ब्लॉग: क्या भगवा रथ को रोक पाएगी ‘आप’?

By: | Last Updated: Thursday, 20 February 2014 9:22 AM

नई दिल्ली: पिछले कुछ दिन भारतीय राजनीति के लिए बेहद ही अहम रहे हैं. अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया तो पीएम पद के बीजेपी उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने चाय पर चर्चा का शुभारंभ किया. वहीं राहुल के देर सबेर उठाए मुद्दों को कांग्रेस ने अमली जामा पहना शुरू कर दिया. वहीं यूपी, बिहार के क्षेत्रिय नेताओं जैसे मुलायम सिंह और नीतीश कुमार ने अपने – अपने राज्य में धुआंधार रैलियां शुरू कर दीं. कुल मिलाकर अप्रैल – मई में होने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारियों में सभी राजनीतिक दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है.

 

 

पिछले साल नवंबर दिसबंर तक देश में केवल एक ही नाम की चर्चा थी मोदी, मोदी, मोदी, नमो…लेकिन 27 दिसंबर को दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की सरकार बनने के बाद पूरे देश या खास तौर पर उत्तर भारत में चल रहे मोदी लहर में थोड़ा ठहराव जरूर आया. जनता के बीच अरविंद केजरीवाल कितना लोकप्रिय हुए ये तो आम चुनावों के बाद ही पता चलेगा. लेकिन इस दौरान अरविंद केजरीवाल, नरेंद्र मोदी और अन्य नेताओं की अपेक्षा ज्यादा खबरों में रहे. खास तौर पर टेलीविजन मीडिया में तो करीब 1 महीने तक केजरीवाल ही रहे. अरविंद केजरीवाल ने वो सारे काम किए जिससे उन्हें मीडिया कवरेज मिलती. आम आदमी पार्टी देश की एक मात्र ऐसी पार्टी है जिसका दिल्ली के बाहर कोई मजबूत क्षेत्रिय संगठन नहीं है लेकिन सिर्फ मीडिया कवरेज की बदौलत आज आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल देशभर में चर्चा का विषय बने हुए हैं.

 

बिजली पानी के मुद्दे से लेकर, लोकपाल के मुद्दे तक केजरीवाल ने जमकर सुर्खियां बटोरी. मुद्दा चाहे 5 पुलिस अधिकारियों  के तबादले के लिए रेल भवन के पास धरना पर बैठने का हो. या जनवरी की भीषण ठंड में रोड पर रात गुजारने का. केजरीवाल और आम आदमी पार्टी ने मीडिया के सहारे देशभर में एक नाम पंहुचा दिया कि दिल्ली में कोई केजरीवाल है और आम आदमी पार्टी है. जो या तो पागल है या क्रांतिकारी है.

 

अब जनता के ऊपर है कि वो केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को कैसे लेती है?

 

देशभर में एक बड़ा वर्ग है जो केजरीवाल को एक आंदोलनकारी और शहीद की तरह मानकर चल रहा है जबकि एक वर्ग ऐेसा भी है जो केजरीवाल को सिवाय एक नौंटकी के कुछ और मानने को तैयार नहीं है. लेकिन इन सब के बीच  अरविंद केजरीवाल आहिस्ता आहिस्ता मीडिया में मोदी की जगह कम कर रहे हैं.

 

देशभर में मोदी के साथ ही साथ अब केजरीवाल की भी बराबर चर्चा होने लगी है. जो निश्चित तौर पर बीजेपी के लिए चिंता का विषय है. अब सवाल ये उठता है कि क्या केजरीवाल मोदी की राह में रोड़ा हैं?

 

अब सवाल ये उठता है कि क्या केजरीवाल भगवा रथ को रोक पाएंगे?

 

केजरीवाल आज जिस लोकपाल के रथ पर सवार है वो बीजेपी के राम मंदिर की तरह है. बीजेपी भी सत्ता की कुर्सी तक राम मंदिर के सहारे ही पंहुची थी. वैसे ही दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने लोकपाल के सहारे सत्ता तक पंहुची और अब लोकपाल के ही मुद्दे पर दिल्ली की सत्ता छोड़कर केजरीवाल एंड टीम लोकसभा में विजय हासिल करना चाहती है.

 

अरविंद केजरीवाल के आने से बीजेपी की तरफ झुक रहे वोटरों पर फर्क तो जरूर पड़ा है. वो तमाम वोटर जो कांग्रेस से नाराज थे और विकल्प ना होने की वजह से इस बार सीधे बीजेपी की तरफ रूख करते दिख रहे थे वो अब आम आदमी पार्टी और बीजेपी दोनों के बारे में समान रूप से सोचने लगे हैं. खास तौर पर तो बड़े शहरों के वोटरों में आम आदमी पार्टी को लेकर खासा उत्साह है. पहली बार वोट देने वाले वोटरों में भी आम आदमी पार्टी को लेकर उत्साह है.

 

केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की जबर्दस्त मीडिया कवरेज ने यूपी और बिहार जैसे राजनीतिक राज्यों में मोदी के बराबर ही केजरीवाल की लहर चला दी है, जिससे आम आदमी पार्टी को राजनीतिक फायदा मिल सकता है. हालांकि यहां बीजेपी को ही ज्यादा फायदा होगा क्यों कि इन राज्यों में उनके पास पहले से ही सांगठनिक ढ़ांचा मौजूद है. जबकि आम आदमी पार्टी को नए सिरे से शुरुआत करनी पड़ेगी. ऐसे हालात में आम आदमी पार्टी कोई बहुत बड़ा करिष्मा तो नहीं कर पाएगी लेकिन सपा, बसपा और जेडीयू  जैसे राजनीतिक दलों के लिए मुश्किल जरूर खड़ी कर सकती है.

जिस तरह  से देश के बड़े-बड़े नाम आम आदमी पार्टी में शामिल हो रहे हैं उससे कहा जा सकता है कि आम आदमी पार्टी बीजेपी के साथ ही साथ क्षेत्रिय दलों के लिए बड़ा खतरा है. आम आदमी पार्टी ने लोकसभा चुनावों को  लेकर 20 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी है जबकि बीजेपी ने अभी उम्मीदवारों की सूची जारी नहीं की है. यानी की आम आदमी पार्टी ने शुरुआती बढ़त ले ली है. फिलहाल के हालात को देखते हुए कहा जा लग रहा है कि एनडीए 230 से 250 सीटें तक ला सकती है. लेकिन फिर भी वो बहुमत दूर है. ऐसे में हो सकता है कि आम आदमी पार्टी वो 20-35 सीटें ले जाए जो उसके ना होने से सीधे बीजेपी के खाते  में जाते. यानी की आम आदमी पार्टी ठीक वैसे ही बीजेपी को बहुमत से दूर कर सकती है जैसे उसने दिल्ली में बीजेपी को सत्ता से दूर कर दिया.

 

यानी की कहीं ना कहीं आम आदमी पार्टी भगवा रथ को रोकने का प्रयास कर रही है. लेकिन ‘आप’ भगवा रथ को कितना रोक पाएगी यह तो चुनावों के बाद ही पता चलेगा.

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