व्यक्ति विशेष: चक्रव्यूह में जेटली!

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दिल्ली का फिरोजशाह कोटला मैदान क्रिकेट के कई अहम मैचों का गवाह रहा है. इस मैदान ने जीत और हार का एक लंबा इतिहास देखा है लेकिन इन दिनों इस मैदान को लेकर एक ऐसी जंग छिड़ गई है जिसकी वजह से राजनीतिक के मैदान के दो दिग्गजों की साख दांव पर लग गई है. डीडीसीए यानी दिल्ली जिला क्रिकेट एसोसिएशन में भ्रष्टाचार को लेकर छिड़े ताजा विवाद के केंद्र में केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली हैं तो वही उन पर निशाना साध रहे हैं उन्ही की पार्टी बीजेपी के सांसद कीर्ति आजाद. केंद्र सरकार में नंबर दो की हैसियत रखने वाले वित्त मंत्री जेटली को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बेहद करीबी और भरोसेमंद माना जाता हैं. और यही वजह भी है कि उन पर लगे आरोपों की आड में विरोधी दल भी प्रधानमंत्री मोदी पर भी प्रहार कर रहे हैं.

 

भारतीय जनता पार्टी में इन दिनों घमासान मचा हुआ है. बीजेपी के दो बड़े नेताओं अरुण जेटली और कीर्ति आजाद के बीच इन दिनों ठनी हुई है और दोनों के बीच वार और पलटवार का सिलसिला भी जारी है. दरअसल भाजपा सांसद एवं पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी कीर्ति आजाद ने वित्त मंत्री अरुण जेटली के खिलाफ डीडीसीए यानी दिल्ली जिला क्रिकेट एसोसिएशन में कथित भ्रष्टाचार को लेकर एक अभियान चलाया था. आजाद ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जेटली का नाम लिए बिना उन पर परोक्ष रूप से कई गंभीर आरोप भी लगाए थे और जिस पर कार्रवाई करते हुए बीजेपी के संसदीय बोर्ड ने जब कीर्ति आजाद को पार्टी से निलंबित कर दिया तो बीजेपी के अंदर मचा ये घमासान सड़कों पर उतर आया.

 

बीजेपी सांसद कीर्ति आजाद ने कहा कि मेरी गलती क्या है, मुझे नहीं पता. नौ साल से करप्शन के खिलाफ आवाज उठाता रहा हूं. डीडीसीए में करप्शन की बात उठाना एंटी-पार्टी एक्टिविटी नहीं.” वाजपेयी जी की कविता पढ़ते हुए उन्होंने कहा कि हार नहीं मानूंगा, रार ‘नई’ ठानूंगा.

 

कीर्ति आजाद ने क्या कहा?
बीजेपी के निलंबित सांसद कीर्ति आजाद का कहना है कि ”डीडीसीए कभी पार्टी का माध्यम नहीं था. डीडीसीए को लेकर सवाल उठाने पर क्या अनुशासनहीनता की, तब तो बीसीसीआई भी पार्टी का मामला हो. आईपीएल पर भी कितने सवाल उठाए हैं, तब कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई? डीडीसीए में मैंने पर्सनल लेवल पर मामला उठाया था. अगर सच बोलना जुर्म है तो मैं यह जुर्म करता रहूंगा. “ बीजेपी के सांसद कीर्ति आजाद जहां पार्टी से अपने निलंबन को लेकर सवाल खड़े कर रहे हैं तो वहीं विरोधी दल भी उनके बहाने बीजेपी पर निशाना साध रहे हैं.

कीर्ति आजाद आखिर क्यों अरुण जेटली को निशाने पर ले रहे हैं इस बात की गहराई से पड़ताल भी हम करेंगे आगे लेकिन उससे पहले ये जान लीजिए की कौन है कीर्ति आजाद और क्या है ये डीडीसीए का पूरा विवाद.

