डेढ़ इश्क़िया फिल्म इश्क़िया से डेढ़ गुना ज्यादा बेहतर, खालूजान के साथ थोड़ा सा शायराना हो जाएं (साढ़े तीन स्टार)

By: | Last Updated: Friday, 10 January 2014 3:17 AM

रेटिंग-साढ़े तीन स्टार

सबसे पहले सबसे ज़रूरी बात- अभिषेक चौबे की डेढ़ इश्क़िया, 2010 की उनकी फिल्म इश्क़िया से डेढ़ गुना ज्यादा बेहतर, मनोरंजक और बेहद शायराना है. ऐसे सीक्वल कम होते हैं जो अपनी पिछली फिल्म से आगे निकल जाते हैं. डेढ़ इश्क़िया इनमें से एक है.

 

कहानी

कहानी पिछली फिल्म से आगे बढ़ती है. खालूजान (नसीरुद्दीन शाह), बब्बन (अरशद वारसी) को छोड़ कर उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर महमूदाबाद पहुंच गए हैं. यहां उनकी मुलाक़ात ख़ूबसूरत बेगम पारा (माधुरी दीक्षित-नेने) से होती है जिनके पति की मौत हो चुकी है.

 

बेगम पारा को दरअसल अपने लिए एक हमसफ़र की तलाश है और इसके लिए वो एक अजीबोग़रीब स्वयंवर करवा रही हैं. इस स्वयंवर में उनसे शादी की ख़्वाहिश लिए बड़े-बड़े नवाब आए हैं. जो सबसे अच्छी शायरी करेगा, बेगम उसकी हो जाएंगी.

 

खालूजान भी नवाब बनकर महल में दाख़िल होते हैं. इरादा तो महल को लूटकर भागने का है. लेकिन दिलफेंक खालूजान को बेगम पारा से इश्क़ हो जाता है. बब्बन को जब खालूजान की खबर मिलती है तो वो भी बेगम के महल में आ जाता है. यहां बब्बन को बेगम पारा की वफ़ादार मुनिया (हुमा क़ुरैशी) से प्यार हो जाता है.

 

मगर ख़ालूजान और बब्बन के प्लान के बीच में है जान मोहम्मद (विजय राज़). जान मोहम्मद ने एक शायर (मनोज पाहवा) को किडनैप कर लिया और उसी से शायरी सीख-सीख कर, वो खालूजान की शायरी का मुक़ाबला करता है. मगर इस पूरी महफिल और स्वयंवर के पीछे है एक साज़िश है जो इश्क में डूबे खालूजान और बब्बन को समझ में नहीं आती.

 

आख़िर में जब राज़ खुलता है तो वो सन्न रह जाते हैं. फिल्म में कई ट्विस्ट हैं जो बेहद मनोरंजक हैं. दाराब फारूक़ी की कहानी नई है और इसका ट्रीटमेंट भी ज़ोरदार है. पिछली फिल्म इश्किया के डायलाग पर खूब तालियां बजी थीं, मगर विशाल भारद्वाज के लिखे डेढ़ इश्क़िया के डायलॉग तो और भी कमाल के हैं.

 

यही नहीं फिल्म में इस्तेमाल की गई शायरी को देश के सबसे बेहतरीन शायरों में से एक, डॉ बशीर बद्र ने लिखा है. ऐसे प्रयोग आजकल कम होते हैं. हिंदी सिनेमा से उर्दू ज़बान तकरीबन ख़त्म हो चुकी है. लेकिन यहां उसका बेहद खूबसूरती से इस्तेमाल किया गया है. नई पीढ़ी इस उम्दा शायरी को समझ सके इसके लिए कई जगह सब-टाइटल भी दिए गए हैं.

 

अभिनय

कलाकारों में नसीरुद्दीन शाह और अरशद वारसी फिल्म की जान हैं. जब एक के बाद एक पंचलाइन मारकर वो एक दूसरे से बात करते हैं तो चेहरे पर अपने आप मुस्कान आ जाती है. माधुरी दीक्षित कमाल की लगी हैं और सही मायने में ये उनकी कमबैक फिल्म है.

 

हुमा कुरैशी ने भी अपना रोल अच्छी तरह से निभाया है. लेकिन जो कलाकार इन शानदार एक्टर्स पर भी भारी पड़ गया है वो है विजय राज़. नसीरुद्दीन शाह और अरशद जैसे कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद, विजय राज़ जिस सीन में भी नज़र आए हैं, उसे उन्होंने अपने नाम कर लिया है. ये बेहद हैरानी की बात है कि उन जैसे अभिनेता के लिए बॉलीवुड में रोल क्यों नहीं लिखे जाते. छोटे से रोल में मनोज पाहवा भी काफी हंसाते हैं.  

 

निर्देशक ने बेतहरीन ढंग से एक्शन, कॉमेडी, रोमांस और व्यंग्य को बैलंस किया है. डेढ़ इश्किया अगर किसी बात में पिछली फिल्म इश्क़िया से कमज़ोर पड़ती है तो वो है फिल्म का संगीत. इश्क़िया में जहां इब्ने बतूता और दिल तो बच्चा है जी जैसे सुपर हिट गीत थे, यहां संगीत बेहद काम चलाऊ है. फिल्म में तो ये गीत ठीक-ठाक लगते हैं, मगर फिल्म के बाद याद नहीं रहते.

 

फिर भी डेढ़ इश्क़िया, इस साल की अच्छी फिल्मों गिनी जाएगी. तो इस वीकेंड, खालूजान के साथ थोड़ा सा शायराना हो जाएं…और थिएटर में जाकर डेढ़ इश्क़िया देख आएं.

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Web Title: डेढ़ इश्क़िया फिल्म इश्क़िया से डेढ़ गुना ज्यादा बेहतर, खालूजान के साथ थोड़ा सा शायराना हो जाएं (साढ़े तीन स्टार)
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