थोड़ा संभलकर चलिए, वरना फिसल जाएंगे ‘आप’

By: | Last Updated: Monday, 6 January 2014 6:37 AM
थोड़ा संभलकर चलिए, वरना फिसल जाएंगे ‘आप’

नई दिल्ली: दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद देश और दिल्ली को आम आदमी पार्टी से उम्मीदें बढ़ गईं. अचानक से केजरीवाल देश में नायक के रूप में उभरे, देश की मीडिया भी केजरीवालमय हो गई. चुनाव परिणाम के दिन से लेकर केजरीवाल के शपथग्रहण तक देशभर की मीडिया ने अरविंद केजरीवाल को एक ऐसे नायक के रूप में पेश किया कि जो आम आदमी की समस्याओं का समाधान कर सकता है. वो आम आदमी के बीच से आता है और आम आदमी की समस्याओं को समझता है.

 

आज देश में अरविंद केजरीवाल किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. केजरीवाल के कामकाज की शैली और आम आदमी पार्टी की विचारधारा ने निश्चित रूप से शहरी मतदाताओं को प्रभावित किया है. यही वजह है कि पिछले कुछ दिनों में कुछ खास लोग आम आदमी पार्टी में शामिल हुए हैं. दिल्ली, गुड़गांव, बैंगलोर, हैदराबाद, मुंबई, नोएडा में आम आदमी पार्टी की स्थिति निश्चित रूप से मजबूत हुई है.

 

शायद यही वजह है कि आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में देश की ज्यादातर लोकसभा सीटों पर लड़ने की घोषणा कर दी है. 15 से 20 राज्यों में आम आदमी पार्टी चुनाव लड़ने का मन बना चुकी है. लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर आम आदमी पार्टी को चुनाव लड़ने की इतनी हड़बड़ाहट क्यों है? अगर आम आदमी पार्टी यह सोच रही है कि जैसे एक साल में उन्होंने दिल्ली फतह कर लिया वैसे ही देश भी फतह कर लेंगे, जैसे दिल्ली की जनता ने भ्रष्टाचार से तंग आकर कांग्रेस और बीजेपी जैसे राष्ट्रीय दलों को नकारकर आम आदमी पार्टी को वोट दिया वैसे ही देशभर की जनता भी आम आदमी पार्टी को वोट करेगी तो यह पार्टी की सबसे बड़ी भूल होगी.

 

आम आदमी पार्टी 10 जनवरी से 26 जनवरी तक देशभर में सदस्यता अभियान चला रही है. इसके लिए लोग आनलाइन आवेदन कर सकते हैं. लेकिन सवाल यह है कि भारत में कुल 10 प्रतिशत के आस-पास इंटरनेट यूजर हैं जिसमें से अधिकांश सक्रिय भी नहीं हैं. ऐसे में आम जनता को पार्टी से जोड़ने का यह फार्मूला कितना फायदेमंद साबित होगा यह तो समय ही बताएगा. हां, इससे पढ़ी-लिखी शहरी आबादी जरूर प्रभावित हो सकती है, उनके लिए यह बेहतर विकल्प साबित होगा, इस भाग दौड़-भरी जिंदगी में कोई भी लाइन में नहीं लगना चाहता. उनके लिए आनलाइन रजिस्ट्रेशन एक बेहतर विकल्प है लेकिन उस 90 प्रतिशत आबादी का क्या होगा जो इंटरनेट का प्रयोग नहीं करती है. जिसमें से अधिकांश ग्रामीण आबादी है.

 

यानी की लोगों को पार्टी से जोड़ने का यह तरीका आम आदमी पार्टी को बीजेपी की तरह ही केवल शहरी पार्टी बना देगा. अगर एक बार आम आदमी पार्टी पर शहरी पार्टी का तमगा लग गया तो उससे बाहर आ पाना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा. इसका प्रत्यक्ष उदाहरण बीजेपी है, बीजेपी पर शुरुआत में ही शहरी पार्टी होने का तमगा लग गया और आज तक बीजेपी की लाख कोशिशों के बाद भी वो इस तमगे से बाहर नहीं आ सकी. बीजेपी केवल शहरी पार्टी ही बनकर रह गई. आम आदमी पार्टी को सोचना होगा कि उसका हश्र भी बीजेपी जैसा ही न हो.

