विजय विद्रोही की त्वरित टिप्पणी... मीडिया से अब इतनी खुंदक क्यों है केजरीवाल को!

By: | Last Updated: Saturday, 25 January 2014 11:19 AM

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान मीडिया को सरेआम बदनाम करते हैं. उनके कानून मंत्री सोमनाथ मीडिया से पूछते हैं कि उनको कितना पैसा मोदी से मिला. आप के कार्यकर्ता दिल्ली रेल भवन धरने के दौराम पत्रकारों से उलझते हैं, महिला रिर्पोटरों से भी बदतमीजी करते हैं.

 

यह उस पार्टी का हाल है जिसके दो मंत्री मीडिया से गये हैं. एक चैनल का संपादक भी नौकरी छोड़ कर गया है. लेकिन यह सारे नेता मीडिया की आजादी की बात जुबानी करके ही रह जाते हैं. अब अगर जिस दल का मुख्यमंत्री ही मीडिया को गालियां दे तो उसे पार्टी के अन्य नेताओं से क्या उम्मीद की जाए!

 

केजरीवाल कहते हैं कि किसी एक चैनल के रिर्पोटर ने उनसे कहा कि उनके संपादक ने केजरीवाल के खिलाफ स्टोरी लाने को कहा है. बड़ी आसानी से केजरीवाल ने यह बात कह दी और आगे बढ़ गए. लेकिन केजरीवाल को यह जानना चाहिए कि जिस तरह उन जैसे ईमानदार नेता भी इस देश में मौजूद हैं उसी तरह कुछ ईमानदार संपादक रिर्पोटर भी इस देश में हैं.

 

आप में हिम्मत है तो उस चैनल का नाम बताएं, उस संपादक का नाम बताएं और कौन सी स्टीरी उनके खिलाफ चली उसके बारे में बताएं. एक झटके में पूरे मीडिया को बदनाम करने के पीछे केजरीवाल की क्या रणनीति हैं.

 

एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री सबके सामने ऐसा बोलते हैं तो वो कहीं न कहीं ऐसा संदेश भी दे रहे हैं कि मीडिया बिका हुआ है, मीडिया उनके खिलाफ है यानि कहीं न कहीं जनता को उकसाने की भी कोशिशें की जा रही है कि वो ऐसे मीडिया से दूर रहे या ऐसे मीडिया की बातों में न आएं या ऐसा मीडिया अरविंद केजरीवाल सरकार के खिलाफ कुछ दिखाए तो उसपे यकीन न करें या हो सके तो जनता ऐसे बिके हुए दलाल मीडिया को खुद ही सबक सिखा दें.

 

केजरीवाल और उनके तीन-तीन मंत्रियों पर लोगों को भड़काने, दंगा के लिए उकसाने, कानून तोड़ने की धाराएं दिल्ली पुलिस न लगाईं हैं, सुप्रीम कोर्ट ने भी एक मुख्यमंत्री के आचरण पर सवाल खड़े किए हैं. उनके एक अन्य मंत्री के खिलाफ योगांडा की महिलाएं कोर्ट में गई हैं. 164 के तहत बयान दर्ज करके मंत्री पर जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगा रही है.

 

सर्वे बता रहे हैं कि केजरीवाल की पार्टी दिल्ली के बाहर कुछ खास हासिल करती लोकसभा चुनावों में दिख नहीं रही. पार्टी से जुड़े कुछ गणमान्य लोगों का पार्टी से मोहभंग हुआ है. मेधा पाटकर ने भी आप में शामिल होने से इनकार कर दिया है और एलांइंस बनाकर चुनाव लड़ने पर ही सहमति दी.

 

आप को चंदा मिलना भी कुछ कम हुआ है. निम्न मध्यम वर्ग जरूर जुड़ रहा है लेकिन पैसा देने वाला, सोशल मीडिया पर छवि बनाने बिगाड़ने वाला उच्च मध्यम वर्ग बिदकने के संकेत दे रहा है. पार्टी के अंदर से भी दबे स्वर में ऐसी बातें सामने आने लगी हैं कि पार्टी मे सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.

 

राहुल गांधी को चुनौति देने अमेठी गए कुमार विश्वास पर मुकदमा दर्ज हुआ है. नर्सों पर टिप्पणी पर माफी मांगने के बावजूद विवाद थमा नहीं है. अब केजरीवाल को इतने सारे बवालों से जुझना पड़ रहा है तो इसमें मीडिया का तो कोई कसूर नहीं है. वो क्यों मीडिया को अपने निशाने पर ले रहे हैं और मीडिया पर अपना गुस्सा निकाल रहे हैं.

 

सोमनाथ भारती से पूछा जाना चाहिए कि जब अन्ना के आंदोलन को मीडिया दिखा रहा था, जब अरविंद को बिजली क्नेकशन जोड़ते मीडिया दिखा रहा था तब कितने पैसे मीडिया को अन्ना और अरविंद की तरफ से मिले थे.

 

केजरीवाल से पूछा जाना चाहिए कि जब वो मीडिया पर राहुल या मोदी की गोद में बैठने का आरोप लगा रहे थे तब भी उन्हें मीडिया लाइव दिखा रहा था तो क्या पैसे लेकर यह सब दिखाया जा रहा था. योगेन्द्र यादव से पूछा जाना चाहिए कि वो तो अभिव्यक्ति की आजादी के पुरजोर समर्थक रहे हैं लेकिन अब खामोश क्यों हैं. आशुतोष को याद दिलाने की जरूरत नहीं जब कांशीराम ने उनसे हाथापाई की थी तो कैसे खुद एसपी सिंह सड़कों पर उतरे थे, अब आशुतोष चुप्प क्यों हैं. केजरीवाल तो इससे पहले भी 1400 करोड़ रुपये मीडिया के बीच बंटने के आरोप लगा चुके हैं. क्या वो हिसाब देंगे कि किसे कितना मिला.

 

मीडिया को किसी की भी आलोचना करने का अधिकार है. आप तो यह बात पहले कहते आई थी. अब कह रही है कि अगर आप यानि कोई मीडियाकर्मी आप के साथ नहीं है तो वो आपके खिलाफ है. यह सोच तो फासिस्ट ताकतों की होती है ऐसी ताकतों की जो लोकतंत्र में यकीन नहीं रखती, लेकिन अब टीम केजरीवाल की सोच भी ऐसी ही होती जा रही दिखती है. यह निहायत अफसोस की बात है. कुछ दिन पहले अपनी शाम की प्रेस कांफ्रेस के बाद केजरीवाल ने मीडिया से कहा था कि वो ऐसे ही उन्हें डांटते डपटते रहें ताकि उनकी कमियां उन्हें पता चलती रहे.

 

लेकिन अब मीडिया बिक चुका है. राहुल या मोदी की गोद में बैठ चुका है. केजरीवाल को अगर इतनी ही मीडिया से शिकायत है तो प्रेस काउंसिल में जाने को स्वतंत्र हैं, वो न्यूज चैनलों की संस्था एनबीए में शिकायत कर सकते हैं. अभी तक तो मीडिया स्टिंग करता रहा है अब वो खुद मीडिया का स्टिंग क्यों नहीं करते.

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Web Title: विजय विद्रोही की त्वरित टिप्पणी… मीडिया से अब इतनी खुंदक क्यों है केजरीवाल को!
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