नेहरू ने की थी अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA की मदद

नेहरू ने की थी अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA की मदद

By: | Updated: 01 Jan 1970 12:00 AM

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<b><b></b>वाशिंगटन:</b> भारत ने 1962 के
युद्ध की पराजय के बाद चीनी
क्षेत्रों को निशाना बनाने
के लिए अमेरिका को सीआईए के
यू-2 जासूसी विमानों में इंधन
भरने के लिए अपने एक
वायुसैनिक अड्डे के
इस्तेमाल की अनुमति दी थी.
गोपनीय सूची से हटाए गए एक
दस्तावेज से आज यह जानकारी
मिली है.<br /><br />राष्ट्रीय
सुरक्षा अभिलेखागार (एनएसए)
ने सीआईए से हासिल और हाल में
गोपनीय सूची से हटाए गए
दस्तावेजों के आधार पर तैयार
एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी
है.
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रिपोर्ट में बताया गया है कि
तत्कालीन प्रधानमंत्री
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 11
नवंबर 1962 को चीन के साथ लगे
सीमावर्ती इलाकों में यू-2
मिशन के विमानों को उड़ान
भरने की अनुमति प्रदान की थी.
ये दस्तावेज सूचना की आजादी
अधिनियम के तहत प्राप्त किए
गए हैं.<br /><br />एनएसए ने सीआईए की
400 पन्नों की रिपोर्ट के आधार
पर बताया है कि तत्कालीन
अमेरिकी राष्ट्रपति जान एफ
कैनेडी तथा भारतीय
राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन
के बीच 3 जून 1963 को एक बैठक में
ओड़िशा में द्वितीय विश्व
युद्ध काल के खाली पड़े
छारबातिया वायुसैनिक अड्डे
के इस्तेमाल पर सहमति बनी थी.
लेकिन इस अड्डे में सुधार के
लिए भारत को उम्मीदों के
विपरीत काफी समय लगा और
इसीलिए मिशन को थाइलैंड के
ताखली से संचालित किया गया. <br /><br />पंडित
नेहरू द्वारा 11 नवंबर को 1962 को
जासूसी विमान यू2 को भारतीय
वायु सीमा में इंधन भरने की
अनुमति देने के बाद नवंबर के
अंतिम दिनों में
डिटैचमैंट-जी को भारत-चीन
सीमा पर निगरानी के लिए
थाइलैंड के ताखली से उड़ानें
भरने के लिए तैनात कर दिया
गया. चूंकि यू 2 को बर्मा के
उपर से उड़ान भरने की अनुमति
नहीं थी इसलिए उन्हें अपने
लक्षित इलाके में पहुंचने के
लिए बंगाल की खाड़ी और पूर्वी
भारत के उपर से उड़ान भरनी
पड़ी. इसके लिए उन्हें उड़ान
के दौरान हवा में इंधन भरने
की जरूरत थी. रिपोर्ट कहती है
कि अमेरिका ने भारत को सीमाई
इलाके की फोटोग्राफिक कवरेज
दो कारणों से उपलब्ध करायी
थी.<br /><br />"सबसे पहला कारण था कि
अमेरिकी नीति निर्माता
विवादित क्षेत्र की स्पष्ट
तस्वीर चाहते थे. इसके
अतिरिक्त, खुफिया एजेंसी
भारत के उपर से उड़ान भरने की
परंपरा डालना चाहती थी जो बाद
में सोवियत एबीएम स्थल के
खिलाफ इलैक्ट्रोनिक निगरानी
मिशनों के लिए भारत में
स्थायी अड्डा हासिल करने का
आधार बन सकती थी. इसके अलावा
इससे पश्चिमी चीन के उन
हिस्सों का फोटोग्राफिक
मिशन संचालित किया जा सकता था
जो डिटैचमेंट एच की रेंज से
बाहर थे.<br /><br />रिपोर्ट कहती है
कि अप्रैल 1963 में राजदूत
गालब्रैथ और नयी दिल्ली में
चीफ आफ स्टेशन ने भारत से
पहली बार अड्डे की स्थापना के
लिए आधिकारिक अपील की. इसके
अगले महीने, डीसीआई मैकोन के
इस सुझाव से राष्ट्रपति
कैनेडी सहमत हो गए कि वह 3 जून
को भारत के राष्ट्रपति
सर्वपल्ली राधाकृष्णन से
मुलाकात के दौरान भारत में यू
2 अड्डे के मुद्दे को उठाएं. इस
मुलाकात की परिणति भारत
द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध
के खाली पड़े कोलकाता के
दक्षिण में छारबातिया अड्डे
की पेशकश के रूप में हुई.<br />
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