....और वो अमेरिका पहुंच गया !

By: | Last Updated: Tuesday, 4 March 2014 2:54 PM
….और वो अमेरिका पहुंच गया !

नई दिल्ली: ये किसी से छिपा नहीं है कि भारत के लोग अमेरिका जाने और वहां बसने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं. इसमें भी कुछ लोग तो ऐसे हैं, जो अमेरिका पहुंचने के लिए गैर-कानूनी रास्ते भी अपनाने के लिए तैयार रहते हैं. ये  घटना एक ऐसे ही भारतीय रामशंकर (नाम परिवर्तित) की है, जिसने बिल्कुल फिल्मी अंदाज में तमाम आफतें मोल लेते हुए छिप-छिपाकर नई दिल्ली से न्यूजर्सी तक का सफर तय किया.

 

रामशंकर की ये अनोखी कहानी सोशल नेटवर्किंग साइट पर खुद उसी की जबानी मौजूद है- ‘मैंने अमेरिका जाने के लिए नई दिल्ली में सारे कानूनी विकल्प ट्राई किए, लेकिन उसमें सफलता नहीं मिली. इसके बाद मैंने पंजाब के एक एजेंट से बात की और वो मुझे अमेरिका पहुंचाने के लिए तैयार हो गया.’

 

सबसे पहले उसने मेरे लिए मेक्सिको का वीजा करवाया. आमतौर पर अमेरिका का वीजा केंसिल हो जाने के बाद मेक्सिको का वीजा भी आसानी से नहीं मिलता. इसलिए एजेंट ने इसके लिए भी लंबी सेटिंग की.

 

मेक्सिको के वीजा के लिए एजेंट ने मेरी फाइल किसी साउथ इंडियन एजेंट को दी. उसने मेरी फाइल का मुआयना किया और इसके बाद मेरी नकली प्रोफाइल क्रिएट की. इस नकली प्रोफाइल के आधार पर अब मैं साउथ की फिल्म इंडस्ट्री का सदस्य था.

 

साउथ की फिल्म इंडस्ट्री के आर्टिस्ट के रूप में मेरे वीजा की प्रोसेसिंग की गई और मुझे साल्वाडोर का वीजा मिल गया. तय योजना के मुताबिक मैं एक निश्चित तारीख पर साउथ की एक फिल्म युनिट मेंबर के रूप में फ्लाइट में बैठा. फिल्म युनिट मेंबर्स के रूप में इस समय फ्लाइट में 49 यात्री थे. फ्लाइट में ये देख मैं खुद हैरान रह गया कि इनमें से 22 लोग मेरी ही तरह मेक्सिको से गैरकानूनी तरीके से अमेरिका में दाखिल होने के लिए जा रहे थे.

 

अल-साल्वाडोर के लिमापे शहर पहुंचने के बाद मुझे अमेरिका जाने वाले अन्य लोगों के साथ एक ट्रक में छिपाकर मेक्सिको ले जाया गया. मेक्सिको में हमें अमेरिकी बॉर्डर के नजदीक एक गांव में ठहराया गया. यहां पहुंचने के बाद हमें अपने एजेंट को एक तय रकम चुकानी थी. मेरे पास उतने पैसे नहीं थे, जितने एजेंट मांग रहा था, इसलिए उससे सौदेबाजी करने में मुझे देर हो गई. इस तरह मुझे 2-3 महीने मेक्सिको के उसी गांव में रुकना पड़ा. यहां मैंने मक्के की रोटी और आलू जैसी कोई सब्जी खाकर दिन गुजारे. अब तक मेरे पास पैसों का जुगाड़ हो गया था, ये बात और है कि इसके लिए मुझे कुछ उल्टे-सीधे काम भी करने पड़े.

 

हमारे जैसे लोगों को दो-तीन की टीम में मेक्सिको से अमेरिका की सरहद पार करवाई जाती है. मुझे जब मालूम चला कि इस तरह से गैरकानूनी रूप से सरहद पार करने वालों पर अमेरिकी सेना गोलियां भी बरसा देती है, तो मेरी सांस मानो हलक में अटक गई. लेकिन अब भाग्य के सहारे आगेबढ़ने के अलावा मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था.

 

सरहद पार कराने से पहले मेरे एजेंट ने जांच की कि दोनों तरफ का माहौल कैसा है?  अमेरिका की तरफ सेना की चहलकदमी ज्यादा थी, इसलिए हम चार दिन तक यूएस की बॉर्डर दीवार के पास ही रुके रहे.

 

आखिरकार पांचवें दिन एजेंट ने हमें बॉर्डर क्रॉस करवाने का फैसला लिया. बॉर्डर क्रॉस करवाते वक्त हमारे साथ एक पंजाबी एजेंट था. भारतीय मूल का व्यक्ति देखकर मुझे थोड़ी राहत मिली. मैंने उस पर भरोसा करके अपना पासपोर्ट उसे दे दिया और कहा कि ये पासपोर्ट वो भारत में मेरे घर पहुंचा दे.

 

अब हम लोगों को बॉर्डर क्रॉस करनी थी. मेक्सिको और यूएस की बॉर्डर के बीच की ये दीवार करीब 50 फीट ऊंची थी. मेक्सिको बॉर्डर पर एक सीढ़ी लगाकर हमें दीवार पर चढ़ा दिया गया था. अब हमें दूसरी तरफ कूदना था. ऊंचाई देखकर हममें से किसी की भी कूदने की हिम्मत नहीं हो रही थी. लेकिन जैसे-तैसे एक-कर हम सभी लोग उस पार कूद गए. अब हम अमेरिका की धरती पर थे. इसके बाद हम छिपते-छिपाते एक जंगल में पहुंचे. यहां एक जगह एजेंट ने हमें छिपा दिया और कहा कि कुछ समय यहीं पर छिपे रहो.

