‘सिकंदर’ को शर्त मंजूर नहीं

By: | Last Updated: Monday, 6 July 2015 1:56 PM
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नई दिल्ली: दिवालिया होने के कगार पर पहुंच चुके ग्रीस के लोग जश्न मना रहे हैं. जश्न उन शर्तों को ठुकरा देने का जिसके एवज में अंतराराष्ट्रीय दानदाताओं ने मदद देने की बात कही थी. ग्रीस की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए अतरराष्ट्रीय दानदाताओं की शर्तों को ग्रीस की सरकार माने या ना माने इसको लेकर रविवार को जनमत संग्रह हुआ. ग्रीस के 61 फीसदी लोगों ने शर्त मानने के खिलाफ अपनी राय दी.

 

हालांकि यूरोपीय देशों ने जनमत संग्रह से पहले बार-बार ग्रीस के लोगों को चेतावनी दी थी कि अगर उनका फ़ैसला ‘ना’ रहा तो ग्रीस को यूरोज़ोन से बाहर जाना पड़ सकता है. यूरोजोन से बाहर जाने का मतलब होगा ग्रीस की अर्थव्यवस्था पूरे यूरोप से अलग-थलग पड़ जाएगी. पर इस चेतावनी की ज़्यादा परवाह न तो ग्रीस की जनता ने की, और न ही वहां की सरकार ने.

 

चार दशक से अधिक के समय में पहली बार ग्रीस में ये जनमत संग्रह हुआ, वह भी ऐसे समय पर जब देश में पैसों के लेनदेन पर कड़ी रोक लगी हुई है.

 

सरकार के हजारों समर्थकों ने संसद के सामने सिन्ताग्मा चौक पर जश्न मनाते हुए ग्रीस के ध्वज लहराए… लोग जोर जोर से ‘नहीं, नहीं, नहीं’ का नारा लगा रहे थे. आखिर क्या है ग्रीस का संकट? क्यों ग्रीस में आया संकट? क्या ग्रीस के संकट का असर भारत पर भी पड़ सकता है? इन सवालों का जवाब हम तलाश करेंगे आगे पहले बताते हैं मदद की शर्तों को ठुकराने के बाद ग्रीस के प्रधानमंत्री एलेक्सिस त्सिप्रास ने क्या कहा. ‘आज हम लोकतंत्र की जीत का जश्न मना रहे हैं. यूरोप के इतिहास में चमकता दिन है. हमने यह साबित कर दिया है कि मुश्किल हालात में भी लोकतंत्र को ब्लकमेल नहीं किया जा सकता.’

 

संकट से उबारने के लिए यूरोप के उन देशों ने जिनके कर्ज पर ग्रीस की अर्थव्यवस्था बची हुई थी, बेलआउट पैकेज के लिए कड़ी शर्तें रखी थीं. सबसे बड़ी शर्त थी कि ग्रीस की सरकार टैक्स बढ़ाए और सामाजिक योजनाओं पर ख़र्चों में कटौती करे. ग्रीस की कम्युनिस्ट सरकार ने इन शर्तों को ‘अपमानजनक’ बताया.

 

शर्तों के नहीं मानने के बाद ग्रीस पर यूरोज़ोन से बाहर जाने का खतरा मंडरा रहा है. अगर ग्रीस यूरोजोन से बाहर होता है तो उसे यूरोपीय संघ से मिलने वाली बड़ी मदद का रास्ता बंद हो जाएगा. और अगर ऐसा हुआ तो ग्रीस की अर्थवयवस्था साफ लुढ़क जाएगी. ग्रीस ने खर्चे कम करने की सबसे बड़ी शर्त को ठुकरा दिया है तो क्या ग्रीस यूरोपियन यूनियन से बाहर हो जाएगा? अगर ग्रीस डिफॉल्टर हो जाता है तो नुकसान यूरोप का भी होगा क्योंकि यूरोप के ही बैंकों ने ग्रीस को कर्जा दिया हुआ है. पैसा उन्हीं का डूबेगा लेकिन अगर ग्रीस अपने खर्चे नहीं कम करता तो पैसा चुकाने की हालत में भी नहीं आएगा. पेंच यहां फंसा हुआ है.