कौन है कीर्ति आजाद?
कार्ति आजाद बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री भगवत झा आजाद के बेटे हैं और 1983 में क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीतने वाली टीम के सदस्य भी रहे हैं. कीर्ति आजाद ने 1993 में पहली बार दिल्ली की गोल मार्केट विधानसभा सीट से चुनाव जीत कर बीजेपी विधायक के तौर पर अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी. बाद में उन्हें दिल्ली छोड़कर बिहार के अपने गृह जिले दरभंगा से भी चुनाव लड़ना पड़ा था और वो दरभंगा से तीसरी बार सांसद चुने गए हैं. लेकिन बुधवार को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में उन्हें निलंबित कर दिया गया है और नोटिस जारी कर पार्टी ने उनसे 15 दिनों में सफाई पेश करने को भी कहा है.

 

क्या है मामला?
दरअसल कीर्ति आजाद ने पिछले रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था कि दिल्ली जिला क्रिकेट एसोसिएशन में 14 फर्जी कंपनियों के जरिए घोटाला किया गया है. उन्होंने डीडीसीए घोटाले की सीबीआई जांच की मांग भी की है. दरअसल 1999 से लेकर 2013 तक अरुण जेटली ही डीडीसीए के अध्यक्ष रहे हैं. यही वजह है कि कीर्ति आजाद संसद के अंदर भी केंद्रीय मंत्री जेटली का नाम लिए बिना उन पर निशाना साध चुके हैं.

 

जेटली पर क्या हैं आरोप?
कीर्ति आजाद और केजरीवाल के मुताबिक जब अरुण जेटली DDCA यानी दिल्ली डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष थे तो उसमें घोटाला हुआ था. आरोप है कि स्टेडियम निर्माण में 57 करोड़ के ठेके फर्जी कंपनियों को दिए गए. आम आदमी पार्टी के नेताओं ने कहा कि जेटली के प्रेसिडेंट रहने के दौरान डीडीसीए ने 24 करोड़ की लागत वाला स्टेडियम 114 करोड़ रुपए में बनवाया. 90 करोड़ रुपए कहां खर्च कर दिए? डीडीसीए में भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री केजरीवाल सरकार ने सोमवार को पूर्व सॉलीसिटर जनरल गोपाल सुब्रह्मण्यम के नेतृत्व में जांच आयोग भी बना दिया है. जिसके बाद ये सवाल भी उठे कि केजरीवाल को ये जांच कराने का अधिकार है या नहीं.

अब आगे डीडीसीए विवाद की गहराई में उतरने से पहले ये भी जान लीजिए की इस विवाद की शुरुआत कैसे हुई थी. दरअसल 15 दिसंबर को सीबीआई ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार के दफ्तर पर छापा मारा था. सीबीआई को शिकायत मिली थी कि बीते पांच साल से राजेंद्र कुमार जहां भी रहे प्राइवेट कंपनियों को फायदा पहुंचाते रहे. सीबीआई ने राजेंद्र कुमार के खिलाफ केस दर्ज कर लिया और उनके भ्रष्टाचार के मामले में फंसने के बाद से ही केजरीवाल और उनकी पार्टी ने अरुण जेटली को निशाना बनाना शुरु कर दिया था. आम आदमी पार्टी ने डीडीसीए में भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए दिल्ली के फिरोजशाह कोटला स्टेडियम पर हुए खर्च का सवाल भी उठाया. जिसका अरुण जेटली ने भी जवाब दिया.

आम आदमी पार्टी ने अपने आरोपों का आधार पहले से की गई 3 जांचों को बनाया है. इनमें से पहली डीडीसीए की अंतरिम जांच है, दूसरी दिल्ली हाई कोर्ट की तरफ से नियुक्त किए गए पैनल की जांच है और तीसरी कॉरपोरेट मिनिस्ट्री के एसएफआईओ यानी Serious Fraud Investigation Office की रिपोर्ट है. लेकिन अपने उपर लगे इन तमाम आरोपो का जवाब देते हुए अरुण जेटली ने अपने ब्लॉग में लिखा कि –

