विजय विद्रोही की त्वरित टिप्पणी...तेलंगाना है हैदारावादी बिरयानी

By: | Last Updated: Thursday, 13 February 2014 10:28 AM
विजय विद्रोही की त्वरित टिप्पणी…तेलंगाना है हैदारावादी बिरयानी

सड़क से लेकर संसद तक अराजकत का दौर चल रहा है. संसद में तो गुरुवार को सारी हदें ही तोड़ डाली गयीं. आंध्र प्रदेश के विभाजन का बिल गृह मंत्री सुशील  कुमार शिंदे ने जैसे तैसे पेश तो कर दिया लेकिन उसके बाद जो हुआ उसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी . काली मिर्च का स्प्रे छिड़का गया , माइक तोड़े गये , हंटर निकला . कुछ सांसद अस्पताल  तक पहुंचाए गये . ऐसा राज्यों की विधानसभाओं में तो होता रहा है . कुछ दिन पहले ही जम्मू कश्मीर की विधानसभा में भी कुर्सियां चलीं थी, हाथापाई हुई थी . यूपी विधानसभा में भी ऐसे नजारे कई बार देश देख चुका है . कर्नाटक में तो कुछ माननीय विधायक पोर्न फिल्मों का लुत्फ लेते कथित रुप से देखे गये थे. लेकिन लोकसभा को भी ऐसा ही दिन देखना बाकी था ऐसा किसी ने सोचा नहीं होगा.

 

इस घटना पर राजनीति भी शुरु हो गयी है. कांग्रेस से निकाले गये आंध्र प्रदेश के सबसे अमीर सांसद राजगोपाल पर स्प्रे छोड़ने का आरोप है. उन्हे और पांच अन्य कांग्रेस सासंदों को पार्टी पहले ही निकाल चुकी है. लेकिन एपी के मुख्यमंत्री वहां की विधानसभा में तेलंगाना बिल को मंजूरी नहीं देते हैं. दिल्ली आकर राजघाट पर धरने के लिए बैठ जाते हैं लेकिन कांग्रेस पार्टी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती है. संसद में भी पहले राज्यसभा में बिल रखने की कोशिश करती है. हैरानी की बात है कि संसद के सचिव को याद दिलाना पड़ता है कि चूंकि यह मनी बिल है लिहाजा इसे लोकसभा में ही पहले रखा जाना जरुरी है. लोकसभा के आखिरी सत्र के आखिरी दिनों में बिल रखे जाने की मजबूरी हर कोई समझ रहा है. सवाल उठता है कि कांग्रेस यह कौन सा खेल रही है जैसा आरोप विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने लगाया है.

 

कांग्रेस को पहले लगता रहा कि तेलंगाना बनाकर उसके साथ टीआरएस ( तेलंगाना राष्ट्र समिति ) का विलय हो जाएगा. इससे तेलंगाना की सभी 17 लोकसभा सीटे पक्की हो जाएंगी. साथ ही तेलंगाना का विधान सभा चुनाव भी आसानी से जीता जा सकेगा जहां का मुख्यमंत्री केसीआर को बनाया जा सकता है. उधर सीमान्ध्र के लिए कांग्रेस की सोच यही थी कि जगन मोहन वहां की 25 में से ज्यादातर सीटें जीतेंगे लेकिन वहां के विधानसभा चुनावों में उसे कांग्रेस के सहयोग से ही बहुमत हासिल हो सकेगा. ऐसे में कांग्रेस राज्य में उसकी सरकार बनवा देगी और जरुरत पड़ने पर जगन केन्द्र में यूपीए तीन सरकार बनाने में सहयोग देगे. कुल मिलाकर पिछली बार एपी की 42 सीटों में से कांग्रेस ने 32 सीटे जीती थीं. कांग्रेस की चाल जगन के साथ मिलकर करीब तीस सीटों पर कब्जे की रही. लेकिन पहले उसे केसीआर ने धोखा दिया जिन्होंने पार्टी में विलय से इनकार कर दिया. उधर ड़ेढ़ साल तक जेल में रहने के बाद जगन बाहर आए तो कांग्रेस के खिलाफ खम ठोंक दिया. कहा तो यहीं तक जा रहा है कि कांग्रेस ने सीबीआई से कुछ राहत देने को कहा जिसकी वजह से जगन की जेल से रिहाई हो सकी. अब कांग्रेस की हालत न तीन में, न तेरह में वाली हो गयी है . 

 

लेकिन यही बात बीजेपी से भी पूछी जा सकती है. पहले वह कहती थी कि वह तेलंगाना के पक्ष में है. मोदी ने नीति बदली तो बीजेपी भी बदल गयी. अब वह कहती है वैसे तो वह तेलंगाना के पक्ष में है लेकिन सीमान्ध्र के साथ भी न्याय होना चाहिए. केन्द्र के बिल में सीमान्ध्र के साथ न्याय करने की जो कोशिश की गयी है उससे बीजेपी खुश नहीं है लेकिन और क्या क्या किया जाना चाहिए इसे लेकर भी वह साफ नहीं है. बीजेपी की दिक्कत है कि वह आंध्र में टीडीपी को भी खुश रखना चाहती है और तेलंगाना के लोगों की नजर में गिरना भी नहीं चाहती . साथ ही उसकी नजरें जगन मोहन रेडडी की तरफ भी हैं . टीडीपी और जगन दोनों तेलंगाना बनाए जाने के धुर विरोधी हैं. ऐसे में बीजेपी लिए सबसे अच्छी बात यही हो सकती है कि तेलंगाना का बिल कांग्रेस के राज में पास नहीं हो सके और वह तेलंगाना के हित की बात करते हुए सीमान्ध्र के साथ अन्याय नहीं होने का मुद्दा उठाए रखे .

 

तेलंगाना पर हर दल अपनी जुबान से मुकरता रहा है. कांग्रेस ने तेलंगाना के समर्थन की बात कह कर 2004 का विधानसभा चुनाव जीता था . टीआरएस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा गया था. लेकिन पांच साल तक उसने इस दिशा में कुछ नहीं किया . 2009 का चुनाव आया तो कांग्रेस ने तेलंगाना का विरोध किया और चुनाव जीत लिया. लेकिन उसके बाद केसीआर आमरण अनशन पर बैठे तो कांग्रेस डर गयी और तेलंगाना का समर्थन कर दिया. रही बात बीजेपी की तो वो तेलंगाना के पक्ष में थी लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी जी के समय जब बिहार , मध्यप्रदेश और यूपी का विभाजन हुआ तब उन्होंने आंध्र का विभाजन इसलिए नहीं करवाया क्योंकि टीडीपी ऐसा नहीं चाहती थी जो एनडीए का समर्थन कर रही थी . ऐसा स्वयं बीजेपी के नेता मानते भी हैं .

 

कुल मिलाकर तेलंगाना का मसला उस हैदराबादी बिरयानी की तरह है जिसका सेवन हर कोई करना चाहता है. लेकिन प्लेट में अपने अपने तरीके से लगाना चाहता है .

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