 

ग्रीस के खर्चे ऐसे हैं जो किसी सामान्य भारतीय को अनाप-शनाप लग सकते हैं. मसलन ग्रीस में सरकारी कर्मचारियों को साल में 12 नहीं 14 महीने की तनख्वाह मिलती है. सुनने में तो अच्छा लगता है लेकिन सरकार कर्ज में डूबी हो बस इस पर आप हंस सकते हैं. ग्रीस में सामाजिक सुरक्षा की पूरी गारंटी है. सरकार पेंशन देने में खूब दिलदार है.  रेलवे का हिसाब किताब ऐसा है कि समझिए एक रुपये की टिकट है तो उसपर रेलवे का 6 रुपया खर्च हो जाता है. एक मंत्री ने तो यहां तक कह दिया था कि अगर ग्रीस में रेलवे के सारे यात्रियों को टैक्सी से भेज दिया जाए तब भी सरकार को सस्ता पड़ेगा. सरकार की तरफ से लोगों को सुविधाएं ही सुविधाएं पर टैक्स देने के नाम पर ग्रीस के लोग ठन-ठन गोपाल हैं. ग्रीस में लोग टैक्स ज्यादा नहीं देते हैं. 

 

ग्रीस में सरकारी कर्मचारियों को और उनकी देखा-देखी प्राइवेट कंपनियों में भी साल में 12 महीने की नहीं 14 महीने का वेतन मिलता है. दो महीने का घूमने-फिरने के लिए. शनिवार रविवार की छुट्टी होती है. सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद पेंशन उसकी पत्नी या पति को मिलती है. वो भी नहीं है तो बेटी को भी मिलती रहती जब तक बेटी की शादी न हो. औऱ पेंशन भी अच्छी खासी होती है. औऱ सुनिए 40 साल की उम्र के बाद कभी भी रिटायर हो सकते हैं और पेंशन शुरू. नौकरी से कोई निकाल भी नहीं सकते. एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक कुल जीडीपी का 12% ग्रीस की सरकार पेंशन में देगी. अजीब-अजीब तरह के बोनस मिलते हैं. जैसे कई लोगों को कंप्यूटर इस्तेमाल करने का बोनस मिलता है. विदेशी भाषा आती है तो बोनस. टाइम पर दफ्तर आते हो तो बोनस. काम के लिए दफ्तर से बाहर जाना हो तो बोनस.

 

एक सरकारी एयरलाइन थी, ओलिंपिक एयरवेज. भारी नुकसान में थी, लेकिन कर्मचारियों को और उनके पूरे परिवार को पूरी दुनिया में कहीं भी जाने का फ्री टिकट मिलता था. 2008 में दबाव में सरकार ने एयरलाइन बेची तो सभी 4,600 कर्मचारियों को सरकारी नौकरी दी. रेलवे के खर्चे ऐसे हैं कि सभी यात्रियों को टैक्सी से भेजें तब भी सरकार को सस्ता पड़ेगा. टर्की से तनाव के नाम पर सेना का खर्चा ऐसा है कि सेना के बजट का 80 फीसद वेतन और पेंशन में चला जाता है. फिर एक लिस्ट बनाई हुई है सरकार ने उन लोगों की जो मशक्कत वाले काम करते हैं. उनको अपनी कमाई के अलावा सरकार से अलग से भत्ता मिलता है.

 

और सुनिए कौन लोग हैं जो कड़ी मेहनत मशक्कत के काम करते हैं- बाल काटने वाले, गाने-बजाने वाले, रेडियो अनाउंसर, ये सब भी उसी लिस्ट में हैं. और टैक्स देने को लोग राजी नहीं. एक अनुमान है कि कुल जीडीपी का 30% तो हर साल काले धन में रहता है, टैक्स नहीं देते लोग. ये सब दशकों से करते-करते देश की ये हालत हो गई है. बैंक बंद कर दिए सरकार ने. रोजाना 60 यूरो निकालने की लिमिट लगा दी.

 

भारत से ग्रीस का व्यापार बहुत कम है, इसलिए सीधा तो असर नहीं पड़ेगा. लेकिन ग्रीस में नुकसान की वजह से यूरोप में ब्याज दरें बढ़ने का खतरा है. ब्याज दरें वहां बढ़ीं तो भारत जैसे देशों से पैसा निकालकर विदेशी निवेशक उधर का रुख करेंगे. जिससे रुपया कमजोर होगा और हमारा शेयर बाजार भी गिरेगा. रुपया कमजोर होगा तो हमारे इंपोर्ट महंगे होंगे, जिससे हमारे खर्चे बढ़ेंगे. यानी सीधा तो नहीं, इस तरह से घुमाके ग्रीस का संकट भारत पर भी असर डाल सकता है, जिसकी बानगी आज सेंसेक्स में देखने को मिली.  

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