चीन : यहां कोई भी सपना ऐसा नहीं है जिसे पूरा नहीं किया जा सके

By: | Last Updated: Wednesday, 9 July 2014 3:23 PM
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शंघाई, चीन: इस शहर के बारे में एक बात कही जाती है . यहां कोई भी सपना ऐसा नहीं है जिसे पूरा नहीं किया जा सके . कोई भी ऐसी कीमत नहीं जिसे चुकाया नहीं जा सके . यहां कोई सौदा छोड़ा नहीं जाता . यहां किसी भी सौदे में नुकसान नहीं उठाया जाता है .

 

शहर शंघाई: 1947 में भारत आजाद हुआ . 1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना बना . 1980 में आर्थिक विकास के महत्वपूर्ण पैमाने , ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट पर चीन और भारत एक ही पायदान पर थे . प्रति व्यक्ति आमदनी में भारत आगे था . आज लगभग 34 साल बाद हम कहां और चीन कहां .

 

भारत की अर्थव्यवस्था 2 ट्रिलियन डॉलर की है और चीन की 9 ट्रिलियन डालर की. शंघाई अगड़ाई लेते हुये आज दुनिया के सबसे वैभवशाली समृद्द शहरों में से एक है. चीन दुनिया का सबसे बड़ा एक्सपोर्टर है . एक आर्थिक महाशक्ति है . मानव इतिहास में इतनी तेजी से इतनी बड़ी संख्या में लोगों ने कभी गरीबी से अमीरी का सफर तय नहीं किया है . 1981 से 2013 के बीच 68 करोड़ लोगों गरीबी से बाहर निकाला .

 

चीन से भारत क्या सबक ले सकता है-

 

ये बड़ा सवाल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने हैं . नरेन्द्र मोदी सरकार के पहले बजट पर देश ही नहीं पूरी दुनिया की निगाह है . नरेन्द्र मोदी मुख्यमंत्री रहते चार बार चीन की यात्रा कर चुके . चीन ने भारत में ज्यादातर निवेश गुजरात में ही किया है . चीन में जिस रफ्तार और पैमाने पर बदलाव हुआ है वैसे ही रफ्तार और पैमाने की बात मोदी अपने भाषणों में कहते हैं .

 

अब चीन के नेता , चाइना ड्रीम की बात कर रहे हैं . जिसमें अमीर , फलते – फूलते  चीन और उसकी मजबूत सेना के बीच समन्वय की बात है . महान राष्ट्रों की कतार में दोबारा से आगे खड़ा होने की बात है .

 

अब सवाल ये है कि आखिर कैसे चीन ने लगाई इतनी लंबी और उंची छलांग . कैसे उसने भारत को पछाड़ा और चीन की कामयाबी से भारत को सबक लेना चाहिये .

 

भारत की दिपावली की रात में . दीये गायब हैं . हर तरफ जगमग जगमग करती हुई बिजली की लड़ियां . इसके साथ एक से एक आतिशबाजी . अब भारत में जितनी ज्यादा बिजली की लड़ियां जलेंगी . जितनी आतिशबाजी होगी . चीन का इवू (Yiwu) शहर उतना ही खुशहाल होगा .  दीवाली हमारी. होली हमारी . अबीर हम उड़ाते हैं और खुश होतें हैं इवू के लोग . चीन  के लोग .  आखिर क्यों ?

 

इवू शहर में हर वो चीज मिलती है जिसकी आप कल्पना कर सकते है . ये दुनिया का सबसे बड़ा होलसेल मार्केट है . यहां 7.50 लाख दुकानें हैं और इन सभी दुकानों में जानें में आपको एक साल का वक्त लग सकता है .

 

यहां आपको हर साइज के गणेश जी और लक्ष्मी जी की मूर्तियां मिल जायेंगी . आपको देवी देवताओं के कैलेण्डर मिल जायेगे .

 

पिछले कुछ सालों से दिवाली में पूजा के लिये गणेश और लक्ष्मी जी की मूर्तियां जाती हैं. पटाखे जाते . होली की पिचकारियां रंग . अबीर में भारत इंपोर्ट होता हैं.

