अफसरों की नाक में सरकारों की नकेल कसती रही है!

By: | Last Updated: Monday, 20 January 2014 11:38 AM

दुर्गा शक्ति नागपाल, अशोक खेमका और पंकज चौधरी. ईमानदारी की सज़ा झेल रहे इन अधिकारियों की चर्चा हर अखबार, हर न्यूज़ चैनल और हर मोहल्ले के चौक पर हो रही है. जाहिर है कि ब्यूरोक्रेसी का इस देश में ईमानदार रहना और किसी की चापलूसी न करना अब बहुत मुश्किल हो चुका है. 

‘राज’ की नीति का आलम ये है कि सत्ता में आते ही अपने करीबियों को हर अहम और मलाईदार पोस्ट पर बैठाना रिवाज़ बन चुका है और पिछली सरकार के करीबियों का ट्रांसफर और निलंबन राजनीतिक जरूरत. कुर्सी संभालते ही मुख्यमंत्रियों का पहला काम होता है पूरे प्रशासन तंत्र को इधर से उधर कर अपने लोगों को मनमुताबिक कुर्सी सौंपना और पिछली सरकार के करीबी माने जाने वालों को वनवास में भेजना.

 

उत्तर प्रदेश के पिछले 10-12 सालों के राजनीतिक इतिहास को देखें तो पता चलता है कि हर पांच साल में सत्ता बदलने के साथ ही राज्य के बड़े अधिकारियों की किस्मत भी बदल जाती है. यूपी पिछले 10-12 सालों में सरकार संचालित ट्रांसफर इंडस्ट्री में तब्दील हो चुका है. जहां ट्रांसफर का आधार कार्य कुशलता नहीं, अधिकारियों की लॉयल्टी होती है.

 

अखिलेश यादव ने 15 मार्च 2012 को शपथ लेने के 2 हफ्ते से भी कम वक्त में सूबे के 75 में से ज्यादातर जिलों के पुलिस प्रमुखों को बदल दिया. अखिलेश ने उनसे पहले की मायावती सरकार द्वारा नियुक्त ज्यादातर बड़े पुलिस अधिकारियों के तबादले किए. इनमें मायावती का गढ़ माने जाने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तमाम बड़े अधिकारी शामिल थे.

 

अखिलेश यादव ने मायावती की सरकार में प्रमुख सचिव गृह फतेह बहादुर और मुख्यमंत्री मायावती के सचिव रहे नवनीत सहगल समेत उनके करीबी तमाम अधिकारियों को पद से हटाकर नई पोस्टिंग की वेटिंग लिस्ट में डाल दिया.

 

24 दिन से भी कम वक्त में अखिलेश 1000 से भी ज्यादा आईएएस, आईपीएस और अन्य बड़े अधिकारियों का तबादला कर चुके थे. इनमें कई ऐसे टॉप ब्यूरोक्रेट शामिल थे जो पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के खासे करीबी माने जाते थे.

 

ट्रांसफर के इस खेल में अखिलेश यादव ने अपने पिता और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया. मुलायम सिंह ने 2004 से 2005 के बीच 500 से भी ज्यादा बड़े अधिकारियों का तबादला किया था.

 

अखिलेश यादव ने नोएडा के चेयरमैन और सीईओ के पदों पर राकेश बहादुर और संजीव सरन को दोबारा तैनात कर दिया. ये दोनों वही अधिकारी थे जिन पर 2001 में मुलायम सिंह यादव की सरकार के दौरान इन्हीं पदों पर रहते हुए भ्रष्टाचार और जमीन के सौदों में गड़बड़ी के आरोप लगे थे.

 

इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नवंबर 2012 में यूपी सरकार को इन दोनों अधिकारियों का तबादला करने के आदेश दिए और सीबीआई को आरोपों की जांच रिपोर्ट 6 महीने में देने को कहा. कोर्ट के आदेश पर मजबूर होकर अखिलेश यादव को इन दोनों अधिकारियों का ट्रांसफर करना पड़ा और राणा रमन को नोएडा का सीईओ और चेयरमैन नियुक्त किया गया.

