कुछ तो शर्म करो वकील साहब!

By: | Last Updated: Monday, 20 January 2014 10:50 AM
कुछ तो शर्म करो वकील साहब!

अगर मेरी बेटी या बहन शादी से पहले संबंध बनाती या रात में अपने ब्वॉयफ्रेंड के साथ घूमती तो मैं अपने पूरे परिवार के सामने पेट्रोल छिड़ककर उसे जिंदा जला देता. ये किसी जाहिल आदमी का बयान नहीं है.. ना ही अफगानिस्तान में रह रहे किसी तालिबानी शख्स का फरमान है. ये तो 19 साल से वकालत की प्रैक्टिस कर रहे बेहद पढ़े लिखे.. कानून के जानकार और दिल्ली गैंगरेप के दोषियों के वकील एपी सिंह का बयान है. 

अफसोस कीजिए.. गुस्सा कीजिए या फिर एपी सिंह जैसे लोगों के समाज का हिस्सा होने को हमारा और अपना दुर्भाग्य कह लीजिए.. ना तो एपी सिंह को इससे कोई फर्क पड़ता है और ना ही कभी पड़ेगा ! एपी सिंह के बयानों से ऐसा लग रहा है कि साकेत कोर्ट में गैंगरेप का केस हारने के बाद वो मानसिक दिवालियापन के शिकार हो गए हैं.

 

काश ये सच होता लेकिन सच तो ये है कि वो सोच समझकर ऐसे बयान दे रहे हैं. एक ऐसा आदमी हमारी कानून व्यवस्था का हिस्सा है जो खुद अपराध करने की बात करता है. एक ऐसा आदमी पिछले कई सालों से लोगों को इंसाफ दिलाने की लड़ाई लड़ रहा है जिसे समाज, अधिकार और आजादी जैसे शब्दों के मायने पता ही नहीं हैं. जो देश के संविधान को नहीं मानता वो भला वकालत कैसे कर सकता है !

 

देश का संविधान बालिग लड़का या लड़की को अपनी जिंदगी से जुड़े फैसले करने का अधिकार देता है लेकिन एपी सिंह की ‘सल्तनत’ में रहने वाले बाशिंदों पर देश का संविधान लागू नहीं होता. एपी सिंह का अपना कानून है और अगर उसे कोई तोड़ने की कोशिश करेगा तो बकौल एपी सिंह वो उसे जिंदा जला देने का जज्बा रखते हैं !

 

कानून की किताब में उलझे रहने वाले वकील सिंह ने सिर्फ अपनी बेटी और बहन को लेकर एक बेहुदा बयान नहीं दिया है बल्कि समाज में महिलाओं के प्रति उनकी घटिया सोच को सामने रखा है. एपी सिंह के लिए महिला किसी भी उम्र में भी क्यों ना हो उनके लिए वो इंसान से ज्यादा ‘सामान’ है जिसकी हिफाजत करने के लिए पिता से लेकर पोतों तक की ड्यूटी होती है.

 

वकील सिंह गर्व से बताते हैं कि लड़की जब पैदा होती है तो पिता के संरक्षण में रहती है… जब शादी होती है तो पति के संरक्षण में रहती है..जब मां बन जाती है तो बेटों के संरक्षण में और दादी अपने पोतों के संरक्षण में रहती है. महिला को हमेशा किसी के सहारे और संरक्षण की जरूरत होती है.

 

वाह रे एपी सिंह और वाह री इनकी सोच जो महिलाओं की आजादी पर इतना बड़ा हमला करती है. एपी सिंह से कोई ये क्यों नहीं पूछता कि क्या उनकी आंखों पर पर्दा पड़ा है जो उन्हें आजाद महिलाओं की सफल उड़ान की कहानी दिखाई नहीं देती. क्या उनके कान बंद है जिसकी वजह से उनके दिमाग के बंद दरवाजों तक अपने दम पर समाज में मुकाम हासिल करने वाली महिलाओं की आवाज नहीं पहुंचती.

 

एपी सिंह के इस बयान पर गुस्से से ज्यादा हैरानी हो रही है. हैरानी इसलिए कि देश की राजधानी दिल्ली में रहने वाला एक पढ़ा लिखा पेशे से एडवोकेट शख्स ऐसी सोच रखता है. हैरानी इसलिए कि हम महिलाओं के सम्मान और उनकी आजादी के लिए शिक्षा और जागरुकता फैलाने पर जोर देते हैं लेकिन शिक्षित और जागरुक होने के बावजूद अगर एपी सिंह जैसे लोगों की जमात हमारे समाज में मौजूद है तो फिर तो लड़ाई और भी मुश्किल है. एपी सिंह के बयानों का चौतरफा विरोध हो रहा है.

 

बार काउंसिल ने भी एपी सिंह के बयान पर आपत्ति जताई है लेकिन एपी सिंह अपने बयान से टस से मस होने के लिए तैयार नहीं हैं. वो अपने बयान को सही साबित करने के लिए हर किस्म का कुतर्क पेश कर रहे हैं. महात्मा गांधी से लेकर हिंदू समाज की रीति का हवाला दे रहे हैं. समाज में बढ़ रहे अपराधों के पीछे लड़कियों पर लगाम ना कसने को वजह बता रहे हैं. क्या एपी सिंह अपने बेतुके बयान से ये साबित करना चाहते हैं कि निर्भया अपने दोस्त के साथ रात में फिल्म देखकर लौटी थी ये उसके जीवन की सबसे बड़ी गलती थी !

 

गैंगरेप के दोषी अक्षय, विनय, मुकेश और पवन तो बेचारे हैं उनकी नजरों में. दलील ये कि कोर्ट का फैसला अमानवीय है और जो निर्भया के साथ हुआ वो एपी सिंह के लिए अमानवीय की श्रेणी में नहीं आता. ये सही है कि आरोपियों को वकील मिलना कानून का हिस्सा है और उनकी पैरवी करना भी.. लेकिन केस हारने के बाद वो खुद ‘दोषी’ की तरह पेश आने लगें इसकी उम्मीद न तो कानून करता है और न ही समाज.

 

अब से पहले एपी सिंह को कोई नहीं जानता था लेकिन आज एपी सिंह का नाम पूरा देश जान रहा है.. एपी सिंह का नाम जब-जब आएगा .. अफसोस के साथ आएगा कि इनके जैसे पढ़े लिखे जाहिल सोच वाले लोग कानून व्यवस्था का हिस्सा हैं. एपी सिंह जैसे लोग समाज में उस नासूर की तरह हैं जो सिर्फ शरीक का एक अंग खराब नहीं करता बल्कि पूरे शरीर में जहर फैला देता है. एक वकील की ऐसी सोच ये सोचने पर मजूबर करती है कि अगर ऐसे लोग कानून के रखवाले बने रहेंगे तो हमारा कानून कब तक समाज के लिए बचा रहेगा !

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