अरूण जेटली का ब्लॉग
2013 से ही मैं क्रिकेट प्रशासन से अलग हो चुका हूं. संसद के एक सदस्य ने कई सरकारी संस्थाओं को दिल्ली क्रिकेट मामलों पर लिखा. यूपीए सरकार ने इस शिकायत को SFIO को भेज दिया, जिसने पूरे मामले की जांच की और 21 मार्च 2013 को इस मामले पर विस्तृत रिपोर्ट पेश की. इस रिपोर्ट में लिखा गया-
‘इस तरह से, यह एक छोटा सा मामला है, क्योंकि इसमें बस कुछ अनियमितताएं ही मिली जो तकनीकी उल्लंघन है. कोई भी फ्रॉड नहीं मिला, जैसा कि दावा किया जा रहा था.’
SFIO ने यूपीए सरकार के शासन के वक्त, इस मामले की जांच की और उसे मेरे खिलाफ एक सबूत नहीं मिला. जो तकनीकी खामियां थी भी वह समाधान कर लेने वाली थी. मेरे ऊपर आज तक कोई निजी आरोप नहीं लगा और न ही मैंने कभी किसी तरह के खंडन की जरूरत को महसूस किया.
डीडीसीए को लेकर कई आरोप हैं जिसमें स्टेडियम के निर्माण खर्च में बढ़ोतरी का भी एक मामला है. जब काम बढ़ता है, खर्च भी उससे जुड़ा होता है. पब्लिक सेक्टर की कंपनी EPIL 42,000 की क्षमता वाला ब्रैंड न्यू स्टेडियम बनाती है और इसके लिए 114 करोड़ रुपए खर्च होते हैं. इसी वक्त यूपीए सरकार दो स्टेडियम को नए सिरे से बनाती है. इसमें जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम पर 900 करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं और ध्यान चंद स्टेडियम का निर्माण 600 करोड़ रुपए में होता है.
मुझे खुद पर लगाए गए अप्रमाणित आरोपों का जवाब देने की जरूरत महसूस हुई इसलिए मैंने यह लिखा. मैंने क्रिकेट प्रशासन 2013 में छोड़ दिया था. 2014 और 2015 के फैक्ट्स का उल्लेख कर वह (केजरीवाल) मुझपर आरोप नहीं लगा सकते.’ –

हालांकि अरुण जेटली की सफाई के बाद भी आम आदमी पार्टी इस मामले पर जेटली को घेरने में लगी रही. गौरतलब ये है कि इसके बाद डीडीसीए के कथित घोटाले को लेकर आम आदमी पार्टी और बीजेपी की जंग बढ़ती चली गई लेकिन इन सबके बीच अरविंद केजरीवाल के प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार के भ्रष्टाचार का मामला पीछे छूटता चला गया. और इन आरोप-प्रत्यारोप के बीच विरोधी दल ही नहीं बल्कि जेटली की पार्टी बीजेपी के सांसद कीर्ति आजाद ने भी उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया.

रविवार को पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की अपील को दरकिनार करते हुए कीर्ति आजाद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और विकीलीक्स 4 इंडिया और सनस्टार नेशनल हिंदी अखबार के एक स्टिंग की सीडी जारी कर डीडीसीए पर गंभीर आरोपों के बाउंसर फेंके. इस सीडी में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला स्टेडियम में हुई अनियमितताओं की पोल खोलने का दावा किया गया है. स्टिंग में दावा किया गया है कि दिल्ली एंड डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन यानी डीडीसीए ने जो टेंडर बांटे उनमें ना सिर्फ नियमों को ताक पर रखा गया बल्कि इसमें फर्जीवाड़े का एक बड़ा रैकेट भी काम कर रहा था.

