि कहलाती है. विष्णु पुराण
और वायु पुराण में भी इसकी
चर्चा की गई है. विष्णु पुराण
के मुताबिक गया में पिंडदान
करने से पूर्वजों को मोक्ष
मिल जाता है और वे स्वर्गवास
करते हैं. माना जाता है कि
स्वयं विष्णु यहां पितृ
देवता के रूप में मौजूद हैं,
इसलिए इसे ‘पितृ तीर्थ’ भी कहा
जाता है.<br /><br />गया के पंडा
राजाराम कहते हैं कि फल्गु
नदी के तट पर पिंडदान किए
बिना पिंडदान हो ही नहीं
सकता. पिंडदान की प्रक्रिया
पुनपुन नदी के किनारे से
प्रारम्भ होती है.<br /><br />किंवदंतियों
के अनुसार भस्मासुर के वंशज
गयासुर नामक राक्षस ने कठिन
तपस्या कर ब्रह्मा जी से
वरदान मांगा था कि उसका शरीर
देवताओं की तरह पवित्र हो जाए
और लोग उसके दर्शन मात्र से
पाप मुक्त हो जाएं. इस वरदान
के मिलने के बाद स्वर्ग की
जनसंख्या बढ़ने लगी और सब कुछ
प्राकृतिक नियम के विपरीत
होने लगा. लोग बिना भय के पाप
करने लगे और गयासुर के दर्शन
से पाप मुक्त होने लगे.<br /><br />इससे
बचने के लिए देवताओं ने
गयासुर से यज्ञ के लिए पवित्र
स्थल की मांग की. गयासुर ने
अपना शरीर देवताओं को यज्ञ के
लिए दे दिया. जब गयासुर लेटा
तो उसका शरीर पांच कोस में
फैल गया. यही पांच कोस की जगह
आगे चलकर गया बना. परंतु
गयासुर के मन से लोगों को पाप
मुक्त करने की इच्छा नहीं गई
और फिर उसने देवताओं से वरदान
मांगा कि यह स्थान लोगों को
तारने वाला बना रहे. जो भी लोग
यहां पर किसी के तर्पण की
इच्छा से पिंडदान करें,
उन्हें मुक्ति मिले. यही कारण
है कि आज भी लोग अपने पितरों
को तारने के लिए पिंडदान के
लिए गया आते हैं.<br /><br />विद्वानों
के मुताबिक किसी वस्तु के
गोलाकर रूप को पिंड कहा जाता
है. प्रतीकात्मक रूप में शरीर
को भी पिंड कहा जाता है.
पिंडदान के समय मृतक के निमित
अर्पित किए जाने वाले पदार्थ
की बनाई गई गोलाकृति पिंड
होती है. इसे जौ या चावल के आटे
को गूंथकर बनाया जाता है.<br /><br />श्राद्ध
की मुख्य विधि में मुख्य रूप
से तीन कार्य होते हैं,
पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण
भोजन. दक्षिणाविमुख होकर
आचमन कर अपने जनेउ को दाएं
कंधे पर रखकर चावल, गाय के दूध,
घी, शक्कर और शहद को मिलाकर
बने पिंडों को श्रद्धा भाव के
साथ अपने पितरों को अर्पित
करना पिंडदान कहलाता है. जल
में काले तिल, जौ, कुशा और सफेद
फूल मिलाकर उस जल से
विधिपूर्वक तर्पण किया जाता.
मान्यता है कि इससे पितर
तृप्त होते हैं. इसके बाद
श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन
कराया जाता है.<br /><br />पंडों के
मुताबिक शास्त्रों में
पितरों का स्थान बहुत ऊंचा
बताया गया है. उन्हें चंद्रमा
से भी दूर और देवताओं से भी
ऊंचे स्थान पर रहने वाला
बताया गया है. पितरों की
श्रेणी में मृत पूर्वजों
माता, पिता, दादा, दादी, नाना,
नानी सहित सभी पूर्वज शामिल
हैं. व्यापक दृष्टि से मृत
गुरु और आचार्य भी पितरों के
श्रेणी में आते हैं.<br /><br />कहा
जाता है कि गया में पहले
विभिन्न नामों की 360 वेदियां
थीं, जहां पिंडदान किया जाता
था. इनमें से अब 48 ही बची हैं.
वैसे कई धार्मिक संस्थाएं उन
पुरानी वेदियों की खोज की
मांग कर रही हैं. वर्तमान समय
में इन्हीं वेदियों पर लोग
पितरों का तर्पण और पिंडदान
करते हैं. यहां की वेदियों
में विष्णुपद मंदिर, फल्गु
नदी के किनारे और अक्ष्यवट पर
पिंडदान करना जरूरी माना
जाता है. इसके अतिरिक्त
वैतरणी, प्रेतशिला, सीताकुंड,
नागकुंड, पांडुशिला, रामशिला,
मंगलागौरी, कागबलि आदि भी
पिंडदान के लिए प्रमुख हैं.<br /><br />गौरतलब
है कि देश में श्राद्ध के लिए
हरिद्वार, गंगासागर,
जगन्नाथपुरी, कुरूक्षेत्र,
चित्रकूट, पुष्कर, बद्रीनाथ
सहित 55 स्थानों को
महत्वपूर्ण माना गया है
लेकिन गया का स्थान इनमें
सवरेपरी कहा गया है. गरुड़
पुराण में कहा गया है कि गया
जाने के लिए घर से निकलने पर
रखा जाने वाला एक-एक कदम
पितरों के स्वर्गारोहण के
लिए एक-एक सीढ़ी बनाता है.<br />
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