 

यानी जितनी चमकदार दिपावली भारत में मनायी जायेगी . होली का रंग जितना गहरा होगा . इवू और चीन की आमदनी उतनी ही ज्यादा होगी .  चीन के इवू शहर की इन दुकानों में क्या नहीं मिलता . इन्हीं दुकानों में गणेश जी . लक्ष्मी जी . शिव जी की मूर्तियां कैलेण्डर और आरती संग्रह मिलते हैं . यहीं गुरु ग्रंथ साहिब के शबद की किताब मिल जाती हैं . और कुरान शरीफ की आयतें मिलती हैं . यहां सैंटा क्लाज मिल जायेंगें . हर क्वालिटी के सैंटाक्लाज मिल जायेंगे . और ऐसी सैंकड़ों दुकाने हैं.

 

दरअसल, इवू का ये होलसेल मार्केट,  फैक्टरी दुनिया भर के इंपोटरों के बीच की कड़ी है. इंपोरटर यहां आर्डर देते हैं . आर्डर फैक्टरियों में बढ़ा दिया जाता है और फैक्टरी से माल सीधे खरीददार के पास एक्सपोर्ट हो जाता है .

 

चीन में बिजनेस का एक फार्मूला है . यहां कोई भी सौदा छोड़ा नहीं जाता और किसी भी सौदे में नुकसान नहीं उठाया जाता . यूवी में इसकी कई मिसाल आपको मिल जायेगी . भारत के खरीददारों को ध्यान में रख कर व्यवसायी यहां से कम रेट का माल खरीदते हैं . चूंकि यहां कोई सौदा छोड़ा नहीं जाता है और किसी भी सौदे में नुकसान नहीं उठाया जाता इसलिये चीनी फैक्टरी मालिक हल्की कोआल्टी की चीजें बेच देते हैं . इस वजह ये जगह भारतीय थोक व्यापारी बड़ी संख्या में यहां आ रहे हैं . 2011 में 40 हजार भारतीय व्यवसायी यहां आये . जबकि 2013 में तीन लाख 60 हजार भारतीय व्यापारी यहां पहुंचे . और यहां से भारतीय व्यापारी सिर्फ भारत के लिये ही सामान नहीं खरीदते बल्कि मीडिल इस्ट . लैटिन अमेरिका और रुस के लिए भी थोक खरीददारी कर रहे हैं .   

 

इवू आने वाले भारतीय व्यवसायियों की संख्या बड़ गई है . भारत से आने वाले व्यापारियों की संख्या इतनी ज्यादा है कि एक पूरी सड़क भारतीय रेस्टोरेन्ट और होटलों से भरा हुआ है . इस शहर में 15 भारतीय रेस्टोरेन्ट है . यहां वतन नाम से सबसे पहले रेस्टोरेंट खोलने वाले थे अजमेर के मनीष कुमार रमानी  .

 

इवू में इतनी बड़ी मार्केट बनाने के पीछे चीन की सोच थी कि एक ऐसा होल सेल मार्केट बनाया जहां देश भर के सामानों को इंपोटर देख परख सकें . ये काम बारह साल पहले शुरु हुआ . और देखते ही देखते खरीददारों का यहां तांता लग गया . 

 

यानी पहले फैक्ट्रियां बनाई गई और फिर उनके उत्पाद को बेचने की व्यवस्था भी कर दी गई . इंपोटरों को इधर- उधर जाने की जरुरत नहीं है और फैक्टरी मालिकों को भी खरीददार ढूढ़ने की जरुरत नहीं है  . चीन की आर्थिक राजधानी शंघाई से लगभग 300 किलोमीटर की दूरी पर बसे इस इवू शहर में भारत से बड़ी संख्या में व्यापारी आने लगे हैं . इससे कम्पटीशन बढ़ा है और इन व्यापारियों का मुनाफा हाल के दिनों में कम हो गया है . लेकिन व्यापारियों की संख्या बढ़ी है इसका मतलब ये भी है कि चीन के उत्पादों की खपत बढ़ रही है और इससे भी बड़ी बात. भारत जैसे देशों में उत्पादन कम हो रहा है . यही चीन की सोच थी .

 

दुनिया भर में चीन के उत्पाद दिखाई देते हैं तो उसकी एक वजह कई किलोमीटर तक फैले मार्केट के चार फ्लोर हैं . और इनकी दुकानों में दुनिया भर की नकल की हुई चीज भी मिलती है और असल और क्वालिटी चीज भी . आप पैसे फेंकिये . चीज हाजिर है . चाहे वह खिलौने हो  या कपड़े. कॉस्मेटिक्स हो या हार्ड वेयर के सामान .  ज्यूलरी हो या लेदर गुड .

