मिश्र हत्याकांड: अब 18 दिसंबर को सुनाई जाएगी सजा

By: | Last Updated: Monday, 15 December 2014 5:17 PM
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नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने वर्ष 1975 में तत्कालीन रेलमंत्री ललित नारायण मिश्र की हुई हत्या के मामले में चार दोषियों की सजा तय करने संबंधी फैसला सोमवार को 18 दिसंबर तक के लिए सुरक्षित रख लिया.

 

जिला न्यायाधीश विनोद गोयल ने 39 साल पूर्व हुए हत्याकांड में हिंदू संगठन ‘आनंदमार्ग’ के चार अनुयायियों को आठ दिसंबर को दोषी करार दिया था. अदालत ने सोमवार को सजा पर फैसला 18 दिसंबर तक के लिए सुरक्षित रख लिया.

 

इस मामले में हत्या का मुकदमा गोपालजी (73), रंजन द्विवेदी (66), संतोषानंद अवधूत (75) और सुदेवानंद अवधूत (79) पर चल रहा था. इन पर हत्या, साजिश, खतरनाक हथियार से गंभीर हमले करने का आरोपी बनाया गया था.

 

इसस पहले अदालत ने आठ दिसंबर को इन्हें दोषी करार देकर हिरासत में लेने का आदेश दिया था और सजा सुनाने के लिए 15 दिसंबर की तारीख मुकर्रर की थी.

 

बिहार के समस्तीपुर जिले में 2 जनवरी 1975 को एक नई रेलवे लाइन का उद्घाटन करने गए मिश्र मंच पर हुए बम विस्फोट में गंभीर रूप से घायल हो गए थे और एक दिन बाद उनका निधन हो गया था.

 

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) का आरोप है कि आनंदमार्ग के एक नेता की रिहाई के लिए सरकार पर दबाव बनाने के मकसद से आनंदमार्ग के अनुयायियों ने मिश्र पर हमला करवाया था.

 

बतौर रेलमंत्री मिश्र दो जनवरी, 1975 को समस्तीपुर-मुजफ्फरपुर ब्रॉडगेज रेलवे लाइन का उद्घाटन करने के लिए समस्तीपुर गए थे. बम विस्फोट में घायल होने के बाद उन्हें दानापुर के रेलवे अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां अगले दिन 3 जनवरी, 1975 को उनका निधन हो गया था.

 

घटना के छह वर्षो बाद यानी 1981 में आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया था. वर्ष 1979 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद मामले को दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया था.

 

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार, निचली अदालत ने सितंबर 2012 से दैनिक आधार पर मामले की दलीलें सुननी शुरू की थी.

 

सर्वोच्च न्यायालय ने आरोपियों की वह याचिका खारिज कर दी थी, जिसमें मुकदमा खत्म करने की मांग की गई थी. न्यायालय ने कहा था कि मुकदमा सिर्फ इस आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता, क्योंकि पिछले 37 साल में इस मामले का निपटरा नहीं हो सका है.

 

सर्वोच्च न्यायालय ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि ऐसी किसी भी अवांछित याचिका पर विचार न किया जाए, जो सिर्फ मुकदमे को लटकाने के लिए दायर की जाए.

 

39 साल चली इस मामले की सुनवाई 20 न्यायाधीशों ने की. इस दौरान अभियोजन पक्ष के 160 गवाहों, अदालत के पांच गवाहों और बचाव पक्ष के 40 गवाहों से जिरह की गई.

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