दिल्ली में क्यों ढह जाएगा आप का किला ?

By: | Last Updated: Tuesday, 13 May 2014 3:47 PM

दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान आम आदमी पार्टी ने दिल्ली ही नहीं पूरे देश को हैरान कर दिया था. लेकिन चंद महीनों के अंदर ही ये पार्टी वापस जमीन पर पस्त पड़ी नजर आ रही है. 6 बड़े एग्जिट पोलों में से किसी में आम आदमी पार्टी को 2 से ज्यादा सीटें नहीं दी गई हैं. आम आदमी पार्टी की जिस तेजी से उभरी थी वह दिल्ली में सात में से सात हासिल करने की कोशिश में थी. दिल्ली-एनसीआर मिलाकर कर आम आदमी पार्टी कई लोकसभा सीटें हासिल करना चाह रही थी. लेकिन ऐसा कुछ हो नहीं पाएगा उसकी कई वजह हैं.

 

पहला – मोदी की लहर

 

आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में चुनाव जीता था तो केजरीवाल के नाम और तस्वीर के सहारे. उसे उम्मीद थी वही तस्वीर लोकसभा तक काम करेगी. पर दिल्ली विधानसभा चुनावों में आप ने जो रणनीति बनाई उसके मुताबिक उम्मीदवार कोई हो लेकिन हर सीट पर लड़ केजरीवाल ही रहे थे. वही काम लोकसभा में करने में बीजेपी कामयाब रही. हर वोट मोदी के नाम पर मांगा गया जिसका उसे फायदा मिला.

 

दूसरा – आप का समर्थन कम हुआ

 

27 मार्च (http://owl.li/wNmxC) को लिखे अपने लेख में मैंने विश्लेषण किया था कि आप का समर्थन घट रहा है और ये छिटक कर बीजेपी की तरफ जा रहा है. चुनावों तक आते-आते आम आदमी पार्टी का वोटबैंक कुछ छितर गया था. हालांकि मुस्लिमों में आप का समर्थन इसके बाद बढ़ा और कई जगह कांग्रेस की जगह थोक के भाव आम आदमी पार्टी को वोट दिया गया. लेकिन ये उस समर्थन से कम था जैसा दिल्ली विधानसभा चुनाव में दिल्ली ने आप को दिया था.

 

तीसरा – केजरीवाल दिल्ली से नहीं लड़े

 

2009 में बीजेपी ने यूपी के पूर्वांचल में बेहद खराब प्रदर्शन किया था. इस बार पूर्वांचल को सुधारने के लिए बीजेपी ने अपने सबसे मजबूत ब्रांड मोदी को वाराणसी से उतार दिया. उम्मीद थी कि मोदी का असर दूसरी सीटों पर भी असर पड़ेगा. मोदी के विरोध का चेहरा बनने की कोशिश में केजरीवाल दिल्ली छोड़ कर वाराणसी पहुंच गए. रणनीति के लिहाज से ये सबसे बड़ी गलती थी. केजरीवाल नई दिल्ली सीट से लड़ते तो उनके हारने के आसार बिल्कुल नहीं होते. जबकि उनके दिल्ली से लड़ने का असर दिल्ली की बाकी सीटों पर होता. इसी तरह मनीष सिसौदिया को विधायक ही रहने दिया गया जबकि लोकसभा चुनाव के बाद केजरीवाल सरकार के दोबारा बनने का कोई आसार नहीं था. मनीष सिसोदिया पूर्वी दिल्ली पर सबसे मजबूत कैंडिडेट होते. इसी तरह कुमार विश्वास को अमेठी की बजाए एनसीआर लाया गया होता तो उनके जीतने की संभावना कहीं ज्यादा थी. लेकिन ठोस रणनीति के अभाव में दिल्ली का किला कमजोर पड़ता गया.

 

चौथा – दिल्ली की उपेक्षा भारी पड़ी

 

आम आदमी पार्टी को दिल्ली में जो समर्थन मिला था उसे और मजबूत करने की जरूरत थी. दिल्ली और एनसीआर को मिलाकर दस से ज्यादा सीटें थीं जहां आम आदमी पार्टी दिल्ली की विधानसभा से भी बेहतर प्रदर्शन कर सकती थी. लेकिन आम आदमी पार्टी इन सीटों पर फोकस छोड़कर देश फतह करने निकल गई थी. इसके चलते दिल्ली उपेक्षित हो गई और दिल्ली में आप का किला बनने से पहले ही कमजोर हो गया.

 

हालांकि जिस भी आप समर्थक से मैंने बात की तो उन्हें इस बात का अंदेशा नहीं है कि आप की दिल्ली में दुर्गति होगी. कुछ एग्जिट पोल में तो आप को एक भी सीट नहीं मिल रही है. मुझे नतीजे निकालने में जल्दबाजी ना करने की सलाह दी जा रही है. चुनाव पूर्व अनुमान लगाने में गलत साबित हो जाने का खतरा भी होता है लेकिन ये आम आदमी पार्टी को ये चेतावनी में पिछले 27 मार्च को ही दे चुका हूं. इस लिंक पर वो लेख भी मौजूद है. http://owl.li/wNmxC

 

 

निष्कर्ष आज भी वही जो 27 मार्च 2014 को दिया था. “सीटों के बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी हो लेकिन वो इतनी नहीं मिलेंगी जितनी जीतने की उम्मीद आम आदमी पार्टी ने लगा रखी है और अगर इतनी जल्दबाजी इतनी नहीं दिखाई जाती तो आम आदमी पार्टी कहीं बेहतर हालत में होती.“

 

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