 

अखिलेश यादव का तर्क है कि प्रशासन व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त करने के मकसद से तबादले करना सरकार का अधिकार है.

 

लेकिन सवाल उठता है कि कुर्सी हासिल करने के कुछ ही दिनों में सैकड़ों अधिकारियों की कार्यक्षमता का आंकलन कर कैसे उनके ट्रांसफर का फैसला रातोंरात लिया जा सकता है.

 

बीएसपी और अन्य विपक्षी दल बार बार आरोप लगाती रहे हैं कि अखिलेश अपने करीबी अधिकारियों को प्रशासन की कमान देकर 2014 लोकसभा चुनाव की तैयारी कर रहे हैं ताकि ये अधिकारी आने वाले वक्त में समाजवादी पार्टी के काडर के तौर पर काम कर सकें. बीएसपी ने दुर्गा नागपाल के निलंबन पर भी खूब शोर मचाया है.

 

मायावती का हाल

 

लेकिन मायावती भी ट्रांसफर और पोस्टिंग की इस इंडस्ट्री की पोषक रही हैं. मायावती की पिछली  सरकार में कैबिनेट सचिव रहे शशांक शेखर तो आईएएस अधिकारी भी नहीं थे उसके बावजूद मायावती ने उन्हें कुर्सी दी और अपने सबसे करीबी ब्यूरोक्रेट का तमगा भी. मायावती से करीबी का ही नतीजा था कि 2012 में समाजवादी पार्टी के चुनाव जीतते ही शशांक शेखर ने इस्तीफा दे दिया.

 

2007 में सत्ता पर काबिज होने के कुछ घंटों में ही मायावती ने 173 आईपीएस अधिकारियों का तबादला कर दिया था. अगले ही दिन 33 आईएएस अधिकारियों का तबादला किया गया. यहां तक कि ताज कॉरिडोर मामले में आरोपी पूर्व पर्यावरण सचिव आर के शर्मा को प्रमुख सचिव पंचायती राज के पद पर बैठा दिया.

 

सत्ता पाते ही मायावती ने प्रमुख सचिव लोक निर्माण के पद पर तैनात सतीश कुमार अग्रवाल और लखनऊ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष बीबी सिंह को निलंबित कर दिया.

 

दोनों पर आरोप था कि 1997 में मायावती सरकार के दौरान बनाए गए आंबेडकर पार्कों का रखरखाव ठीक से नहीं किया गया. कहा जाता है कि इन दोनों अधिकारियों ने बीएसपी के चुनाव जीतते ही आंबेडकर पार्कों को चमकाने की भरसक कोशिश की थी लेकिन कोशिश शायद कम पड़ गई जिसकी सज़ा उन्हें मिली.

 

दरअसल यूपी में ट्रांसफर और पोस्टिंग का ये खेल एक क्रिकेट मैच की तरह है. जब मायावती की टीम बैटिंग कर रही थी तो उन्होंने ट्रांसफर, पोस्टिंग और निलंबन के चौके छक्के लगाए. फिर जब अखिलेश की टीम की बारी आई तो उन्होंने भी मायावती का स्कोर पार करने के लिए बड़े शॉट लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

 

हर पांच साल में सत्ता बदलने का क्रम अगर चलता रहा तो ये सिलसिला भी रुकने वाला नहीं है.

 

विधायिका सर्वोच्च है, इसमें शक नहीं. लेकिन सत्ता के घमंड, कुर्सी पर बने रहने के जुगाड़ और भ्रष्टाचार के स्रोतों के खुला रखने के लिए नेताओं को कार्यपालिका की नाक में नकेल डाल कर रखना बेहद जरूरी लगता है.

 

मायावती अपने निजी सुरक्षा अधिकारी से अपना जूता साफ करवाती हैं तो राम गोपाल यादव वर्दीधारी आईपीएस के उनके पैरों में गिरने पर सीना चौड़ा कर लेते हैं. ऐसे में ईमानदार और चापलूसी न करने वाले अधिकारियों पर गाज तो गिरेगी ही और खमियाज़ा कहीं न कहीं आम जनता को ही भुगतना पड़ेगा.

 

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