 

उस जंगल में हम और लोगों के साथ तीन-चार दिन तक एक केबिन में छिपे रहे. यहां भी हमारे एजेंट की सेटिंग थी. वो किसी जगह से हमारे लिए खाने-पीने का सामान ले आया करता था. एजेंट जब भी खाने-पीने का सामाना लाता तो यही कहता कि छिपे रहना और किसी को भी नजर मत आना. वैसे भी ये इलाका इतना दुर्गम था कि यहां इंसानों की आवाजाही नहीं थी. इसी बीच एजेंट ने हमें जानकारी दी कि पुलिस यहां छानबीन कर रही है. उसने तुरंत हमें हाईवे पर ले जाकर एक ट्रक तक पहुंचाया और फिर हम ट्रक से एक मोटल पहुंचे. वो मोटल एक गुजराती का था. अपने देश के लोगों को देख मेरी जान में जान आई.

 

हम अमेरिका तो पहुंच गए थे, लेकिन अब भी ऐसे इलाके में थे, जहां चेकिंग बड़ी सख्त थी. अब भी हमारे पकड़े जाने का पूरा खतरा था. हमारे मोटल के गुजराती मालिक को पता था कि हम गैरकानूनी तरीके से अमेरिका में दाखिल हो रहे हैं. दरअसल वो भी हमारे एजेंट के नेटवर्क का एक हिस्सा था.

 

उस गुजराती ने देखभाल की ऐवज में हरेक व्यक्ति से 4 हजार डॉलर की मांग की. बॉर्डर क्रॉस करते समय कोई भी अपने साथ इतनी नगदी ले कर नहीं चलता. इसलिए पैसों का इंतजाम करने के चक्कर में हमें कुछ दिन तक मोटल में ही रुकना पड़ा.

 

हमने फिर एजेंट से बात की और एजेंट ने मोटल मालिक से सौदेबाजी कर पूरा मामला 2-2 हजार डॉलर में निपटा लिया. अब हम लोगों को यहां से आगे ले जाने की जिम्मेदारी एक मेक्सिकन एजेंट की थी. उससे गुजराती ने हमारी मुलाकात अपने मोटल में ही कराई. उसने हमसे कहा कि एक कार की व्यवस्था कर वह कुछ देर बाद हम लोगों को यहां से ले जाएगा.

 

लेकिन अमेरिकन हाईवे पर उस मेक्सिकन को देखते ही पेट्रोलिंग टीम सतर्क हो गई और उसे पकड़ लिया गया. इससे पहले भी वो मेक्सिकन ह्युमन ट्रैफिकिंग के मामले में पकड़ा जा चुका था. उसने पुलिस को सब कुछ बता दिया. मेक्सिकन से जानकारी मिलते ही पुलिस की टीम ने हाईवे पर मौजूद सभी होटल्स और मोटल्स की छानबीन शुरू कर दी. थोड़ी ही देर में पुलिस हम तक पहुंच गई और हमें अपनी पिस्तौल दिखाते हुए पूछा, ‘कौन हो तुम लोग?’

 

 ‘मैंने सोचा कि अपनी पहचान छिपाने के लिए कोई बहाना बना दूं, लेकिन तभी मैंने सोचा कि कहीं पुलिसवाले मुझे आतंकवादी न समझ बैठें. इसलिए मैंने उन्हें बता दिया कि मैं इंडियन हूं और मेरे पास अमेरिका आने का वीजा या अन्य डॉक्युमेंट्स नहीं है. पुलिस मुझे पकड़कर टेक्सास की जेल में ले गई. लेकिन यहां जेल में जगह नहीं थी, इसलिए मुझे न्यूजर्सी की जेल ले जाया गया.’

 

कई प्रोसिजर्स और प्रोसेस में लगभग दो महीनों का समय निकल गया. इस दौरान मैं न्यूजर्सी की जेल में ही रहा. इसके बाद मेरा फाइनल इंटेरोगेशन सेशन हुआ.

ऑफिसर ने मुझसे पूछा, अगर तुम्हें डिपोर्ट किया जाए, तो क्या करोगे? तब मैंने कहा, ‘भारत में मेरी जान को खतरा है. मैं वहां से सबकुछ बेचकर आया हूं. अब मैं आत्महत्या कर लूंगा.’ इसके बाद मुझे जज के सामने पेश किया गया, जहां मेरे केस की सुनवाई हुई.

 

मेरी सारी दलीलें सुनने के बाद वहां के जज ने एक हैरतअंगेज फैसला सुनाते हुए आदेश दिया कि मुझे एक साल अमेरिका में गुजारने के लिए वीजा दे दिया जाए. इस वीजा के तहत मैं एक साल तक अमेरिका में कहीं भी आजादी से घूम-फिर और काम कर सकता था.

 

रामशंकर 6 महीने से अमेरिका में ही रह रहा है. वो न्यूजर्सी के एक मॉल में नौकरी करता है. रामशंकर को उम्मीद है कि एक साल तक अमेरिका के कानूनों का पालन करने पर उसे अमेरिका में और कुछ सालों तक रहने की इजाजत मिल जाएगी.

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