ब्लॉग- सुशील मोदी ने सबको सेट कर दिया!

By: | Last Updated: Tuesday, 29 April 2014 7:15 AM
ब्लॉग- सुशील मोदी ने सबको सेट कर दिया!

बिहार बीजेपी नेता अश्विनी चौबे और गिरिराज सिंह

नई दिल्ली: बिहार में इन दिनों इस बात की चर्चा खूब हो रही है कि सुशील मोदी ने पार्टी में उफनने वाले तमाम नेताओं को सेट कर दिया है. खासकर उन सवर्ण नेताओं को जो आने वाले दिनों में सुशील मोदी की राजनीति के लिए सिरदर्द साबित हो सकते थे. बिहार की राजनीति को नजदीक से समझने वाले ये मानते हैं कि व्यक्तिगत तौर पर यहां सुशील मोदी लालू या नीतीश का विकल्प नहीं हो सकते. बिहार में बीजेपी-जेडीयू गठबंधन की सरकार बनने के बाद सुशील मोदी को नीतीश की छाया के रूप में देखा जाता था. जेडीयू वाले नरेंद्र मोदी का विरोध करते हुए यहां तक कहते थे कि बिहार के लिए यहीं के मोदी काफी हैं.

 

कहा जाता है कि 2010 के विधानसभा चुनाव में सुशील मोदी ने नीतीश के कहने पर नरेंद्र मोदी को बिहार में प्रचार करने से रोका था. ये वो वक्त था जब नीतीश और नरेंद्र मोदी की दुश्मनी परवान चढ़ चुकी थी. बिहार में पार्टी के ज्यादातर नेता नरेंद्र मोदी से प्रचार के पक्ष में थे लेकिन सुशील मोदी ने ऐसा नहीं होने दिया. नतीजे उम्मीद से ज्य़ादा अच्छे आए और नीतीश और उनकी पार्टी ने नरेंद्र मोदी का खुलेआम विरोध शुरू कर दिया.

 

इस दौरान सुशील मोदी ने नीतीश को पीएम के लिए योग्य तक बताया था. नरेंद्र मोदी पर हमले हुए तो बिहार के दो नेताओं ने मुखर होकर नीतीश का विरोध और मोदी का समर्थन किया. एक थे गिरिराज सिंह और दूसरे अश्विनी चौबे. गिरिराज भूमिहार और चौबे ब्राह्मण. इसी समय सीपी ठाकुर जो कि भूमिहार जाति से आते हैं उन्हें प्रदेश अध्यक्ष से हटा दिया गया. तब कहा जाने लगा कि सुशील मोदी बीजेपी के आधार वोट वाले सवर्णों के विरोध में राजनीति कर रहे हैं. हालांकि ब्राह्मण जाति के अपने करीबी मंगल पांडे को अध्य़क्ष बनाकर सुशील मोदी ने ये दाग धोने की कोशिश की.

 

पिछले साल जब बिहार में गठबंधन टूटा तो सुशील मोदी विधान परिषद में विपक्ष के नेता बने और नंद किशोर यादव को विधान सभा में विरोधी दल का नेता बनवाया. ये फैसला बिहार के कई सवर्ण नेताओं को पसंद नहीं आया. नतीजा हुआ कि बिहार में पार्टी को पहचान देने वाले नेताओं ने पार्टी छोड़ दी. ताराकांत झा, विजय मिश्रा, अवनीश कुमार सिंह, मनोज सिंह जैसे आधार वाले पुराने सवर्ण नेताओं ने बीजेपी को बाय बाय कर दिया. अश्विनी चौबे, गिरिराज सिंह, चंद्र मोहन राय ये तीनों नीतीश की सरकार में मंत्री हुआ करते थे. तीनों की छवि प्रभावशाली नेताओं की है.