 

दरअसल , इवू  चीन के बारे में एक बड़ी कहानी कहता है . चीन की सफलता के राज खोलता है . दुनिया में इंसानों की जरुरत की हर चीज बनाओं और खरीददार जैसा चाहे वैसा बनाओं और मुनाफा कमाओं .  

 

चीन किसी भी बड़ी योजना को लागू करने से पहले पॉयलेट प्रोजेक्ट चलाता है और पॉयलेट प्रोजेक्ट के सफल होने पर उसे दूसरी जगहों पर लागू किया जाता है. ये चीन की उस बड़ी योजना का हिस्सा है जिसकी वजह से वो पूरी दुनिया के बाजार पर उसका कब्जा है . आज चीन दुनिया का सबसे बड़ा एक्सपोर्टर देश है . यहां सबसे ज्यादा फैक्टरी है .

 

इवू और चीन की सफलता की कहानी की शुरुआत 1980 में हुई .तब चीन कम्यूनिस्ट देश था . एक ऐसा देश जिसमें पर्सनल पॉपर्टी . निजी संपत्ति का अधिकार किसी को नहीं था . जो था वो स्टेट का था . इन्ही दिनों चीन ने कट्टर कम्यूनिस्ट देश से कैपीटल्सिट देश बनने का फैसला किया .  लेकिन राजनीतिक व्यवस्था नहीं बदली . कम्यूनिस्ट पार्टी का शासन रहा . लेकिन विदेशी निवेश की इजाजत दी गई . तब डेंग जिआओ पींग देश के सबसे बड़े नेता थे . उनका और कम्यूनिस्ट पार्टी का फैसला था  देश की अर्थव्यवस्था को  बदलने का . किसी ने तब सार्वजनिक तौर पर इस फैसले का विरोध किया और ना ही अब इसका विरोध हो रहा है .

 

डेंग जिआओ पिंग की गिनती चीन में बड़े कम्यूनिस्ट नेताओं में होती हैं .और डेंग ने ही चीन के राष्ट्रपति के तौर पर 1979 वो काम किया जिसके बारे में तब चीन में सोचना लगभग नामुमकिन था . चीन के shanghai university of international business and economics में प्रोफेसर कुओ श्वे थांग का कहना है कि डेंग के फैसले का विरोध न मुमकिन था और न हुआ.

 

डेंग जिआओ पिंग ने चीन के दरवाजे बाहरी निवेश के लिये खोल दिये थे . इसी के साथ चीन में एसईजेड यानी स्पेशल इकोनॉमिक जोन बनाने का फैसला किया .

 

एसईजेड ,  स्पेशल इकनोमिक जोन को चीन के विकास का तुरुप का पत्ता कहा जाता है . लेकिन ये एस ई जेड,  चीन की आर्थिक विकास से ज्यादा उनकी सोच और सोच के प्रति कमिटमेंट. प्रतिबद्दता को दिखाता है . चीन ने सबसे पहले Shenzen में स्पेशल इकनोमिक जोन बनाया  था . साल था 1979 . इसके बाद चीन ने बंदरगाहों के करीब 5 और स्पेशल इकनोमिक जोन बनाये . लेकिन भारत चीन की सफलता को देखकर 2000 में स्पेशल इकनोमिक जोन बनाने की घोषणा की . इसके पांच साल बाद सेज एक्ट पार्लियामेंट से पास हुआ . और इसके एक साल के भीतर 200 से ज्यादा स्पेशल इकनोमिक जोन बनने की घोषणा हो गई .

 

वैसे चीन से पहले एसईजेड जैसी सोच भारत में आ चुकी थी . भारत 1969 में ही भारत में एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग जोन बनाया गया था . इन्हे कभी स्पेशल इकोनामिक जोन का दर्जा नहीं दिया गया लेकिन विचार के स्तर पर दोनों में ज्यादा फर्क नहीं था .   लेकिन भारत और चीन की एसईजेड में काफी फर्क है . चीन में एक तो सिर्फ 6 एसईजेड हैं जबकि भारत में तकरीबन  300 के करीब . चीन में एसईजेड में मिलने वाले फायदे जैसे कम टैक्स और लेबर कानून में नरमी एसईजेड के बाहर नहीं मिलती . जबकि भारत में टैक्स संबधित रियायतें स्पेशल इकोनामिक जोन के बाहर भी मिल जाती  है .