 

पिछले कुछ दिनों में पार्टी से कुछ बड़े नाम जुड़े हैं. गुजरात से लेकर बैंगलोर तक लोगों ने पार्टी की सदस्यता ली है. पिछले दिनों अमेठी में भी कुमार विश्वास की अनुपस्थिति में लोगों ने झाड़ू यात्रा निकाली. लेकिन पार्टी को यह सोचना होगा की यह कौन लोग हैं. जो अचानक से सक्रिय हो गए हैं. समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता कमाल फारूकी केजरीवाल से मिलते हैं. पूर्व छात्र नेता और कांग्रेस नेता अल्का लांबा ने कांग्रेस छोड़कर आम आदमी पार्टी ज्वाइन कर ली. आखिर ये तमाम लोग तब कहां थे जब दिल्ली की सड़कों पर केजरीवाल अकेले झाड़ू लेकर पार्टी का प्रचार कर रहे थे. हो सकता है कि आज तमाम लोगों को आम आदमी पार्टी में एक बेहतर भारत का भविष्य दिखा हो लेकिन इस नवजात पार्टी में खुद का बेहतर राजनीतिक भविष्य भी इन तमाम लोगों को दिख रहा हो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है.

 

योगेंद्र यादव और गोपाल राय ने कहा कि लोग पार्टी से जुड़ना चाहते हैं. वो हमसे पूछ रहे हैं कि हम किस तरह से आम आदमी पार्टी से जुड़ सकते हैं. योगेंद्र यादव जी खुद एक बड़े राजनीतिक विश्लेषक हैं उन्हें यह बात समझनी चाहिए की आखिर पार्टी से जुड़ने की बात करने वाले यह कौन लोग हैं. उनकी खुद की राजनीतिक इच्छाएं क्या हैं ? उनकी खुद की सोच क्या है ? उनकी जमीनी पकड़ कितनी है ? आम जनता पर उनका प्रभाव कितना है ? भारत में प्रधानमंत्री का चुनाव अमेरिका में होने वाले राष्ट्रपति के चुनाव की तरह नहीं है जो केवल उम्मीदवार के नाम पर लड़े जाएं.

 

आम आदमी पार्टी के पास वर्तमान समय में केजरीवाल के नाम के सिवा कुछ भी नहीं है. ना तो उनके पास क्षेत्रिय स्तर पर कोई सांगठनिक ढांचा है और ना प्रदेश स्तर पर मजबूत नेतृत्व.

 

पार्टी ने कहा है कि वो लोकसभा की ज्यादा से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेगी. जाहिर है इसमें उत्तर भारत के ज्यादातर राज्य शामिल होंगे. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, बिहार, बंगाल भी शामिल होंगे. अब जरा सोचिए कि जातिगत राजनीति के केंद्र मुलायम सिंह, मायावती, लालू और पासवान की मजबूत जातिगत राजनीति की पकड़ को कमजोर करने के लिए आम आदमी पार्टी के पास कौन सा हथियार है? अगर पार्टी यह सोच रही है कि केवल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जंग जीत लेंगे तो बिहार और उत्तर प्रदेश के गांवों में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं है. यहां जाति मुद्दा है.

 

मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की बेदाग और अपनेपन की छवि का क्या आम आदमी पार्टी मुकाबला कर पाएगी ? बिहार में नीतीश के विकास के दावों को क्या पार्टी चुनौती दे पाएगी ? बंगाल में क्या ममता के लोगों से जमीनी जुड़ाव को क्या आम आदमी पार्टी चुनौती दे पाएगी.

 

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनवाने के प्रयास में लगे योग गुरू बाबा रामदेव का आम आदमी पार्टी क्या मुकाबला कर पाएगी ?

 

ऐसे तमाम सवाल है जिस पर पार्टी को फिर सोचना चाहिए. हो सकता है अगले लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी 300 से 350 सीटों पर चुनाव लड़े और  30 से 50 सीटों पर जीत भी हासिल कर ले लेकिन यह जीत आम आदमी पार्टी की नहीं होगी, यह जीत आम आदमी पार्टी के उन उम्मीदवारों की होगी जो अपने दम पर संसद में जीतकर आएंगे. जो केवल एक सहारे और बेदाग छवि के लिए पार्टी से चुनाव लड़ेंगे.

 

अच्छा होता कि आम आदमी पार्टी पहले दिल्ली में अच्छा काम करके दिखती और धीरे-धीरे देश में अपने सांगठनिक ढांचे को मजबूत करती. इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों में भाग लेती. लेकिन सीधे–सीधे देशभर में बीजेपी और कांग्रेस से दो–दो हाथ करने की मुद्रा में आने से पार्टी हड़बड़ाहट साफ दिख रही है. आज भले ही प्रधानमंत्री की रेस में मोदी, राहुल के साथ केजरीवाल की भी तुलना हो लेकिन पार्टी को भी समझना चाहिए की यह सिर्फ मीडिया में है. आम आदमी आज भी मोदी, राहुल, मुलायम, नीतीश, शिवराज, वसुंधरा, जयललिता, नवीन पटनायक, ममता बनर्जी, रमन सिंह से बाहर नहीं निकल पाया है. और ना अगले चार महीनों में निकल पाएगा.

 

आम आदमी पार्टी को अभी अति उत्साह में नहीं आना चाहिए. थोड़ा संभलकर चलना चाहिए वरना जल्दबाजी में फिसलने का डर ज्यादा रहता है.

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