मसलन जो लैपटॉप 20 हजार रुपये में बाजार में नया मिल जाता है, उसी लैपटॉप को 16 हजार 900 रुपये में एक दिन के किराए पर लिया गया. इसी तरह प्रिंटर के लिए 3 हजार रुपये रोजाना का किराया दिया गया जबकि नया प्रिंटर 4 हजार से 5 हजार रुपये के बीच आ जाता है. एक पूजा की थाली के लिए 5 हजार रुपये किराया दिया गया.

आरोप लगाया गया है कि डीडीसीए में फर्जीवाड़े की इससे भी बड़ी पिच तैयार की गई थी जिसमें 14 कंपनियां बैटिंग कर रही थीं. डीडीसीए ने इन 14 कंपनियों को करोड़ों रुपये का भुगतान किया था. आरोपों के मुताबिक इन 14 कंपनियों के पते फर्जी थे. आरोप ये भी हैं कि डीडीसीए ने कुछ कंपनियों को चेक या डिमांड ड्राफ्ट की बजाए कैश में भुगतान कर दिया. जो कि नियमों के खिलाफ है.

बीजेपी के निलंबित सांसद कीर्ति आजाद ने कहा कि फर्जी कंपनियां थी जिनका एड्रेस हमें नहीं मिला जिन्हें करोडों रुपये दे दिए गए जिनका बैंक बैलेंस भी फर्जी था. जनरली जब कभी ऐसे बिल किसी कंपनी मे जाते हैं. तो आडिटेड अकाउंट से पहले एडजक्टिटिव की मीटिंग होती है. और बिल को देखा जाता है कौन सा सही है या गलत है. कौन सा पास हो सकता है लेकिन ये बिल पास हई.

बीजेपी सांसद कीर्ति आजाद की इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस को अनुशासनहीनता मानते हुए पार्टी ने उनके खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की है लेकिन अब इस पूरे विवाद में कीर्ति के बहाने विरोधियों को नरेंद्र मोदी सरकार पर हमले का नया हथियार भी मिल गया है. आखिर कैसे डीडीसीए विवाद को लेकर चली जा रही हैं शह और मात की चाल और कैसे प्रधानमंत्री मोदी कर रहे हैं जेटली का बचाव. इन सभी बातों की पड़ताल भी हम करेंगे आगे लेकिन उससे पहले देखिए इस विवाद पर कैसे छिड़ा है राजनीतिक संग्राम.

कथित कोटला स्टेडियम घोटाले पर मचे इस संग्राम के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वो बयान भी किसी बाउंसर की तरह आया जिसमें उन्होंने अरुण जेटली को लेकर अपना समर्थन दिखाया है लेकिन मोदी के इस बाउंसर पर कैसे विरोधियों ने छक्का जमा दिया ये भी हम आपको बताएंगे आगे लेकिन उससे पहले देखिए ये कहानी अरुण जेटली की.

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने छात्र राजनीति के जरिए सियासत की दुनिया में अपना पहला कदम रखा था. 1975 में उन्होंने अखिल भारतीय विद्धार्थी परिषद यानी एबीवीपी के बैनर तले दिल्ली यूनीवर्सिटी छात्र संघ का चुनाव लड़ा और वो डूसू के अध्यक्ष भी चुने गए थे. छात्र संघ का ये चुनाव अरुण जेटली की राजनीति का पहला अहम पड़ाव था क्योंकि जब 1974 में देश में आपातकाल का ऐलान हुआ था तब उस जमाने की बीजेपी यानी जनसंघ के सभी नेताओं को जेल में ठूंस दिया गया था जिनमें अरुण जेटली भी शामिल थे.

वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र कपूर ने कहा कि क्योंकि वो दिल्ली युनिवर्सिटी छात्र संघ के अध्यक्ष थे और जब आपातकाल लगा तो उन्हें पकड़ लिया गया औऱ ये बहुत कवरेज की बात लगी कि उनके जो कुछ साथी थे जो दिल्ली विद्यार्थी परिषद के उस वक्त अध्यक्ष थे वो बाद में पत्रकार भी बनें वो तो माफी मांग गए पर जेटली साहब 19 महीनें जेल में रहे आपातकाल के दौरान और उसके बाद ब़ड़ा स्वाभाविक था कि राजनीति में आते लेकिन लोगों को इतना नहीं पता है 77 के बाद जो आपातकाल के बाद चुनाव हुए थे तो उस वक्त जनसंघ थी तो उनको लोकसभा चुनाव के लिए टिकट ऑफर करी गई थी परंतु 6-8 महीनें कम थे 25 साल से तो इस वजह से 75 का लोकसभा का चुनाव लड़ नहीं पाए.