 

चीन के एसईजेड में जमीन अधिग्रहण की समस्या नहीं है जबकि भारत के ज्यादतर एसईजेड के जमीन अधिग्रहण बड़ा मुद्दा है . चीन का एसईजेड़ काफी बड़े हैं . चीन का Shenzen का स्पेसल इकनोमिक जोन्स जहां इलेट्रोनिक सामान बनाये जाते हैं 49,500 हेक्टेयर में फैला है . चीन का कोई भी स्पेशल इकनोमिक जोन 30,000 हेक्टेयर से छोटा नहीं है . जबकि भारत में सिर्फ 10 हेक्टेयर जमीन को भी  स्पेशल इकनोमिक जोन बना दिया गया . स्पेशल इकोनॉमनिक जोन के बाद चीन ने अपने  राज्यों में स्पेशल डेवेलपमेंट जोन बनाया . एक डेवेलपमेंट जोन में एक तरह के उत्पाद बनाने वाली फैक्टरी होती है . इसलिये चीन का एक राज्य सिर्फ खिलौने बनाने के लिये मशहूर है तो एक होजियरी. कई भारतीए कंपनियों ने भी चीन में इनवेस्ट किया है .

 

 

चीन के  Yangcheg में महिन्द्रा एंड महिन्द्रा की ट्रैक्टर बनाने की फैक्टरी . महिन्द्रा ट्रैक्टर के लिये ये फैसला बड़ा था . लेकिन वो आज चीन में महिन्द्रा की गिनती ट्रैक्टर बनाने वाली बड़ी कपंनियों में होती है . क्या जो काम महिन्द्रा ट्रैक्टर चीन के .यांगचेन से कर रही है क्या वो भारत से मुमकिन नहीं था .

 

महिन्द्रा एंड महिन्द्रा एक बड़ी कंपनी है . लेकिन कई छोटे निवेशक भी हैं जिन्होंने भारत की बजाये चीन में फैक्टरी लगाने का फैसला किया है . इन्ही में जियांगसु में फैक्टरी लगाने वाले जय किशन भगवानी भी हैं .

 

भगवानी बताते हैं कि चाइना इंडिया दोनो जगह पैरलर काम किया एक साल इंडिया स्लो था चाइना फास्ट और प्रोडक्ट डिलीवरी चाइना की अच्छी थी और इंडिया ज्यादा बिजनेस फ्रेंडली भी नहीं था .

 

 उस समय मैं टेक्सटाइल का बिजनेस कर रहा था इंडिया में 6-7 महीने में डिलीवरी कॉमन थी इंडिया में और उस समय चाइना 30 दिनों में करता था ..इंडिया क्वांटिटी सप्लाय नहीं कर सकता कोई च्वाइस नहीं थी इसलिए चाइना जाना पड़ा .

 

इंफ्रास्ट्रकचर बहुत अच्छा है वहां, हर चीज ईजली अवेलेबल है लोकल बिजनेस इनवायरमेंट है…फ्रेंडली है वहां की जो गवर्नमेंट है .

 

किसी इंवेस्टर को अगर चाइना में जाना है तो उसे जाकर किसी को ढ़ूढ़ना नहीं होता , चाइनीज गवर्नमेंट में कुछ डिपार्टमेंट है वो उनको अपने आप अप्रोच करते हैं , इनवाइट करते हैं कन्टिनिवस चेज करते हैं तो वो वहां कम्फर्टेबल महसूस करते हैं .

 

जयकिशन भगवानी और महिन्द्रा ग्रुप का अनुभव ये बताता है कि चीन में फैसले जल्दी लिये जाते हैं . और ज्यादतर फैसले स्थानीय लेवल पर ही ले लिया जाता है . चाहे मामला जमीन अधिग्रहण का हो या सड़क बिजली पानी का . भारत जमीन अधिग्रहण को एक कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है . विस्थापित होने वालों के पुनर्वास पर ध्यान देना पड़ता है . साफ लोकतांत्रिक देश होने की वजह से जमीन अधिग्रहण और पुनर्वास भारत की सरकार के लिये बड़ा मुद्दा होता है . जबकि विकास के शुरुआती दौर में चीन की सरकार की नजर आर्थिक विकास पर रही . किसी भी तरह के विरोध को कुचल दिया गया .