 

कहा जा रहा है कि सुशील मोदी ने अपने राजनीतिक कद का फायदा उठाकर तीनों को सेट कर दिया.  गिरिराज सिंह भूमिहार बहुल बेगूसराय जो कि उनका गृह जिला भी है वहां से लड़ना चाहते थे. उनकी दूसरी प्राथमिकता मुंगेर की सीट थी लेकिन सुशील मोदी ने मुंगेर की सीट सहयोगी पार्टी एलजेपी के खाते में डलवा दी और बेगूसराय से भोला सिंह को टिकट दिलवा दिया. नवादा सीट से गिरिराज को टिकट दिलवा दिया जहां से उन्हें लड़ने की इच्छा बिल्कुल नहीं थी. अब गिरिराज जीत गए तो बिहार की राजनीति से दूर हो जाएंगे अगर हार गए तो उफनाने की हिम्मत नहीं रह जाएगी. गिरिराज के भड़काऊ भाषण वाले विवाद में पार्टी के एक भी सवर्ण नेता ने कुछ नहीं बोला लेकिन सुशील मोदी ने ट्वीट करके निंदा की. चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा जैसे दलित और पिछड़े नेताओं से बयान दिलवाए .

 

अश्विनी चौबे का भी कमोबेश यही हाल किया. लड़ना भागलपुर से चाहते थे भेज दिया बक्सर. यहां सुशील मोदी ने एक तीर से दो निशाने साधे एक तो अपने घोर विरोधी लालमुनी चौबे का राजनीतिक करियर खत्म कर दिया दूसरा अश्विनी को फंसा दिया. जीते तो दिल्ली चले जाएंगे हारे तो हिम्मत नहीं बचेगी.

 

चंद्रमोहन राय की बेतिया जिले में अच्छी पकड़ है. भूमिहार जाति के हैं, मंत्री भी थे. वाल्मिकी नगर से लड़ना चाहते थे लेकिन टिकट दे दिया सतीश दुबे को. यहां सुशील मोदी ने सवर्ण कार्ड से ही चंद्रमोहन की राजनीतिक महत्वकांक्षा को मार दिया. चंद्रमोहन ने तो पार्टी से इस्तीफा तक दे दिया लेकिन किसी तरह मान मनौव्वल के बाद उन्हें मनाया गया .

 

राजपूत जाति के मनोज सिंह सीवान के नेता हैं. लोकसभा का टिकट चाहते थे लेकिन ओम प्रकाश यादव को पार्टी में लाकर इनका पत्ता साफ कर दिया. रामेश्वर चौरसिया भी सुशील मोदी के विरोधियों में गिने जाते हैं. काराकट से लड़ना चाहते थे. लेकिन सीट दिलवा दी उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को. वैश्य जाति के युवा नेता सुनील कुमार पिंटू सीतामढ़ी से लड़ना चाहते थे लेकिन बिरादरी में कोई बड़ा कद का न हो जाए इसलिए ये सीट भी समझौते में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को दे दी. कुशवाहा ने यहां ऐसे उम्मीदवार को उतारा जिसकी कोई राजनीतिक पहचान नहीं है.

 

बिहार बीजेपी पर सुशील मोदी, नंद किशोर यादव और मंगल पांडे की तिकड़ी का कब्जा है. अगले साल यहां विधानसभा चुनाव होने हैं. सुशील मोदी ने इतनी फिल्डिंग 2015 की राजनीति को देखते हुए ही की है. लेकिन लोकसभा में तो नरेंद्र मोदी के नाम पर सवर्ण वोटरों ने साथ दे दिया विधानसभा में नेता कौन होगा इसको लेकर बीजेपी को परेशानी होने वाली है. सुशील मोदी पर नीतीश की छाप है. सवर्ण समाज में सुशील मोदी की छवि अच्छी नहीं है. और बिहार में पार्टी के पास आधार वाले नेता की कमी दिख रही है.

 

 

माना जा रहा है कि सरकार बनने के बाद सुशील मोदी को केंद्र में लाया जा सकता है और बिहार में किसी नए चेहरे को आगे किया जा सकता है. लेकिन बिहार के सियासी समीकरण में किसी सवर्ण नेता के लिए जगह नहीं दिख रही और बीजेपी के पास ले देकर सुशील मोदी, नंद किशोर यादव जैसे ही पिछड़े नेता दिखते हैं. रविशंकर प्रसाद, शत्रुघ्न सिन्हा राजीव प्रताप रूडी हैं तो बड़े लोग लेकिन मास अपील नहीं है. और तीनों सवर्ण भी हैं. शाहनवाज हुसैन पार्टी के पास मुस्लिम चेहरा है. शाहनवाज पर दांव लगाने में दिक्कत भी हो सकती है. फिलहाल कहा जा रहा रहा है कि बिहार में लालू और कांग्रेस का गठबंधन बीजेपी को जोरदार टक्कर दे रहा है.

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