अपने तेज तर्रार रुख और जोशीले भाषण के लिए पहचाने जाने वाले वित्त मंत्री अऱुण जेटली राज्यसभा में सदन के नेता है लेकिन राजनेता के साथ – साथ उनका नाम देश के मशहूर वकीलों में भी शुमार किया जाता है. जेटली को वकालत का पेशा विरासत में मिला है क्योंकि उनके पिता महाराज किशन जेटली भी अपने जमाने के जाने माने वकील थे और वो जम्मू कश्मीर सरकार में वित्तमंत्री भी रहे हैं. खास बात ये है कि जहां जेटली ने बीजेपी का दामन थामा वही उनके पिता कांग्रेस के टिकट पर सांसद भी बने थे.

वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र कपूर ने कहा कि उनके पिता जी जो हैं डोगरा साहब वो जम्मू कश्मीर के वित्त मंत्री रहे कांग्रेस के टिकट से 2-3 दफा लोकसभा के सदस्य भी रहे परंतु ये कहना कि पत्नी कांग्रेस में थी बिल्कुल तालमेल है कोई राजनीतिक भाव नहीं है और वो जब शादी हुई थी तब भी डोगरा जी कांग्रेस में थे सारी उम्र डोगरा जी कांग्रेस में रहे हैं पर उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है दो बच्चे हैं दोनो वकील हो गए हैं अभी एक लड़की की शादी करी टोटली डिवोटेड फादर डिवोटेड हसबैंड और मैं कह सकता हूं कि फैमिली को उन्होंने जितनी इंपोर्टेश देनी चाहिए बहुत इंपोर्टेंस दी है और फैमिली का उनके जिवन में बहुत महत्व है.

अरुण जेटली का जन्म 28 दिसंबर 1952 को हुआ था. नई दिल्ली के नारायणा विहार इलाके में उनका बचपन बीता है और दिल्ली के सेंट जेवियर स्कूल से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से कॉमर्स की डिग्री भी हासिल की थी. अपने परिवार की विरासत को आगे बढ़ाते हुए जेटली ने भी 1973 में वकालत की पढ़ाई के लिए दिल्ली यूनीवर्सिटी में दाखिला ले लिया था. इसी साल उन्होंने जयप्रकाश नारायण द्वारा चलाए गए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में हिस्सा भी लिया और 1974 में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव जीत कर इसके अध्यक्ष भी बने लेकिन जेटली की वकालत की पढ़ाई को उस वक्त ब्रेक लग गए थे जब उन्हें आपातकाल के दौरान 19 महीनों तक जेल में रहना पड़ा था.

आपातकाल खत्म होने के बाद जेटली भी जेल से रिहा हो गए. उन्होंने वकालत की अपनी पढ़ाई पूरी की और फिर 1977 में हाईकोर्ट में वकालत करने लगे थे. अऱुण जेटली ने देश के कई हाईकोर्ट में प्रैक्टिस की है और 1990 में जब सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील के तौर पर उन्होंने वकालत शुरु की तो अपनी काबलियत के दम पर जल्द ही देश के चुनिंदा वकीलों में शुमार होने लगे और यही वजह भी थी कि 1989 में वी पी सिंह की सरकार में उन्हें अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किया गया था. जेटली ने मशहूर बोफोर्स घोटाले में पेपरवर्क में अपना योगदान दिया था. वकालत के साथ वो राजनीति में भी सक्रिय बने रहे. 1991 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली थी जिसके बाद हुए 1999 के आम चुनाव में वो पहली बार बीजेपी के प्रवक्ता भी बनाए गए थे और जब केंद्र में बीजेपी की सरकार बनी तो अरुण जेटली को सूचना और प्रसारण मंत्रालय के स्वतंत्र प्रभार का जिम्मा सौंपा गया था.

वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र कपूर ने कहा कि उनके पिताजी भी वकील थे उनके अंकल भी वकील थे और परिवार में काफी लोग वकील थे अब उनकी बेटा और बेटी दोनों वकील है अभी चालू किया है प्रोफेशन में बच्चे हैं परंतु वो प्रोफेशनल बैकग्राउंड से आते हैं तो उन्होंने अपनी जिम्मेदारी निभाई अपने फाइनेंनशिएल बेस को मजबूत किया और राजनीति में इंटरेस्ट तब भी लेते थे जब वो देश के टॉप वकील थे तब भी राजनीति में बीजेपी में एक्टिव थे और फिर जब वीपी सिंह की सरकार बनी तो एडिश्नल सॉलिडसीटर जनरल बन गए तो इस तरीके से धीरे धीरे वो आगे राजनीति में भी बढ़े औऱ फिर जब मंत्री बने तो फिर उन्होंने प्रैक्टिस छोड़ दी और उसके बाद लीडर ऑफ ओपोजिशन राज्यसभा में आ गए.

अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में जेटली विनिवेश, कानून और कंपनी अफेयर के मंत्री भी रह चुके हैं. 2000 के लोकसभा चुनाव के बाद उन्हें शिपिंग मंत्रालय की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी लेकिन 2004 के लोकसभा चुनाव में जब बीजेपी की हार के बाद वो अपने पुराने वकालत के पेशे में लौट आए थे. अरुण जेटली को एक बैक डोर पॉलीटिशियन माना जाता है और उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबियों में शुमार किया जाता है. साल 2006 में भी जब वो गुजरात से राज्यसभा सदस्य चुने गए थे उस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी हुआ करते थे.

वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र कपूर ने कहा कि पीएम मोदी उनपर ट्रस्ट करते हैं नहीं तो जरूरी नहीं है कि वो भी वित्त मंत्री रहते तो इसलिए प्रधानमंत्री के साथ आज से नहीं जब से मोदी जी यहां से वाजपेयी जी के टाइम से यहां पर पहले जनरल सेक्रेटरी थे गुजारत में सीएम बनने से पहले तबसे उनके संबंध है. मोदी जब दिल्ली में यहां पर जनरल सेक्रेटरी थे तब जेटली की जो स्थिती थी इंफैक्ट जेटली साहब का कद मोदी से आगे था ऐसा होता है राजनीति में होता है और तब से उनकी मित्रता है कुलिग रहें हैं दोस्ती बढ़ती चली गई एक दूसरे को मदद करते हैं एडवाइज देते हैं फिर वकील हैं वकील के नाते..क्योंकि मोदी के पीछे भी तो 10 साल तक यूपीए लगी रही कहीं से ईंट उठाओ पत्थर उठाओ मोदी पर मारो तो उसको रोकने के लिए जो लीगल लड़ाई लड़ी गई उसमें अरुण जेटली का बहुत बड़ा हाथ है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अरुण जेटली के संबंध पुराने बताए जाते हैं. यही वजह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में विजय होने के बाद जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो अरुण जेटली को ना सिर्फ वित्त मंत्रालय जैसा विभाग मिला बल्कि सरकार के अहम फैसलों में भी उनकी छाप साफ नजर आई है. मोदी के साथ जेटली की जुगलबंदी से साफ जाहिर है कि जब जेटली पर कथित डीडीसीए घोटाला में चारों तरफ से आरोपों की बौछार होने लगी तो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मैदान में मोर्चा संभाल लिया. कथित कोटला स्टेडियम घोटाले में जेटली के समर्थन में प्रधानमंत्री मोदी का वो बयान किसी बाउंसर की तरह आया जिसमें उन्होंने जेटली को लेकर अपना समर्थन दिखाया था लेकिन मोदी के इस बाउंसर पर कांग्रेस पार्टी ने भी छक्का जमा दिया. दरअसल बीजेपी संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने ये कहा कि उन्हें उम्मीद है कि जेटली भी आडवाणी की तरह बेदाग निकलेंगे.