 

चीन विकास हर तरह की कीमत चुकाने के लिये तैयार रहा है . चीन सरकार ने अपने चर्चित 3 गार्जेज बांध बनाने का एलान 1994 में किया और 4 जुलाई, 2012 को बिजली पैदा करना शुरु कर दिया . इसके लिये 13 बड़े शहर , 140 कस्बे, 1600 गांव को खाली कराया गया . इसके निर्माण के दौरान पर्यावरण से जुड़े सवाल को भी दरकिनार कर दिया . जबकि भारत में हाल के दिनों में नर्मदा बांध तैयार हुआ . नर्मदा बांध बनाने की सोच शुरु हुई 1979 में काम पूरा हुआ 2006 में . इस दौरान बांध की उंचाई और विस्थापन के सवाल पर लगातार काम रुकता रहा .

 

चीन की राजनीति ने विकास के आगे विरोध और बहस को दरकिनार कर दिया . आर्थिक निवेश को विचारधारा और राजनीति के चश्मे से नहीं देखा .  आर्थिक सुधार के शुरुआती दिनों में डेग जिआओ पिंग ने एक बड़ा कदम उठाया था ..वो था किसानों जमीन दे दी गई. लेकिन जल्दी ही हालात बदल गये .   

 

आर्थिक बदलाव में एक बड़ा कदम लैंड रिफार्म का था . जमीन किसी एक व्यक्ति या परिवार की सपंत्ति नहीं होती थी . कम्यून यानी पूरा समाज उस पर मिल जुल कर खेती करता था . लैंड रिफार्म के तहत जमीन किसानों को दे दी गई . लेकिन जमीन एक हाथ से दी गयी और दूसरे हाथ से ले ली गयी . जैसे ही बिजली घर ..बांध …स्पेशल इकोनामिक जोन  ..और फैक्टरी लगाने की बात शुरु हुई बड़े पैमाने पर जमीन सरकार ने लेकर निजी हाथों में दे दिया . इस मामले में किसी भी तरह के विरोध को जगह नहीं दी गई . पुनर्वास के बारे में कई बार सोचा भी नहीं गया . बेजिंग ओलोंपिक से पहले शहर के आसपास बसे सैंकड़ो गांवो को रातोंरात हटाया गया . चीन के विकास का ये दूसरा पहलू है जिसमें विरोध और बहस की कोई गुंजाइश नहीं है .

 

चीन,  भारत से आगे क्यों निकला इसके पीछे की एक वजह वहां के मजदूर भी माने जाते हैं . इसे अर्थशास्त्री हूमन कैपिटल कहते हैं  1980 में जब चीन ने आर्थिक बदलाव शुरु किये तब वहां की साक्षरता तकरीबन 65 फीसद थी . जबकि भारत की साक्षरता दर 37 फिसदी . इतना ही नहीं पढ़े लिखे होने के साथ-साथ काम में चीन की  महिलाओं की भागीदारी 74 फिसद की है जबकि में भारत से सिर्फ 34 फिसद की है . निवशकों के लिये इससे भी बड़ी बात ये थी कि यहां न तो हड़ताल, यूनियनबाजी ..तालाबंदी का डर चीन में बिल्कुल भी नहीं है .     

 

चीन ने जब आर्थिक बदलाव शुरु किये तो उसने अपनी सोच में बड़ा परिवर्तन किया . कहने को तो मेहनत कश मजदूरों की कम्यूनिस्ट सरकार सत्ता में थी लेकिन मजदूरों के हितों और जरुरतों को पीछे ढकेला गया . खासतौर पर एसईजेड में लेबर कानूनों को काफी नरम कर दिया गया . यहां के कानूनों के मुताबिक एक प्रांत का मजदूर . दूसरे प्रांत में बस नहीं सकता है ना ही अपने परिवार को रख सकता है . एक तो ऐसा कोई कर नहीं सकता और अगर करता है तो उनके बच्चे को किसी स्कूल में दाखिला नहीं मिलेगा . सरकारी स्वास्थ्य सेवा नहीं मिल सकेगी . अब क्या भारत में क्या आप ऐसे कानून और उसके पालन की उम्मीद कर सकते हैं जहां पति पत्नी एक ही शहर में काम करें लेकिन साथ न रहे . अपने बच्चे को साथ न रख पाये .        