जिस तरह से हवाला केस में लालकृष्ण आडवाणी विजयी हुए थे. उसी तरह से डीडीसीए मामले में जेटली विजयी बनेंगे.-

पीएम के इस बयान की खबर मिलते ही कांग्रेस ने भी बीजेपी की दुखती रग पर हाथ रखते हुए फौरन ये सवाल उठा दिया कि हवाला केस में आरोप लगते ही लालकृष्ण आडवाणी ने इस्तीफा दिया था, तो क्या अब जेटली भी इस्तीफा देंगे ?
पीएम ने जेटली की तुलना आडवाणी से की है . 1996 में हवाला केस में आडवाणी ने संसद से इस्तीफा दे दिया था और तबतक चुनाव नहीं लड़े जबतक वो बरी नहीं हुए. क्या पीएम जेटली से यही चाह रहे हैं ?

गौरतलब है कि 90 के दशक में हवाला कांड बहुत चर्चित हुआ था. हवाला कांड विदेशी पैसे के अवैध लेन देने से जुड़ा मामला था. दरअसल इस केस की जांच सीबीआई जांच ने की थी और जांच के दौरान इस मामले में जैन बंधुओं के पास से एक डायरी बरामद की गई थी जिसमें बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी और शरद यादव सहित कई पार्टियों के नेताओं के नाम दर्ज थे. जब लालकृष्ण आडवाणी का नाम हवाला कांड में सामने आया था तब वो लोकसभा सांसद थे और उन्होंने हवाला कांड में नाम आते ही संसद से इस्तीफा दे दिया था.

वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र कपूर ने कहा कि आडवाणी जी का इतना लंबा जीवन है राजनीति में किसी ने एक पैसे उनके दुश्मनों ने ये उंगली नही उठायी सही है यो आप देख लीजिए अब हमाला में एक चार्ज लगा है किसी ने एक डायरी में लिख दिया ऐसे नेता आडवाणी जी जैसे नेता उम पर भी दाह लग गया था तो इन पर लग गया तो मैं यही कहूंगा की इनका भी कद बढ़ गया पार्टी के अंदर भी और पार्टी के बाहर भी अब उसके ट्विस्ट दे दीजिए कि आड़वाणी जी ने कहा कि मैं छोड रहा ऐसा नही कि आप सब चाहें कि जेटली को भी बडी प्रसन्नता होगी ठीक है छोड दें आदमी को सबसे ज्यादा प्यारी है अपनी रेप्यूटेशन और होनी भी चाहिए और जो सड़क छाप लोग जो आरोप लगा रहे. उनकी अपनी क्या औकात है?

अरुण जेटली पर केजरीवाल ने कोटला स्टडेयिम में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया तो वहीं जेटली ने भी उन पर पलटवार करते हुए उन्हें खिलाफ कोर्ट में मानहानी का मुकद्दमा ठोंक दिया है. उधर हॉकी संघ के पूर्व अध्यक्ष के पीएस गिल ने भी अरुण जेटली पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए है तो दूसरी तरफ उनकी ही पार्टी के सांसद कीर्ति आजाद ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. फिलहाल कार्ति आजाद को पार्टी से निलंबित कर दिया गया है लेकिन बीजेपी मार्गदर्शक मंडल के आजाद का समर्थन करने से जेटली की मुश्किल बढ गई है. हांलाकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने खुले तौर पर जेटली का पक्ष लिया है लेकिन विपक्ष के तीखे तेवरों और अपनों के तीखे प्रहारों के चलते फिलहाल राजनीतिक चक्रव्यूह में फंस गए है अरुण जेटली.

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