 

चीन  में इस व्यवस्था को  hukou  कहते हैं . भारत की अर्थव्यवस्था 120 लाख करोड़ रुपए की है जबकि चीन की अर्थव्यवस्था भारत से लगभग 4 गुना ज्यादा की हो चुकी है . इस रफ्तार की एक वजह hukou जैसे कानून भी हैं . चीन में इस दौरान सख्ती से वन चाइल्ड पालिसी का पालन भी करवाया . लेकिन एक ही बच्चा पैदा करने की नीति ने आज चीन के सामने बड़ी चुनौती खड़ी दी . क्योंकि चीन की आबादी का  बड़ा हिस्सा बूढ़ा हो रहा है और उनकी जगह लेने वाला कोई नहीं है . चीन के नैशनल ब्यूरो आफ स्टैटिस्टिक्स के मुताबिक 35 देश में 35 लाख  कामकाजी लोगों की कमी है . और 2020 तक यूनाइटेड नेशन पापुलेशन डिविजन के मुताबित नौ करोड़ 44 लाख कामकाजी लोग कम हो जायेंगे . इसका मतलब ये है कि चीन में सामान बनाना लगातार मंहगा होता जायेगा .

 

इस चुनौती के वावजूद चीन जल्दी ही अमेरिका को पीछे छोड़ देगा . फिलहाल वो दुनिया का सबसे बड़ा एक्सपोर्टर है . दुनिया की फैक्टरी है . दूसरी तरफ सामाजिक क्षेत्र में भी चीन प्रगति ने सभी को चौंका दिया है  .

 

तो क्या भारत की राजनीतिक व्यवस्था ने पीछे ढकेला है . नोबल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमृत्य सेन का कहना है कि भारत ,चीन से कितना पीछे है और क्या भारत चीन से कभी आगे निकल पायेगा जैसे सवालों में नहीं फंसना चाहिये . लोकतंत्र ने भारत को मजबूत किया है लेकिन पब्लिक की अहम जरुरत के मामले में भी भारत चीन से बहुत पीछे है . भारतीयों की औसत आयु 66 साल है जबकि चीन में 73 जन्म लेने वाले हर 1000 बच्चों में भारत में  66 बच्चे पांच साल की उम्र पार नहीं कर पाते . उसी तरह चीन में 15 साल से उपर के उम्र के 94 फिसद लोग पढ़े लिखे हैं जबकि भारत में सिर्फ 63 फिसदी . क्या इन आंकड़ो के लिये भी लोकतंत्र को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है .

 

साइमन डेयर फिलहाल चीन में वाशिंग्टन पोस्ट के ब्यूरो चीफ हैं . उनका कहना है कि भारत का लोकतंत्र उसकी सबसे बड़ी पूंजी है . आज नहीं तो कल लोकतंत्र के सहारे भारत चीन से आगे निकल सकता है .

 

भारत –चीन की आर्थिक स्पर्धा खत्म हो चुकी है

 

चीन जल्दी ही अमेरिका को पीछे छोड़ देगा. उधर चीन में प्रदुषण का स्तर . जनता की सीमित आजादी. एक पार्टी रुल. निष्पक्ष ज्यूडिसियरी की कमी.  बुजुर्गों की बढ़ती संख्या जैसे मुद्दे चीन के सामने बड़े सवाल खड़े कर रही है. इससे लगता है कि चीन ने अपने इस सफर में बहुत कुछ खोया भी है.  लेकिन इसका ये मतलब कत्तई नहीं है कि चीन से सीखने लायक कुछ भी नहीं है. भारत की जनता ने नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी को बहुमत देकर बड़े कदम उठाने का जनादेश दिया है. नरेन्द्र मोदी के बारे में जानने को चीन के लोग भी काफी उत्सुक हैं.  अब सवाल ये है कि नरेन्द्र मोदी और उनकी टीम चीन से कौन- कौन सबक लेती है कौन छोड़ती है . 

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